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This Article is From Aug 09, 2017

संसद में पीएम मोदी की जुबां पर आई एक कविता, जानें उसे रचने वाले के बारे में..

''जिस तरफ गांधी के कदम पड़ जाते थे, वहां करोड़ों लोग चलने लगते थे. जहां गांधी की दृष्टि पड़ जाती थी, करोड़ों लोग उस ओर देखने लगते थे.''

संसद में पीएम मोदी की जुबां पर आई एक कविता, जानें उसे रचने वाले के बारे में..
पीएम मोदी ने संसद में भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वे वर्ष पर आयोजित सत्र में सोहनलाल द्विवेदी की एक कविता का उल्लेख किया.
नई दिल्ली: हिन्दी के जानेमाने कवि सोहनलाल द्विवेदी महात्मा गांधी के दर्शन से प्रभावित थे. आज संसद में भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल होने पर आयोजित सत्र में पीएम नरेंद्र मोदी ने सोहनलाल द्विवेदी का स्मरण किया. मोदी ने कहा कि राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी ने कहा था, ''जिस तरफ गांधी के कदम पड़ जाते थे, वहां करोड़ों लोग चलने लगते थे. जहां गांधी की दृष्टि पड़ जाती थी, करोड़ों लोग उस ओर देखने लगते थे.''

देशप्रेम के साथ-साथ बालोपयोगी रचनाएं लिखीं
राष्ट्रचेतना से भरे हुए सोहनलाल द्विवेदी हिन्दी के राष्ट्रीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए. ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के इस रचयिता को राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया गया. द्विवेदी जी ने देशप्रेम के साथ-साथ बालोपयोगी रचनाएं भी लिखीं. 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था.

राष्टीयता से संबंधित कविताएं लिखने वाले अग्रणी रचियता
22 फरवरी सन् 1906 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले की तहसील बिन्दकी में जन्मे सोहनलाल द्विवेदी हिंदी काव्य-जगत की अमूल्य निधि हैं. उन्होंने हिन्दी में एमए तथा संस्कृत का भी अध्ययन किया. राष्ट्रीयता से संबन्धित कविताएं लिखने वालो में इनका स्थान काफी ऊपर है. महात्मा गांधी पर उन्होंने कई भाव पूर्ण रचनाएं लिखी हैं, जो हिन्दी जगत में अत्यन्त लोकप्रिय हुईं. उन्होंने गांधीवाद के भावतत्व को वाणी देने का सार्थक प्रयास किया तथा अहिंसात्मक क्रांति के विद्रोह व सुधारवाद को अत्यन्त सरल सबल और सफल ढंग से काव्य बनाकर 'जन साहित्य' बनाने के लिए उसे मर्मस्पर्शी और मनोरम बनाया. उनका निधन एक मार्च 1988 को हुआ.

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सोहनलाल द्विवेदी की कविता : युगावतार गांधी
चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, पड़ गए कोटि दृग उसी ओर.
उसके शिर पर निज धरा हाथ उसके शिर रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया झुक गए उसी पर कोटि माथ.
हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु! हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि, हे कोटिमूर्ति, तुमको प्रणाम!
युग बढ़ा तुम्हारी हंसी देख, युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की, खींचते काल पर अमिट रेख.
तुम बोल उठे, युग बोल उठा, तुम मौन बने, युग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर, युगकर्म जगा, युगकर्म तना.
युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक, युग-संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें युग-युग तक युग का नमस्कार!
तुम युग-युग की रूढ़ियां तोड़, रचते रहते नित नई सृष्टि,
उठती नवजीवन की नींवे ले नवचेतन की दिव्य- दृष्टि.
धर्माडंबर के खंडहर पर कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर, निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!
बढ़ते ही जाते दिग्विजयी! गढ़ते तुम अपना रामराज,
आत्माहुति के मणिमाणिक से मढ़ते जननी का स्वर्णताज!
तुम कालचक्र के रक्त सने दशनों को करके पकड़ सुदृढ़,
मानव को दानव के मुंह से ला रहे खींच बाहर बढ़ बढ़.
पिसती कराहती जगती के प्राणों में भरते अभय दान,
अधमरे देखते हैं तुमको, किसने आकर यह किया त्राण?
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से तुम कालचक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!
कंपता असत्य, कंपती मिथ्या, बर्बरता कंपती है थरथर!
कंपते सिंहासन, राजमुकुटकंपते, खिसके आते भू पर.
हे अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित, सेनाएं करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है, उड़ता है तेरा ध्वज निशान!
हे युग-दृष्टा, हे युग-सृष्टा, पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खंडहर में उगता अभिनव भारत स्वतंत्र!


सोहनलाल द्विवेदी की रचनाएं ओजपूर्ण एवं राष्ट्रीयता की परिचायक हैं. गांधीवाद को अभिव्यक्ति देने के लिए उन्होंने युगावतार, गांधी, खादी गीत, गांवों में किसान, दांडीयात्रा, त्रिपुरी कांग्रेस, बढ़ो अभय जय जय जय, राष्ट्रीय निशान आदि का सृजन किया. इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत देश, ध्वज, राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र नेताओं के विषय की उत्तम कोटि की कविताएं लिखीं. उन्होंने कई प्रयाण गीत भी लिखे हैं. उनकी प्रमुख रचनाएं - भैरवी, पूजागीत सेवाग्राम, प्रभाती, युगाधार, कुणाल, चेतना, बांसुरी, तथा बच्चों के लिए दूधबतासा हैं.

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