अक्सर माता-पिता शिकायत करते हैं कि बड़े होने के बाद बच्चे उनकी बात नहीं सुनते, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसकी शुरुआत बचपन से ही होती है. अगर शुरुआती वर्षों में बच्चों के साथ भरोसे और अपनापन का रिश्ता बनाया जाए तो बड़े होने पर भी वे माता-पिता से खुलकर जुड़ाव महसूस करते हैं. हालांकि, दोस्त बनने की कोशिश में पैरेंट होने की जिम्मेदारी और सीमाएं नहीं भूलनी चाहिए.
भविष्य तय करता है बचपन का रिश्ता
एक्सपर्ट डॉ. आमिर खान के अनुसार, साइकोलॉजी में इसे 'अटैचमेंट विंडो' कहा जाता है. इसका मतलब है कि बच्चे के शुरुआती साल उसके भावनात्मक विकास की नींव रखते हैं. इसी दौरान बना रिश्ता आगे चलकर माता-पिता और बच्चे के बीच भरोसे को मजबूत करता है.
खिलौने नहीं साथ बिताया समय रहता है याद
डॉ. आमिर खान बताते हैं कि बच्चों को बड़े होकर यह याद नहीं रहता कि बचपन में कौन-सा महंगा खिलौना मिला था. उन्हें वे पल याद रहते हैं, जब माता-पिता ने उनके साथ समय बिताया, खेला, बातें कीं और उन्हें समझा. यही यादें रिश्ते को मजबूत बनाती हैं.
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दोस्त बनें पर गाइड भी रहें
एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करें ताकि वे हर बात खुलकर कह सकें. लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें सही-गलत समझाना, नियम बनाना और सीमाएं तय करना भी माता-पिता की जिम्मेदारी है.
भरोसा और अनुशासन का रखें संतुलन
सही पेरेंटिंग का मतलब बच्चों को पूरी आजादी देना नहीं, बल्कि उन्हें प्यार, भरोसा और अनुशासन के साथ आगे बढ़ाना है. यही संतुलन बच्चों को आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है.
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