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थकान के बावजूद रात में सोने का मन क्यों नहीं करता? जानिए क्या है 'Revenge Bedtime' और इससे कैसे निकलें

डॉ. पंडिता के अनुसार नींद को दिन के अंत में बचा हुआ समय देना सही तरीका नहीं है. अगर हमें अपने लिए समय सिर्फ रात में मिल रहा है, तो हमें अपनी दिनचर्या में बदलाव करना चाहिए, न कि उस समय की कीमत अपनी नींद से चुकानी चाहिए.

थकान के बावजूद रात में सोने का मन क्यों नहीं करता? जानिए क्या है 'Revenge Bedtime' और इससे कैसे निकलें
रिवेंज बेडटाइम प्रोक्रास्टिनेशन क्या होता है?
Photo Credit: NDTV

दिनभर काम, घर की जिम्मेदारियां, ट्रैफिक और फोन कॉल्स के बीच शायद ही कभी ऐसा लगता है कि समय पूरी तरह अपना है. फिर रात आती है शरीर थका हुआ है, आंखें नींद से भारी हैं, लेकिन बिस्तर पर जाने का मन नहीं करता. मन कहता है थोड़ी देर फोन देख लेते हैं. एक एपिसोड और देख लेते हैं. कुछ रील्स देख लेते हैं. बस थोड़ी देर अपने लिए और इसी थोड़ी देर में रात के 12 या 1 बज जाते हैं. इस व्यवहार को 'Revenge Bedtime Procrastination' कहा जाता है. आसान शब्दों में कहें तो दिन में अपने लिए समय न मिलने की भरपाई करने के लिए व्यक्ति जानबूझकर सोने का समय पीछे करता रहता है. आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं. इसकी जानकारी फोर्टिस हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर नेहा पंडिता ने दी है.

दिमाग रात में ही अपना समय क्यों मांगता है?

डॉक्टर बताती हैं कि इसके पीछे सिर्फ मोबाइल या OTT की भूमिका नहीं है. असल में कई लोगों को दिन के दौरान अपने लिए कोई समय नहीं मिल पाता. सुबह जल्दी उठना, ऑफिस, घर का काम, बच्चों की जिम्मेदारी और लगातार आने वाले मैसेज दिन खत्म होते-होते व्यक्ति खुद के लिए कुछ करना चाहता है. इसलिए रात में किताब पढ़ना, दोस्त से बात करना, कोई शो देखना या बस चुपचाप फोन चलाना उसे अच्छा लगता है. समस्या तब शुरू होती है जब यह रोज की आदत बन जाती है. एक घंटे की नींद कम करना शायद बहुत बड़ी बात न लगे, लेकिन अगर यह हर रात हो रहा है तो कुछ ही दिनों में Sleep Debt बढ़ने लगता है. सुबह उठना मुश्किल होता है, दिन में थकान रहती है और एकाग्रता प्रभावित हो सकती है. फिर शाम को वही व्यक्ति खुद को इतना थका हुआ पाता है कि उसे आराम चाहिए. लेकिन रात में फिर अपने लिए समय निकालने की इच्छा होती है. यानी एक चक्र बन जाता है- दिन में थकान, रात में अपने लिए समय की तलाश और उस समय के लिए नींद का त्याग. 

फोन से आदत होती है खराब

फोन इस आदत को और आसान बना देता है. सोने से पहले फोन उठाना अपने आप में असामान्य नहीं है. परेशानी तब होती है जब फोन हमें रुकने का कोई मौका ही नहीं देता. एक रील खत्म हुई तो दूसरी सामने है. एक मैसेज का जवाब दिया तो दूसरा आ गया. एक एपिसोड खत्म हुआ तो अगला अपने आप शुरू हो गया. दिमाग को लगातार नई इंफोर्मेशन मिलती रहती है और अचानक सोने की तैयारी करना मुश्किल हो सकता है. इसके अलावा, देर रात फोन इस्तेमाल करने की आदत अक्सर बेडटाइम को और पीछे धकेल देती है.

इस आदत से निकलने के लिए क्या करें?

  • सिर्फ खुद से यह कहना कि 'आज जल्दी सोऊंगा' हमेशा काफी नहीं होता. पहले यह समझना जरूरी है कि आप रात में जाग क्यों रहे हैं. अगर आपको लगता है कि पूरा दिन सिर्फ काम और जिम्मेदारियों में निकल जाता है, तो अपने लिए थोड़ा समय दिन में ही निकालने की कोशिश करें. 20–30 मिनट की वॉक, किताब, संगीत या परिवार के साथ बिना फोन के बैठना भी मदद कर सकता है. 
  • सोने और जागने का समय भी जितना संभव हो, नियमित रखें. अचानक बहुत जल्दी सोने की कोशिश करने के बजाय बेडटाइम को धीरे-धीरे पहले लाना ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है. 
  • अगर फोन सबसे बड़ा डिस्ट्रैक्शन है, तो उसे बिस्तर से थोड़ा दूर रखना आसान लेकिन प्रभावी कदम हो सकता है.
  • एक और उपयोगी आदत है काम खत्म करने का छोटा-सा रुटीन. अगले दिन के जरूरी काम लिख दें, पेंडिंग टास्क नोट कर लें और फिर लैपटॉप बंद करें. इससे रात में बार-बार यही सोचने की जरूरत कम होती है कि 'कल क्या-क्या करना है?'

कब डॉक्टर से बात करनी चाहिए?

हर देर रात तक जागने वाला व्यक्ति स्लीप डिसऑर्डर से पीड़ित नहीं होता. लेकिन अगर पर्याप्त समय मिलने के बावजूद नींद नहीं आती, रात में बार-बार नींद टूटती है, दिन में बहुत ज्यादा नींद आती है या लंबे समय से थकान और एकाग्रता की समस्या बनी हुई है, तो इसे केवल लाइफस्टाइल की आदत मानकर छोड़ना ठीक नहीं है. डॉ. पंडिता के अनुसार नींद को दिन के अंत में बचा हुआ समय देना सही तरीका नहीं है. अगर हमें अपने लिए समय सिर्फ रात में मिल रहा है, तो हमें अपनी दिनचर्या में बदलाव करना चाहिए, न कि उस समय की कीमत अपनी नींद से चुकानी चाहिए. दिमाग को काम करने के लिए जितना समय चाहिए, उतना ही रिकवरी के लिए भी चाहिए. 

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