कभी-कभी एक लम्हा व्यक्तियों को भी बदल देता है और इतिहास को भी. गुरुवार शाम दिल्ली की गाज़ीपुर सरहद पर ऐसा ही लम्हा आया था.
26 जनवरी की अराजकता के बाद किसान आंदोलन के पांव जब लगभग उखड़ते दिख रहे थे, तब अचानक भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने एक पोज़ीशन ले ली- तय किया कि भले गोली चल जाए, वे धरना स्थल से नहीं उठेंगे. अपने सेनापति को ऐसी युद्ध मुद्रा में देख जैसे भागती हुईं सेनाएं ठहर गईं और नए हौसले के साथ मोर्चे पर लौटने लगीं. गाज़ीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलन गुलज़ार तो हुआ ही, टीकरी और सिंघु ब\र्डर पर सहमे हुए चेहरे कुछ खिल गए.
चाहें तो याद कर सकते हैं कि इस पूरे किसान आंदोलन में राकेश टिकैत ऐसे नेता थे जिन्हें बहुत सारे लोग संदेह से देख रहे थे. उन्हें सरकार का आदमी बताया जा रहा था, उन्हें बिचौलिया कहा जा रहा था. लेकिन जब निर्णायक लम्हा था तो राकेश टिकैत ने बताया कि क्यों उत्तर प्रदेश का किसान बाबा टिकैत के बेटे पर भरोसा करता है.
कई बरस पहले ऐसे ही निर्णायक लम्हे में काले धन के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने वाले एक बाबा को हमने मंच से वेष बदल कर भागते देखा था. उस 'सलवार' लम्हे ने रामदेव को हमेशा-हमेशा के लिए नेतृत्व की संभावना से वंचित कर कारोबारी में बदल दिया. देश और दुनिया के बारे में वे बाद में भी बोलते रहे, लेकिन काला धन मिटाने का उनका जज़्बा जैसे हमेशा-हमेशा के लिए मिट गया.लेकिन गुरुवार को राकेश टिकैत ने कहानी बदल दी. पटरी से उतरता नज़र आ रहा किसान आंदोलन पटरी पर लौट आया.
मगर यही मोड़ है जहां आंदोलनकारियों को रुक कर कई बातें समझनी होंगी. पहली बात तो यह कि सरकार उनके साथ ज़रा भी सदाशयता दिखाने वाली नहीं है. उनको बस इसलिए सहन किया जा रहा था कि उन्होंने एक नैतिक ताकत अर्जित की थी. इस ताक़त में हल्की सी दरार दिखी कि किसानों पर हमले शुरू हो गए. सच तो यह है कि किसानों ने जो हिंसा की, उससे कहीं ज़्यादा बड़ी हिंसा उनके साथ हो सकती है, इसका अंदेशा बराबर बना हुआ है.
सिंघु बॉर्डर पर पहले सरेंडर का मन बना रहे राकेश टिकैत ने ऐन मौके पर पाया कि वहां बीजेपी के एक विधायक ने अपने लोगों के साथ आकर दबाव बनाना शुरू किया. इसके बाद उनकी समझ में आ गया कि इरादा उनको गाज़ीपुर से हटाने का नहीं, उनका मनोबल तोड़ने का है और इस काम में बाहर वालों की मदद ली जा रही है.
ठीक यही बात अब टीकरी और सिंघु सरहदों पर हो रही है. ख़ुद को तिरंगा प्रेमी और आसपास के गांववाले बता रहे लोग उन किसानों को भगाने पर तुले हैं जो बीते दो महीने से उनके सुख-दुख के साथी बने रहे, जो उनके साथ लंगर चलाते रहे और उनके बच्चों को पढ़ाते भी रहे. टीकरी सरहद पर तलवार लिए एक सिख की जिस बुरी तरह पुलिस ने पिटाई की है, उसके दृश्य डराने वाले हैं.
कौन हैं ये तिरंगा प्रेमी लोग? क्या वाकई गांव वाले हैं? या पुलिस के उकसावे पर आए वे बाहरी लोग हैं जिन्हें तिरंगे से लेना-देना नहीं है? उन्हें यह नज़र आया कि लाल किले पर एक धार्मिक झंडा लगाया गया- जो वाकई ग़लत था- लेकिन यह नज़र नहीं आया कि उस वक़्त भी लाल किले के भीतर मौजूद किसानों के हाथ में सैकड़ों तिरंगे लहरा रहे थे? योगेंद्र यादव ने ठीक कहा कि इस 26 जनवरी को दिल्ली की सड़कों पर जितने तिरंगे नजर आए उतने शायद ही कभी नज़र आए हों.
लेकिन विरोधियों को तथ्य नहीं, बहाना चाहिए- किसानों को सरहदों से भगाने का बहाना. ये विरोधी बहुत मज़बूत हैं. किसानों की अमीरी और गाड़ियों पर सवाल उठाने वाले इन विरोधियों के पास कितना और कहां का पैसा जमा है- यह किसी को नहीं पता. फिर इनके साथ सरकार भी है जो जितनी नकली बातचीत करती है, उतनी ही नकली शांतिप्रियता का दम भी भरती है. वह कई बार गुंडों की पीठ पर खड़ी दिखती है- यह अनुभव भीमा कोरेगांव से लेकर शाहीन बाग और दिल्ली दंगों की जांच से लेकर किसान आंदोलन के साथ सलूक में दिखता है. वह एजेंसियों का एजेंटों की तरह इस्तेमाल करती है.
तो यह बहुत साफ़ है कि आंदोलन को आगे से ऐसी किसी चूक से बचना होगा जो उसकी साख कमज़ोर करे. फिर उसे कम से कम दो-तीन और नए लक्ष्य तय करने होंगे. अब यह आंदोलन सिर्फ़ तीन क़ानूनों की वापसी का नहीं है, भारतीयता और लोकतंत्र के बड़े मूल्यों का भी आंदोलन है. अब इसे वे दो भ्रम तोड़ने होंगे जो सरकार और उसके समर्थक पैदा कर रहे हैं. पहला तो यही कि यह सिर्फ पंजाब-हरियाणा का आंदोलन है. इसे टिकैत ने भी तोड़ दिया है और महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक से मिल रहे किसानों के समर्थन ने भी. दूसरा और नया टकराव और हिंदू और सिख जज़्बात के बीच पैदा किया जा रहा है. यह भी बीजेपी और संघ परिवार की पुरानी रणनीति रही है.
बेशक, इसके अलावा उन्हें यह रणनीति भी बनानी होगी कि अगर तीन क़ानून वापस हो जाते हैं तो उसके बाद क्या करना होगा. क्योंकि यह सच है कि इन क़ानूनों से उनका भला होना है या नहीं, लेकिन कृषि क्षेत्र की बेहतरी के लिए नए क़दमों की ज़रूरत है. ये नए कदम क्या होंगे- यह भी इस आंदोलन को तय करना होगा. बहुत संभव है कि जब आंदोलन इस दिशा में सोचे तो यह पाएगा कि दरअसल मामला तीन क़ानूनों की वापसी का नहीं, पूरी बाज़ार व्यवस्था की वापसी का है.
अगर यह न भी हो तो कम से कम जिसे क्रोनी कैपिटलिज़्म कहते हैं- यानी चंपू पूंजीवाद- उसके निर्णायक अंत के बिना बात नहीं बननी है. क्या किसान आंदोलन यह सारी ज़िम्मेदारी निभाने को तैयार है? तीन दर्जन संगठनों को अपने साथ जोड़े रखकर उसने साबित किया है कि उसमें एक बड़ी संभावना है. अरसे बाद इस देश में कोई आंदोलन इस मज़बूती के साथ ग्रामीण क्षेत्रों से उठ कर दिल्ली आया है. यह गांव की पुकार है जो महानगर को बदल सकती है.
राकेश टिकैत के प्रसंग ने साबित किया है कि एक आदमी की हिम्मत क्या कुछ नहीं कर सकती. इतिहास महान लोगों से नहीं, प्रतिबद्ध लोगों से बनता है, वह मरने-मारने की हद तक पहुंची मजबूरियों के बीच बनता है. बहुत सारे कमज़ोर दिखने वाले लोग जब एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर खड़े हो जाते हैं, तब इतिहास बनता है और यह इतिहास इन मामूली लोगों को बड़ा बना डालता है. आज हिंदुस्तान को उसके इन्हीं मामूली लोगों से सबसे ज़्यादा उम्मीद है.
प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं...
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