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बिहार जलस्रोत पुनरुद्धार एवं गाद प्रबंधन नीति 2026 और MoU से बिहार को क्या फायदे मिलेंगे?

बिहार की गाद प्रबंधन नीति 2026 से नदियों की गाद का इस्तेमाल हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर में होगा. इससे बाढ़ नियंत्रण, जल भंडारण, कृषि और भूजल स्तर में भी सुधार होगा.

बिहार जलस्रोत पुनरुद्धार एवं गाद प्रबंधन नीति 2026 और MoU से बिहार को क्या फायदे मिलेंगे?
नई पॉलिसी के तहत बिहार की नदियों से निकाली जाएगी गाद
पटना:

बिहार जलस्रोत पुनरुद्धार एवं गाद प्रबंधन नीति 2026 और इसके तहत हुए MoU से बिहार को एक साथ कई बड़े फायदे मिलने वाले हैं. इस पॉलिसी के तहत नदियों से निकाली गई गाद अब बेकार नहीं जाएगी, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्गों, पुलों, टाउनशिप, एयरपोर्ट और मेडिकल कॉलेजों के कॉन्स्ट्रक्शन में फ्री भराव सामग्री के रूप में इस्तेमाल होगी. सबसे बड़ी बात यह है कि 'नदी संजीवनी' प्रोग्राम के तहत गाद निकासी का पूरा खर्च केंद्र और NHAI उठाएगा. बिहार सरकार पर कोई वित्तीय भार नहीं पड़ेगा. 

इसके साथ ही, नदियों की गहराई बढ़ने से बाढ़ का खतरा कम होगा, जल भंडारण बढ़ेगा, किसानों की उपजाऊ मिट्टी बचेगी और सिंचाई व भूजल स्तर में भी सुधार होगा.

इन्फ्रास्ट्रक्चर और इकोनॉमिक ग्रोथ

चालू 16 नेशनल हाईवे परियोजनाओं में 243 लाख क्यूबिक मीटर मुफ्त गाद का उपयोग मिट्टी और भराव सामग्री के रूप में किया जाएगा.

  • मौजूदा वक्त में NHAI की ₹58,340 करोड़ की लागत वाली 39 परियोजनाएं (कुल 1,561 किलोमीटर) निर्माणाधीन हैं.
  • ₹1,85,200 करोड़ की अनुमानित लागत से 11 नई परियोजनाएं (1,982 किलोमीटर) प्रस्तावित हैं.
  • भविष्य में कुल 43 परियोजनाओं में फायदा होने वाला है, जिससे जुड़ा 1,078 लाख घन मीटर गाद का उपयोग किए जाने का खाका तैयार है.
  • 'नदी संजीवनी' कार्यक्रम के तहत गाद निकासी और उपयोग का पूरा खर्च केंद्र/NHAI व्यवस्था द्वारा वहन किया जाएगा. बिहार सरकार पर इसका कोई वित्तीय भार नहीं पड़ेगा.
  • नदियों पर 29 नए पुलों का निर्माण तेजी से हो सकेगा, जिससे अंतर-जिला और अंतर-राज्यीय व्यापार व कनेक्टिविटी को नई रफ्तार मिलेगी.
  • राज्य में डेवलप किए जा रहे 12 नए टाउनशिप, 10 नए एयरपोर्ट और 32 नए मेडिकल कॉलेजों के भू-समतलीकरण व आधारभूत निर्माण में भी इस गाद सामग्री का वैकल्पिक उपयोग संभव होगा.

बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन

  • महाराष्ट्र के सफल बुलढाणा मॉडल की तर्ज पर नदियों व जलाशयों से वैज्ञानिक तरीके से गाद हटाने से नदियों की गहराई और जलधारण क्षमता कई गुना तक बढ़ेगी. 
  • नेपाल से आने वाले तेज जलप्रवाह और फरक्का बैराज के बैकवाटर प्रभाव से गंगा और सहायक नदियों (कोसी, गंडक, बागमती, महानंदा) के तल में जमा सिल्ट हटेगी, जिससे प्रतिवर्ष आने वाली विभीषिका कम होगी.
  • मॉनसून के 4 महीनों (जुलाई–अक्टूबर) में आने वाले एक्स्ट्रा वॉटर का जलाशयों और नहरों में अच्छी तरह कलेक्शन किया जा सकेगा, जिससे साल भर जल संकट से बचाव होगा.

कृषि और पर्यावरण को मिलने वाले फायदे 

  • सड़क और तटबंध निर्माण के लिए किसानों के उपजाऊ खेतों की ऊपरी मिट्टी खोदने की अनिवार्यता खत्म होगी, जिससे लाखों एकड़ कृषि भूमि बंजर होने से बचेगी.
  • गाद हटने से जलस्रोतों में पानी टिकेगा, जिससे रबी और खरीफ फसलों के लिए अंतिम छोर तक नहरों में पानी पहुंचेगा और आसपास के भूजल स्तर में सुधार होगा.
  • वैज्ञानिक ड्रेजिंग से नदियों की नेचुरल धारा बहाल होगी, जिससे जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास में सुधार होगा और कटान की समस्या कम होगी.
  • कॉन्स्ट्रक्शन साइट्स के पास नदियों से ही भराव सामग्री उपलब्ध होने से ढुलाई लागत और कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी. 

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