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लालू परिवार के 'VIP' गढ़ की बदहाली! राघोपुर में रस्सी के सहारे नदी पार करते हैं छात्र, फाइलों में 'मौसम गुलाबी'

लालू परिवार के 30-35 साल के राज वाली 'VIP' सीट राघोपुर के रामपुर श्यामचंद वार्ड-1 में पुल और नाव नहीं है. बच्चे रस्सी-केले के पेड़ की चचरी से नदी पार कर स्कूल जाते हैं.

लालू परिवार के 'VIP' गढ़ की बदहाली! राघोपुर में रस्सी के सहारे नदी पार करते हैं छात्र, फाइलों में 'मौसम गुलाबी'
राघोपुर में रस्सी के जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं लोग (Photo: NDTV)
राघोपुर:

बिहार में क्या प्रशासन और नेता किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं? क्या मासूमों की जान की कीमत सिर्फ एक सरकारी फाइल तक सीमित है? ये सवाल हम नहीं, बल्कि राघोपुर के रामपुर श्यामचंद गांव के लोग पूछ रहे हैं. यह वही राघोपुर है, जहां से पिछले 30 से 35 साल से लालू परिवार का राज रहा है. यह वही विधानसभा क्षेत्र है, जहां पर लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव जैसे बड़े चेहरे प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं. लेकिन आज इस 'वीआईपी' विधानसभा क्षेत्र के वार्ड नंबर एक की हालत खस्ता है. राघोपुर के हालात सुदूर और पिछड़े देश के नहीं, बल्कि बिहार के सबसे हाई-प्रोफाइल विधानसभा क्षेत्रों में से एक के हैं. रामपुर श्यामचंद गांव के वार्ड नंबर एक में आज भी एक बड़ी आबादी इसी तरह मौत को हथेली पर लेकर जी रही है.

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न सरकारी नाव है, न पुल. लोग खुद के बनाए जुगाड़ यानी केले के पेड़ और पुराने फोम की चचरी के सहारे, एक रस्सी को पकड़कर रोज़मर्रा का सामान लाने को मजबूर हैं.
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इस खौफनाक सफर में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं, जिन्हें हर दिन जान हथेली पर रख कर स्कूल जाना पड़ता है. महिलाओं को घुटने भर मिट्टी और दलदल से कपड़े उठाकर पार होना पड़ता है. इसी गांव में तीन दिन पहले  बड़ा हादसा हो चुका है, लेकिन प्रशासन ने उससे कोई सबक नहीं लिया.

छात्रों ने सुनाया दर्दनाक अनुभव...

छात्र रौशन कहते हैं, "हम लोग पिछले तीन साल से इसी तरह रस्सी पकड़कर नदी पार कर रहे हैं. हाल ही में हुए हादसे में बच्चों की मौत के बाद हमें भी डर लगने लगा है. लेकिन पढ़ाई के लिए जाना मजबूरी है.

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गांव के एक निवासी रवि यादव कहते हैं, "यहां भी प्रशासन और नेता किसी के मरने का इंतजार कर रहे हैं. जब घटना घट जाएगी, तो सारे नेता और अधिकारी फोटो खिंचवाने और मुआवजा देने आएंगे. अभी कोई देखने वाला नहीं है कि हम किस स्थिति में हैं. कागज पर नाव चल रही है, उसका पैसा भी अधिकारी उठा रहे हैं, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं है. अधिकारियों को कई बार बताया लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है.

अब विडंबना देखिए कि इतनी बड़ी घटना के बाद जिलाधिकारी और प्रशासन कोई सुध नहीं ले रहा है. आज भी टूटी-फूटी नाव तो दूर ग्रामीण अपने जुगाड़ की नाव से सफर करने को मजबूर है. डीएम वर्षा सिंह का कहना है कि 6 बड़ी नाव और 150 सरकारी नाव की व्यवस्था है लेकिन यह सिर्फ कागज पर ही मौजूद है.

राघोपुर की जनता पिछले तीन दशकों से एक ही परिवार के बड़े दिग्गजों को चुनती आ रही है. इस लिस्ट में लालू यादव, राबड़ी देवी और अब तेजस्वी यादव का नाम शामिल है. लेकिन विडंबना देखिए, मानसिकता ऐसी बना दी गई है कि यहां के लोगों को बाढ़ और इस त्रासदी को अपनी किस्मत मानकर झेलने की आदत हो गई है. कागजों पर नावों का भुगतान हो रहा है और जमीन पर लोग मौत के साए में जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं. सरकार, नेता और प्रशासन सब कुंभकर्णी नींद सोए हुए हैं. सवाल यही है कि क्या सोई हुई व्यवस्था की नींद तभी खुलेगी, जब यहां भी कोई मासूम अपनी जान गंवा देगा?

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