
नई दिल्ली:
राष्ट्रीय राजधानी के कमानी सभागार में रमा पांडे निर्देशित नाटक 'गिरफ्तारी' का मंचन किया गया, जो जर्मन लेखक फ्रांज काफ्का के लोकप्रिय उपन्यास 'द ट्रायल' का रूपांतरण है. इस नाटक का मंचन रमा थिएटर नाट्य विद्या (रतनाव) के उद्घाटन अवसर पर किया गया.
'गिरफ्तारी' एक आम आदमी की कहानी है, जो समाज से विमुख हो गया है. निर्देशक ने इस नाटक में मरणासन्न हो चले भारतीय मौखिक और लोकरूपों का इस्तेमाल किया है. राजस्थान के कीरट, ताशा, ढोल और दिल्ली के नाफीरी वाद्ययंत्र जैसे कलारूपों को शामिल किया गया.
यह नाटक हमें उन भयावह जीवन-स्थितियों से दो-चार कराता है, जिसमें आदमी को यह तक नहीं पता चल पाता कि वह किन वजहों से सताया जा रहा है. उपन्यास का मुख्य किरदार जोसेफ एक दिन अपने को बिना कारण न सिर्फ गिरफ्तार हुआ पाता है, बल्कि एक अनजाने-अनकिए गुनाह से खुद को बचाने की जद्दोजहद में धीरे-धीरे और फंसता ही चला जाता है.
काफ्का के इस उपन्यास में जो बात एक आतंक की तरह जेहन में घर कर लेती है, वह यह कि जोसेफ जैसी नियति कोरी कल्पना नहीं है. 'द ट्रायल' के लिखे जाने के कुछ ही बरस बाद कई निर्दोष लोगों को बिना बताए यातनाघरों में भेज दिया गया था! उनमें से कइयों के वापस न लौटने की याद भर से आज भी इंसानी रूह कांप उठती है.
नाटक 'गिरफ्तारी' की कथावस्तु काफी उत्सुकता भरी है और लोग इससे खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं. रतनाव की प्रमुख और संस्थापक रमा पांडे इस नाटक की निर्देशक हैं. रमा थिएटर नाट्य विद्या (रतनाव) इस नाटक के मंचन के साथ ही भारत की समृद्ध मौखिक परंपराओं की रक्षा के लिए अपना प्रयास शुरू कर रहा है.
रमा पांडे ने कहा, "मैं थिएटर और टीवी के माध्यम से मौखिक परंपरा के सौंदर्य को सामने लाने का प्रयास कर रही हूं. रतनाव और दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर मेरा टेलीविजन शो 'जानें अपना देश' इस दिशा में किए गए मेरे प्रयासों में शामिल हैं."
रतनाव कलाकारों की आजीविका के लिए काम करता है और थिएटर प्रदर्शन के माध्यम से उनकी कला को बढ़ावा देता है. इसका उद्देश्य विभिन्न मौखिक कला रूपों को दुनिया के सामने लाना है.
न्यूज एजेंसी आईएएनएस से इनपुट
'गिरफ्तारी' एक आम आदमी की कहानी है, जो समाज से विमुख हो गया है. निर्देशक ने इस नाटक में मरणासन्न हो चले भारतीय मौखिक और लोकरूपों का इस्तेमाल किया है. राजस्थान के कीरट, ताशा, ढोल और दिल्ली के नाफीरी वाद्ययंत्र जैसे कलारूपों को शामिल किया गया.
यह नाटक हमें उन भयावह जीवन-स्थितियों से दो-चार कराता है, जिसमें आदमी को यह तक नहीं पता चल पाता कि वह किन वजहों से सताया जा रहा है. उपन्यास का मुख्य किरदार जोसेफ एक दिन अपने को बिना कारण न सिर्फ गिरफ्तार हुआ पाता है, बल्कि एक अनजाने-अनकिए गुनाह से खुद को बचाने की जद्दोजहद में धीरे-धीरे और फंसता ही चला जाता है.
काफ्का के इस उपन्यास में जो बात एक आतंक की तरह जेहन में घर कर लेती है, वह यह कि जोसेफ जैसी नियति कोरी कल्पना नहीं है. 'द ट्रायल' के लिखे जाने के कुछ ही बरस बाद कई निर्दोष लोगों को बिना बताए यातनाघरों में भेज दिया गया था! उनमें से कइयों के वापस न लौटने की याद भर से आज भी इंसानी रूह कांप उठती है.
नाटक 'गिरफ्तारी' की कथावस्तु काफी उत्सुकता भरी है और लोग इससे खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं. रतनाव की प्रमुख और संस्थापक रमा पांडे इस नाटक की निर्देशक हैं. रमा थिएटर नाट्य विद्या (रतनाव) इस नाटक के मंचन के साथ ही भारत की समृद्ध मौखिक परंपराओं की रक्षा के लिए अपना प्रयास शुरू कर रहा है.
रमा पांडे ने कहा, "मैं थिएटर और टीवी के माध्यम से मौखिक परंपरा के सौंदर्य को सामने लाने का प्रयास कर रही हूं. रतनाव और दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर मेरा टेलीविजन शो 'जानें अपना देश' इस दिशा में किए गए मेरे प्रयासों में शामिल हैं."
रतनाव कलाकारों की आजीविका के लिए काम करता है और थिएटर प्रदर्शन के माध्यम से उनकी कला को बढ़ावा देता है. इसका उद्देश्य विभिन्न मौखिक कला रूपों को दुनिया के सामने लाना है.
न्यूज एजेंसी आईएएनएस से इनपुट