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आसमान में भारत की तीसरी आंख: हवा से भी हल्का वो हथियार, जो 21 किलोमीटर ऊंचाई से रखेगा दुश्मन पर नजर

डीआरडीओ ने एक खास एयरशिप का ट्रायल किया है. ट्रायल के दौरान यह एयरशिप 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा.

आसमान में भारत की तीसरी आंख: हवा से भी हल्का वो हथियार, जो 21 किलोमीटर ऊंचाई से रखेगा दुश्मन पर नजर
DRDO का ट्रायल सफल रहा है.
DRDO
नई दिल्ली:

भारत ने आसमान में एक नया कारनामा कर दिखाया है. डिफेंस रिसर्ड एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने आज एक खास एयरशिप का ट्रायल किया. ये एक तरह से हवा में बहुत ऊंचाई तक उड़ने वाला गुब्बारा है. ट्रायल में यह 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक गया. ये कोई आम गुब्बारा या ड्रोन नहीं है, बल्कि ये इतना ऊपर उड़ता है, जहां प्लेन भी नहीं पहुंच पाते. इसे हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम (HAPS) कहा जाता है.

DRDO ने बताया कि ट्रायल के दौरान ये 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और लंबे समय तक उड़ान भरी. उम्मीद है कि ये उपलब्धि 'आत्मनिर्भर भारत' पहले के तहत निगरानी और एयरोस्पेस क्षमताओं को मजबूत करेगी.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल ट्रायल के लिए DRDO और भारतीय वायुसेना को बधाई दी. उन्होंने इस उपलब्धि को एडवांस्ड एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी और लंबे समय तक चलने वाले स्ट्रेटोस्फेरिक एयरशिप के विकास में आत्मनिर्भरता की दिसा में एक अहम पड़ाव बताया.

ट्रायल में क्या कुछ हुआ?

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि HAPS ने समुद्र तल से 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ान भरी. 30 मिनट से भी ज्यादा समय तक ये लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थिर रहा. इसके बाद इसे सुरक्षित वापस लाया गया. उड़ान के दौरान इसने कई सारा डेटा ग्राउंड पर भेजा. उसका एनालिसि किया जाएगा.

इसे स्ट्रेटोस्फेयर में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है. यह पृथ्वी की वह परत है जहां बड़े-बड़े विमान उड़ान भरते हैं. ओजोन लेयर भी यहीं मौजूद है. 

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि ट्रायल के दौरान हवा में मौजूद इस एयरशिप से ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन तक लगातार रियल टाइम वीडियो और डेटा भेजा गया.

ये ड्रोन जैसा भी नहीं है. ड्रोन कुछ ही घंटे उड़ पाता है. जबकि ये लंबे समय तक हवा में रह सकता है. इससे कम्युनिकेशन, सर्विलांस और मॉनिटरिंग मिशन में मदद मिलेगी.

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कई तरह के उपकरण लगे हैं इसमें

ये दिखने में एक गुब्बारे जैसा नजर आता है. लेकिन सुरक्षा, रक्षा और निगरानी के लिहाज से ये काफी अहम चीज है.

अधिकारियों ने बताया कि सिस्टम में कई तरह से इंस्ट्रूमेंट और कंट्रोल पैकेज लगे थे. इनमें इनर्शियल मेजरमेंट यूनिट, GPS रिसीवर, ऑनबोर्ड कैमरे और ऊंचाई कंट्रोल करने वाले मैकेनिज्म शामिल हैं.

इसके साथ ही इसमें कई और भी सब-सिस्टम हैं, जिन्होंने पूरे मिशन के दौरान उम्मीद के मुताबिक काम किया था.

क्या होगा इससे फायदा?

इसका सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि जमीन से 20-21 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाकर जमीन पर नजर रखेगा. 

अभी तक जिस काम के लिए सैटेलाइट की मदद लेनी पड़ती है, वही काम ये एयरशिप से हो जाएगा. सैटेलाइट की तुलना में ये सस्ता भी होगा. 

ये काफी लंबे समय तक ऊंचाई पर रह सकता है और वहीं से बॉर्डर या दुश्मन के मूवमेंट की निगरानी रख सकता है. बस इसे लॉन्च करना होगा और फिर सारा डेटा ग्राउंड पर मिलने लगेगा. 

किसने बनाया है इसे?

HAPS को DRDO की लैब- एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADRDE) ने डिजाइन और विकसित किया है. ये हवा से भी हल्का है जो काफी लंबे समय तक स्ट्रेटोस्फेयर में काम कर सकता है. 

इसे एक ऐसे एरियल प्लेटफॉर्म के तौर पर विकसित किया जा रहा है, जिससे कई तरह की निगरानी और मॉनिटरिंग की जा सकेगी.

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