UPSC के 100 साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिविल सर्विसेस में जाने वाले युवाओं को कई तरह की सलाह दी. इस दौरान पीएम मोदी ने सुभाष चंद्र बोस का भी जिक्र किया, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान इंडियन सिविल सर्विस यानी CSE परीक्षा को सिर्फ क्रैक नहीं किया, बल्कि इसमें टॉप किया था. इस बड़ी परीक्षा में उनकी चौथी रैंक आई थी. पीएम मोदी ने इस बात पर फोकस किया कि उस वक्त जब अंग्रेजी हुकूमत थी, तब सिविल सर्विस एग्जाम में संस्कृत का पेपर हुआ करता था. सुभाष चंद्र बोस ने भी संस्कृत में पेपर लिखा था. ऐसे में आज हम आपको बोस की सिविल सर्विस क्रैक करने और बाद में इस्तीफा देने की पूरी कहानी बताएंगे, साथ ही ये भी जानेंगे कि इसमें उनका मुख्य विषय क्या था.
यहां से शुरू हुई कहानी
सुभाष चंद्र बोस के पिता बैरिस्टर हुआ करते थे. स्कूली दिनों से ही बोस पढ़ाई में काफी तेज थे. उन्होंने कैम्ब्रिज यूनवर्सिटी से पढ़ाई की और इसके बाद उनके पिता ने उन्हें इंडियन सिविल सर्विस (CSE) में जाने का सुझाव दिया. तब सिविल सर्विस में जाना भारतीयों के लिए काफी ज्यादा मुश्किल काम था. इसकी पढ़ाई के लिए लंदन जाना पड़ता था और वहीं परीक्षा भी होती थी.
कुछ ही महीनों में पूरी कर ली पढ़ाई
साल 1919 में लंदन जाकर सिविल सर्विस की तैयारी करने में करीब चार साल का वक्त लगता था, लेकिन सुभाष चंद्र बोस इतने शार्प थे कि उन्होंने करीब 8 से 9 महीने में ही इसे पूरा कर लिया. इसके बाद उन्होंने CSE में तमाम अंग्रेजों को पीछा छोड़ते हुए चौथी रैंक हासिल की और टॉप कर लिया. अंग्रेज भी हैरान थे कि एक भारतीय उनकी सबसे मुश्किल परीक्षा को इतनी आसानी से कैसे पास कर सकता है.
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ये था मुख्य विषय
सिविल सर्विस के लिए होने वाले एग्जाम में सुभाष चंद्र बोस ने इतिहास को अपने मुख्य विषय के तौर पर चुना था. इसके अलावा इंग्लिश, संस्कृत और जियोग्राफी जैसे सब्जेक्ट के पेपर शामिल थे. संस्कृत में उनके 800 में से 266 नंबर आए थे, वहीं अंग्रेजी में 500 में से 366 नंबर मिले थे. उस दौर में सिविल सर्विस एग्जाम कुल 6000 नंबर का हुआ करता था, जिसमें से बोस के 2281 नंबर आए थे.
बोस की मार्कशीट -

ICS अधिकारी बनकर दे दिया इस्तीफा
सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई और उनका विरोध किया. यही वजह है कि उन्होंने उस दौर की सबसे बड़ी नौकरी को लात मार दी. उनका कहना था कि वो अंग्रेजों के आदेश पर काम नहीं कर सकते हैं. उनके इस फैसले ने अंग्रेज अधिकारियों समेत उनके परिवार को भी चौंका दिया था. इसके बाद आजादी के आंदोलन में बोस ने काफी अहम भूमिका निभाई और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए. उन्हें आजादी की लड़ाई लड़ने वाले गरम दल का नेता माना जाता था. बाद में अंग्रेजों से लड़ने के लिए उन्होंने अपनी आजाद हिंद फौज बनाई.
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