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This Article is From Dec 27, 2018

खेती नहीं खेल का मैदान: सिर्फ क्रिकेटरों को ही नहीं, यहां किसानों को भी खूब भा रहा क्रिकेट...

खेती में घाटे को देखते हुए नोएडा-ग्रेटर नोएडा के किसानों ने खेतों में खेल के मैदान तैयार करने शुरू कर दिए हैं. हर मैच के 4000 से 10000 रु तक किसानों को मिल रहे हैं.

गौड़ चौक के आसपास जो ज़मीन कभी अन्न उगलती थी, वहां करीब 15 मैदान बन चुके हैं.

नई दिल्ली:

खेती में घाटे को देखते हुए नोएडा-ग्रेटर नोएडा के किसानों ने खेतों में खेल के मैदान तैयार करने शुरू कर दिए हैं. हर मैच के 4000 से 10000 रु तक किसानों को मिल रहे हैं. गौड़ चौक के 7 किलोमीटर के दायरे में ऐसे करीब 15 मैदान बन चुके हैं. जो ज़मीन कभी अन्न उगलती थी, अब रन उगल रही है. रोलर भी है और प्रैक्टिस के लिए पिच भी. डे-नाइट मैचों का भी इंतज़ाम हो रहा है. NCR प्ले ग्राउंड का 15,000 गज के मैदान में फ्लडलाइट के लिए पिलर भी लगने शुरू हो गए हैं. काम 15 जनवरी तक पूरा हो जाएगा. इस ग्राउंड के मालिक मूलचंद शर्मा बताते हैं कि पहले इस ग्राउंड पर गेहूं, ज्वार बाजरा की दो तीन फसलें हो पाती थीं. उससे कोई लागत नहीं निकलती थी. मुनाफा तो दूर की बात है.

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सोमवार से शुक्रवार तक चार हज़ार में मिल जाता है. शनिवार-इतवार को 10,000 रुपये हर मैच के मिल जाते हैं. आम दिनों में आसपास बनी गगनचुम्बी इमारतों के बच्चे, गांव के लोग और छुट्टी वाले दिन कॉर्पोरेट ऑफिस के लोग मैच खेलते हैं. दो गांव के बीच चल रहे मैच के खिलाड़ी रोहित यादव कहते हैं कि एक टी-20 मैच का 4000 रु देना होता है. शनिवार-रविवार को कीमत दोगुनी से ज़्यादा हो जाती है, पर सबसे बड़ी बात यह है कि पैसे की कोई बात नहीं. हमारे लिए प्ले ग्राउंड की है. पहले गांव में देसी ग्राउंड पर ही खेलते थे. अब यहां खेलना एक सुखद अनुभव है.

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बीते 6 महीनों में ही दर्जनों और ऐसे ग्राउंड तैयार हो गए हैं और खेत से ज़्यादा खेल का मैदान किसानों को लुभा रहा है. नोएडा क्रिकेट ग्राउंड के ग्राउंड मैनेजर मोहम्मद आसिफ भी खेती को नुकसानदायक करार दे रहे हैं. कहते हैं पहले इस जमीन में गेहूं और मौसमी सब्ज़ी उगती थी. पर उसमे ज़्यादा फायदा ना देख ही इसको खेल के मैदान में तब्दील किया गया है. 

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इसे शहरीकरण का साइड इफ़ेक्ट कहिये या किसानों की सूझबूझ जिनको पता है कि अपनी ज़मीन पर साल भर जी तोड़ मेहनत के बाद भी फायदा तो दूर...लागत भी निकल पायेगी की नहीं. ऐसे में शहरों में खेलों के लिए घटती जगह को भांपते हुए किसानों ने कारोबार का ये रास्ता चुना है.

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