कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के प्रधानमंत्री मोदी के पिता के बारे में कहे गए बातों के बाद अब इस पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है कि राजनीति में शब्दों की गिरावट किस हद तक हो सकती है. अब कांग्रेस अध्यक्ष के बयान के बाद बीजेपी हमलावर है और उसने इस पर देशव्यापी प्रर्दशन किया है और आगे भी इसको मुद्दा बनाएगी.
सरकार के बड़े-बड़े मंत्री ने वो सूची जारी की है जिसमें इस बात का उल्लेख है कि कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री और उनके परिवार वालों को कब-कब, क्या बोला गया.
मैं इस बार इस बात में नहीं जा रहा हूं कि किस-किस नेता ने कब-कब और क्या-क्या बयान दिए और वो नेता किस पार्टी के थे या वो किस पद पर थे? यदि इस बात की चर्चा करने लगें तो वही बात हो जाएगी जब कहा जाता है कि इस हमाम में सब नंगे हैं.
बयानबाजी में निचले से निचले स्तर तक जाने में किसी भी पार्टी के नेताओं ने भेदभाव नहीं किया है. यहां ओछी और घटिया टिप्पणी करने की होड़ लगी हुई है.
मैं यहां पर वही लिखने वाला हूं जो मैंने अपने तीन दशक के पॉलिटिकल रिपोर्टिंग के करियर दौरान देखा है. बहस के लिए संसद बनी है और वहां पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस होती है.
एक वक्त था जब सदन में नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर जी, इंद्र कुमार गुजराल सोमनाथ दा, मुलायम सिंह यादव जैसे दिग्गज लोग होते थे. वहां पर बहस के दौरान यदि चंद्रशेखर जी कुछ कहने के लिए उठ खड़ा होते थे तो सदन में उस वक्त जो भी नेता बोल रहे होते थे वो चुपचाप बैठ जाते थे और पूरे सदन में सन्नाटा छा जाता था.

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कभी भी सदन में उस नेता के बारे में नहीं बोला जाता था जो सदन में मौजूद नहीं है. मगर अब इन बातों पर उतना अमल नहीं होता है.
अटल बिहारी वाजपेयी लगातार कई दशकों तक अपने भाषणों के जरिए लोगों के दिमाग पर छाए रहे मगर उन्होंने ने भी कभी वो सीमा नहीं लांघी जो आज दिखाई देती है.
इसका सबसे बड़ा कारण है नेताओं का एक-दूसरे के प्रति सम्मान कम होता जाना. पहले वो केवल प्रतिद्वंद्वी होते थे क्योंकि वो अलग-अलग विचारधारा से आते थे मगर उस वक्त वो एक-दूसरे के दुश्मन नहीं होते थे. आज की राजनीति में नेता एक-दूसरे के दुश्मन दिखाई देते हैं. पहले नेता एक दूसरे पर या उनके परिवार वालों पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने से बचते थे मगर अब ये सीमा भी टूट गई है.
अब बात ही पुरखों से शुरू होती है और इसमें सब पार्टियां एक-दूसरे से पीछे नहीं रहना चाहती है. यही वजह है कि आपको संसद और उसके बाहर बाप, मां, नाना, दादा, भाई, बहन आदि का जिक्र खूब सुनाई देता है.
अटल बिहारी वाजपेयी ने एक वक्त सदन के अंदर ही एक किस्सा सुनाया था कि किस तरह उन्होंने तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ किसी विषय पर जोरदार भाषण दिया था और भाषण के बाद वो डर गए थे कि नेहरू जी शायद उनसे नाराज होंगे मगर उसी दिन किसी विदेशी भोज के एक कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हो गई तो नेहरू जी ने वाजपेयी जी को कहा कि आज तुमने बड़ा जोरदार भाषण दिया. ये होते थे उस वक्त के रिश्ते.

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लालू यादव के संसद या संसद के बाहर दिए गए भाषणों को कौन भूल सकता है. उनकी वो व्यंग्यात्मक शैली और ठेठ अंदाज उनके सबसे बड़े विरोधियों और जिस नेता के बारे में वो बोल रहे होते थे उनको भी हंसने पर मजबूर कर देते थे.
मगर अब देश के राजनीति की फिजा ही बदल चुकी है और राजनीति भी समाज का आईना है. समाज की कटुता, एक-दूसरे के प्रति संवेदनहीनता भी राजनीति में दिखाई देती है. यही वजह है कि आपको नेताओं के भाषण में ऐसे-ऐसे शब्द सुनाई देते हैं जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते.
ये तो बात हुई देश के शीर्ष नेताओं की और जब राज्य और नगरपालिका या पंचायत स्तर पर जाएंगे तो बात गाली-गलौज या जबान काटने पर आकर खत्म होती है.
देश में चुनाव लगातार होते रहते हैं और नेताओं पर भी इसका दबाव रहता है जिसकी वजह से वो इस तरह से अपना आपा खोते रहते हैं जो समाज और नेताओं के आगे आने वाली पीढ़ी के लिए एक अच्छा संदेश या उदाहरण नहीं है.
अंत में संसद में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जो बहुत ही कम बोलते थे और उस वक्त की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज जो अपनी वाकपटुता और तेज तर्रार भाषणों के लिए जानी जाती थीं के बीच हुए संवाद के साथ छोड़ जाता हूं.

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वाकया कुछ यूं है कि सुषमा स्वराज के संसद में एक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खड़े हो जाते हैं जिसे देखकर सुषमा स्वराज चौंक कर बैठ जाती हैं. डॉ सिंह ने एक शेर पढ़ा 'हम को उनसे वफा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है'. इतना कह कर प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह बैठ जाते हैं.
सामने से सुषमा स्वराज उठती हैं और जवाब में दो शेर पढ़ती हैं- 'तू इधर उधर की बात ना कर, ये बता काफिला क्यों लुटा? हमें रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का ख्याल है'. सुषमा स्वराज आगे एक और शेर कहती हैं 'कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यू ही कोई बेवफा नहीं होता'.
सदन में बैठे सब उस वक्त दंग रह गए जब प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह फिर उठते हैं और कहते हैं कि 'माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो देख'.
और इसके साथ ही सदन ठहाकों से गूंज उठता है. मगर क्या आज के दिन क्या आप इस तरह के शब्दों के आदान प्रदान की उम्मीद कर सकते हैं?
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