
नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उप-राज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताए जाने के शीर्ष कोर्ट के आदेश के खिलाफ दिल्ली सरकार की अपीलों पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ जल्द गठित करने के अनुरोध पर वह विचार करेगा.
इस मामले को दिल्ली सरकार ने प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रखा था. पीठ ने कहा, ‘हम देखेंगे कि यह ग्रीष्मकालीन अवकाश से पहले आएगा या बाद में.’ दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने पीठ से कहा कि मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष भेजा गया है और अदालत ने मामले को भेजने से पहले कहा था कि यह एक अत्यावश्यक मामला है.
उन्होंने पीठ से कहा कि अदालत ने संविधान पीठ के जल्द गठन की खातिर इस मामले को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष रखने की इजाजत दी थी. पीठ में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ तथा न्यायमूर्ति एसके कौल भी हैं.
गत 15 फरवरी को न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आप सरकार की अर्जियों को संविधान पीठ में भेज दिया था. इस फैसले में उच्च न्यायालय ने कहा था कि दिल्ली राज्य नहीं है और उपराज्यपाल ही यहां के प्रशासनिक प्रमुख हैं. पीठ ने कहा था कि इस मामले से कानून और संविधान के महत्वपूर्ण प्रश्न जुड़े हुए हैं और इस पर फैसला संविधान पीठ को ही लेना चाहिए.
हालांकि पीठ ने प्रधान न्यायाधीश खेहर द्वारा गठित की जाने वाली संविधान पीठ के समक्ष भेजे जाने वाले प्रश्न तैयार नहीं किए और केंद्र तथा दिल्ली सरकार से अपने मामले में बड़ी पीठ के समक्ष दलीलें रखने को कहा.
दिल्ली सरकार ने दो फरवरी को शीर्ष अदालत से कहा था कि विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों पर उसे विशेष कार्यकारी शक्तियां हासिल हैं और केंद्र, राष्ट्रपति या उपराज्यपाल इसमें दखल नहीं दे सकते.
इस पर शीर्ष अदालत ने कहा था कि यह सही है कि चुनी गई सरकार के पास कुछ श्क्तियां होनी चाहिए लेकिन अब देखना यह है कि यह दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक हों या फिर जैसा कि दिल्ली सरकार का मानना है उसके मुताबिक.
दिल्ली सरकार ने पीठ से कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सरकार के पास लोकव्यवस्था, भूमि मामलों और पुलिस को छोड़कर राज्य और समवर्ती सूचियों की अन्य सभी प्रविष्टियों से संबंधित विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिसमें केंद्र सरकार, राष्ट्रपति या उपराज्यपाल की कोई भूमिका या दखल देने का अधिकार नहीं है. दिल्ली सरकार ने कहा कि वह संविधान की धारा 239-एए के तहत दिए गए विशेष दर्जे की ही मांग कर रही है.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
इस मामले को दिल्ली सरकार ने प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रखा था. पीठ ने कहा, ‘हम देखेंगे कि यह ग्रीष्मकालीन अवकाश से पहले आएगा या बाद में.’ दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने पीठ से कहा कि मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष भेजा गया है और अदालत ने मामले को भेजने से पहले कहा था कि यह एक अत्यावश्यक मामला है.
उन्होंने पीठ से कहा कि अदालत ने संविधान पीठ के जल्द गठन की खातिर इस मामले को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष रखने की इजाजत दी थी. पीठ में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ तथा न्यायमूर्ति एसके कौल भी हैं.
गत 15 फरवरी को न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आप सरकार की अर्जियों को संविधान पीठ में भेज दिया था. इस फैसले में उच्च न्यायालय ने कहा था कि दिल्ली राज्य नहीं है और उपराज्यपाल ही यहां के प्रशासनिक प्रमुख हैं. पीठ ने कहा था कि इस मामले से कानून और संविधान के महत्वपूर्ण प्रश्न जुड़े हुए हैं और इस पर फैसला संविधान पीठ को ही लेना चाहिए.
हालांकि पीठ ने प्रधान न्यायाधीश खेहर द्वारा गठित की जाने वाली संविधान पीठ के समक्ष भेजे जाने वाले प्रश्न तैयार नहीं किए और केंद्र तथा दिल्ली सरकार से अपने मामले में बड़ी पीठ के समक्ष दलीलें रखने को कहा.
दिल्ली सरकार ने दो फरवरी को शीर्ष अदालत से कहा था कि विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों पर उसे विशेष कार्यकारी शक्तियां हासिल हैं और केंद्र, राष्ट्रपति या उपराज्यपाल इसमें दखल नहीं दे सकते.
इस पर शीर्ष अदालत ने कहा था कि यह सही है कि चुनी गई सरकार के पास कुछ श्क्तियां होनी चाहिए लेकिन अब देखना यह है कि यह दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक हों या फिर जैसा कि दिल्ली सरकार का मानना है उसके मुताबिक.
दिल्ली सरकार ने पीठ से कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सरकार के पास लोकव्यवस्था, भूमि मामलों और पुलिस को छोड़कर राज्य और समवर्ती सूचियों की अन्य सभी प्रविष्टियों से संबंधित विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिसमें केंद्र सरकार, राष्ट्रपति या उपराज्यपाल की कोई भूमिका या दखल देने का अधिकार नहीं है. दिल्ली सरकार ने कहा कि वह संविधान की धारा 239-एए के तहत दिए गए विशेष दर्जे की ही मांग कर रही है.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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