बच्चों का बात न मानना, बार-बार समझाने पर भी अपनी जिद पर अड़े रहना और घर में सामान फैलाना कई माता-पिता के लिए परेशानी का कारण बन जाता है. ऐसी स्थिति में अक्सर पेरेंट्स अपना आपा खो देते हैं और बच्चे पर चिल्लाने लगते हैं. शुरुआत में बच्चा डरकर बात मान भी लेता है, लेकिन इससे वह आपकी बात समझने लगेगा, यह जरूरी नहीं है. ऐसे में सवाल है कि आखिर बच्चे को बिना डांटे अपनी बात कैसे समझाएं. बच्चों की परवरिश से जुड़े एक्सपर्ट की सलाह के मुताबिक, धैर्य रखना, बच्चे की भावनाओं को समझना और सही व्यवहार की तारीफ करना बेहतर पेरेंटिंग में मदद कर सकता है. आइए पेरेंटिंग कोच मनीषा से जानते हैं कुछ आसान टिप्स.
पहले समझें कि बच्चा बात क्यों नहीं मान रहा
पेरेंटिंग एक्सपर्ट मनीषा ने बताया कि हर बार बच्चे का बात न मानना उसकी शरारत या जानबूझकर परेशान करने की कोशिश नहीं होती है. कई बार वह खेल में व्यस्त होता है या उसे यह समझने में समय लगता है कि आप उससे क्या चाहते हैं. ऐसे में अचानक चिल्लाने के बजाय उसे पहले से बताएं कि खेलने का समय खत्म होने वाला है. इससे उसे अपना काम रोकने के लिए समय मिलेगा.
बच्चे पर बार-बार चिल्लाने से बचें
एक्सपर्ट ने बताया कि बच्चे की गलती पर गुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन हर बार चिल्लाना सही तरीका नहीं है. इससे बच्चा डरकर आपकी बात माान सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह आपकी बात का मतलब भी समझे. बेहतर होगा कि आप शांत आवाज में उसे बताएं कि उसका व्यवहार गलत क्यों है और उससे क्या उम्मीद की जा रही है.
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अच्छी आदतों के लिए बच्चे की तारीफ करें
इसके अलावा उन्होंने कहा कि अगर बच्चा अपने खिलौने समेटता है, सामान सही जगह रखता है या आपकी बात सुनकर कोई काम करता है तो उसकी तारीफ जरूर करें. आाप उससे कह सकते हैं, 'आज तुमने अपने खिलौने खुद समेटे, मुझे बहुत अच्छा लगा.' इस तरह की सच्ची और खाास तारीफ बच्चे को अच्छा व्यवहार दोहराने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है.
अपनी बात साफ और छोटे शब्दों में कहें
मनीषा ने आगे बताया कि छोटे बच्चों को एक साथ कई निर्देश देने से वे उलझ सकते हैं. इसलिए उन्हें एक बार में एक ही बात बताएं. जैसे, 'अपने खिलौने डिब्बे में रख दो.' निर्देश साफ होगा तो बच्चे के लिए उसे समझना और पूरा करना आसाान हो सकता है.
बदलाव के लिए बच्चे को समय दें
उन्होंने बताया कि बच्चों की आदतें एक दिन में नहीं बदलतीं है. इसलिए अगर बच्चा आज आपकी बात मानता है और अगले दिन फिर वही गलती करता है तो निराश न हों. एक ही नियम को धैर्य के साथ लगाताार समझाएं और खुद भी उसका पालन करें.
बच्चे की भावनाओं को भी समझें
बता दें कि याद रखें कि पेरेंटिंग का मतलब सिर्फ बच्चे से अपनी बाात मनवाना नहीं, बल्कि उसे सही-गलत समझने में मदद करना भी है. अगर बच्चा लगातार बहुत ज्यादा गुस्सा करता है, निर्देश समझने में परेशानी होती है या उसका व्यवहार रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है तो बाल रोग विशेषज्ञ या बाल मनोवैज्ञानिक से सलाह लेनाा बेहतर होगा.
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