विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि 2025 का SIR, 2003 में हुए विशेष पुनरीक्षण से कई मायनों में अलग है. उनका कहना था कि जहां 2003 में मतदाता सूची को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी चुनावी मशीनरी पर थी, वहीं 2025 में यह बोझ काफी हद तक मतदाताओं पर डाल दिया गया.
फॉर्म भरने से लेकर दस्तावेज देने और नागरिकता सत्यापित कराने तक कई नई शर्तों ने विवाद को जन्म दिया है. इसी बीच कई राज्यों में बड़ी संख्या में नाम हटने के आंकड़े भी चर्चा के केंद्र में हैं.
2003 और 2025 के SIR में क्या बताया गया बड़ा अंतर?
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के मुताबिक, 2003 के विशेष पुनरीक्षण और 2025 के SIR के बीच सबसे बड़ा अंतर मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया को लेकर है.
नाम जोड़ने की जिम्मेदारी किसकी?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2003 में योग्य नागरिकों के नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने की पूरी जिम्मेदारी एन्यूमेरेटर (Enumerator) की होती थी, जिसे अब बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) कहा जाता है.
एन्यूमेरेटर घर-घर जाकर जानकारी जुटाता था और पात्र लोगों के नाम सूची में जोड़ने, हटाने या सुधारने की प्रक्रिया पूरी करता था. इसके विपरीत, 2025 के SIR में मतदाता को खुद आगे आकर आवश्यक जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है.
फॉर्म और समय-सीमा पर सवाल
याचिका में कहा गया कि 2003 के पुनरीक्षण में सामान्य मतदाता को कोई अलग फॉर्म भरने की जरूरत नहीं पड़ती थी. एन्यूमेरेटर परिवार के मुखिया या वरिष्ठ सदस्य से जानकारी लेकर रिकॉर्ड अपडेट कर देता था.
वहीं 2025 के SIR में मतदाताओं को निर्धारित फॉर्म भरने और तय समयसीमा के भीतर जमा करने के लिए कहा गया. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे उन लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा जो दस्तावेजी या डिजिटल प्रक्रियाओं से परिचित नहीं हैं.
दस्तावेजों की अनिवार्यता
याचिकाकर्ताओं का एक बड़ा आरोप यह भी है कि 2003 के पुनरीक्षण में संभावित मतदाताओं के लिए कम से कम एक पहचान दस्तावेज प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं था. इसके उलट 2025 के SIR में पहचान और अन्य दस्तावेजों को अहम आधार बनाया गया. उनका कहना है कि ऐसे लोगों को मुश्किल हो सकती है जिनके पास सभी आवश्यक कागजात उपलब्ध नहीं हैं.
याचिकाओं में कहा गया कि 2003 के दिशानिर्देशों के अनुसार हर मतदाता की नागरिकता की अलग से जांच करने का कोई सामान्य प्रावधान नहीं था. केवल उन्हीं मामलों में नागरिकता का प्रश्न उठता था, जहां किसी सक्षम ट्रिब्यूनल ने किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित किया हो.
इसके विपरीत, 2025 के SIR में नागरिकता सत्यापन को एक प्रमुख तत्व माना गया है. याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इससे प्रक्रिया का स्वरूप पहले की तुलना में काफी बदल गया है.
कई राज्यों में लाखों नाम हटे
SIR से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं.
- बिहार में करीब 47 लाख नाम हटे.
- उत्तर प्रदेश में 2 करोड़ 4 लाख 39 हजार से अधिक नाम कटे.
- पश्चिम बंगाल में 82 लाख 75 हजार से ज्यादा नाम हटाए गए.
- तमिलनाडु में लगभग 74 लाख नाम हटाए गए.
- मध्य प्रदेश में 34 लाख से अधिक नाम सूची से बाहर हुए.
- राजस्थान में 31 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए.
इन आंकड़ों के बाद विपक्षी दलों और याचिकाकर्ताओं ने प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े पक्षों का कहना है कि पुनरीक्षण का मकसद मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना होता है.
विवाद की जड़ क्या है?
पूरा विवाद इस बात को लेकर है कि क्या 2025 का SIR, 2003 की प्रक्रिया की तुलना में मतदाताओं पर अधिक जिम्मेदारी डालता है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दोनों प्रक्रियाओं में बुनियादी अंतर हैं और इन्हीं बदलावों के कारण बड़ी संख्या में नाम हटने की आशंका बढ़ी. दूसरी ओर, सूची के शुद्धिकरण की जरूरत का भी तर्क दिया जा रहा है.
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