दूरदर्शन का दौर सिर्फ टीवी देखने का नहीं, बल्कि कहानियां जीने का दौर था. उस वक्त हर रविवार कोई न कोई ऐसा शो आता था. जिसका इंतजार पूरे परिवार को रहता था. लेकिन एक सीरीज ऐसी भी थी. जिसमें न कोई सुपरहीरो था, न कोई बड़ा विलेन और न ही महंगे सेट. फिर भी लोगों ने इसे खूब पसंद किया. वजह थी इसकी अलग सोच. इसमें एक ऐसी जगह को कहानी का हिस्सा बनाया गया. जहां हर दिन लाखों लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं, हंसते हैं और अपनी जिंदगी का नया सफर शुरू करते हैं.
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जब ट्रेन का हर डिब्बा बन गया एक नई कहानी
हम बात कर रहे हैं दूरदर्शन के मशहूर शो 'यात्रा' की. साल 1986 में आई इस सीरीज का डायरेक्शन दिग्गज फिल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था. सिर्फ 15 एपिसोड की ये सीरीज आज भी दूरदर्शन के सबसे अलग और यादगार शोज में गिनी जाती है. इस शो की सबसे बड़ी खासियत इसकी कहानी थी. पूरी सीरीज ट्रेन के सफर के इर्द-गिर्द घूमती थी. हर स्टेशन पर नए यात्री चढ़ते, कुछ उतर जाते और उनके साथ शुरू हो जाती एक नई कहानी. किसी के चेहरे पर मुस्कान होती, कोई दर्द छिपा रहा होता, कोई नई उम्मीद लेकर सफर कर रहा होता तो कोई जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानी से जूझ रहा होता. यही वजह थी कि हर एपिसोड बिल्कुल नया और दिलचस्प लगता था. इस सीरीज में ओम पुरी, नीना गुप्ता, इला अरुण, मोहन गोखले और हरीश पटेल जैसे शानदार कलाकार नजर आए थे. शो की शूटिंग कन्याकुमारी से जम्मू तवी और जैसलमेर से डूम डूमा तक भारत के अलग-अलग हिस्सों में हुई. यानी दर्शकों को एक ही सीरीज में पूरे देश की झलक देखने को मिल जाती थी.

असली ट्रेन में शूटिंग, असली किस्से
दिलचस्प बात ये है कि 'यात्रा' को भारतीय रेलवे ने स्पॉन्सर किया था. श्याम बेनेगल ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने जानबूझकर भारत की सबसे लंबी रेल यात्राओं को चुना. ताकि लोग सिर्फ ट्रेन नहीं, बल्कि उसके जरिए पूरे देश को महसूस कर सकें. शूटिंग के लिए पूरी टीम के पास एक स्पेशल ट्रेन थी, जो अपने आप में किसी एडवेंचर से कम नहीं थी. 'यात्रा' सिर्फ मनोरंजन नहीं थी. ये उस दौर का ऐसा शो था, जो समाज की सच्चाई भी बेझिझक दिखाता था. लूटपाट, रेल हादसे, आत्महत्या की कोशिश, यौन उत्पीड़न, इंसानी रिश्ते, उम्मीद और संघर्ष जैसे कई गंभीर मुद्दों को इसमें बेहद संवेदनशील तरीके से पेश किया गया. श्याम बेनेगल ने बताया था कि ज्यादातर शूटिंग चलती ट्रेन में ही हुई. इतना ही नहीं, जब भी ट्रेन किसी नए स्टेशन पर रुकती, कलाकार और पूरी टीम वहां अचानक छोटे-छोटे म्यूजिकल परफॉर्मेंस करने लगती. कई बार उनकी स्पेशल ट्रेन को पहले रास्ता दिया जाता, तो कई बार दूसरी ट्रेनों के निकलने का इंतजार भी करना पड़ता था.
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