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This Article is From Feb 12, 2018

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, दोषी व्यक्ति कैसे पार्टी चला सकते हैं, कैसे उम्मीदवार चुन सकते हैं?

शीर्ष अदालत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें दोषियों पर राजनीतिक दल बनाने तथा उसमें पदाधिकारी बनने से जब तक रोक लगाने का अनुरोध किया गया था जब तक वे चुनाव संबंधी कानून के तहत अयोग्य हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, दोषी व्यक्ति कैसे पार्टी चला सकते हैं, कैसे उम्मीदवार चुन सकते हैं?
भारतीय सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
नई दिल्‍ली: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि कोई दोषी व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का पदाधिकारी कैसे हो सकता है और वह चुनावों के लिए उम्मीदवार कैसे चयनित कर सकता है क्योंकि यह चुनावों की ‘शुचिता’ सुनिश्चित करने के उसके एक फैसले की भावना के विपरीत है. शीर्ष अदालत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें दोषियों पर राजनीतिक दल बनाने तथा उसमें पदाधिकारी बनने से जब तक रोक लगाने का अनुरोध किया गया था जब तक वे चुनाव संबंधी कानून के तहत अयोग्य हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि अगर कोई व्यक्ति चुनाव नही लड़ सकता तो वो कोई भी राजनीतिक पार्टी कैसे बना सकता है? साथ ही वो पार्टी के उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के लिए कैसे चुन सकता है? ये बड़ी अलग स्थिति है कि कोई व्यक्ति चुनाव तो नहीं लड़ सकता लेकिन वो राजनीतिक पार्टी बना कर चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों का चयन कर सकता है. ऐसे लोग अगर स्कूल या कोई दूसरी संस्था बनाते हैं तो कोई समस्या नहीं है लेकिन वो एक पार्टी बना रहे हैं जो सरकार चलाएगी, ये मैटर करता है.' चीफ जस्टिस ने कहा कि ये सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्टाचार को लेकर दिए गए फैसलों के खिलाफ है जो चुनाव में पवित्रता बनाए रखने के लिए दिए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो हफ्ते में जवाब देने को कहा. सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर 26 मार्च को सुनवाई करेगा.

सुप्रीम कोर्ट आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने वालों को राजनीतिक दल बनाने या दल का पदाधिकारी बनने पर रोक की याचिका पर सुनवाई कर रहा है. चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है. चुनाव आयोग ने आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने वालों को राजनीतिक दल बनाने या दल का पदाधिकारी बनने पर रोक लगाने वाली याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि उसके पास राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर आयोग ने कहा है वह पिछले करीब 20 वर्षों से केंद्र सरकार को पत्र लिखकर यह आग्रह करता रहा है कि उसे राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने का भी अधिकार दिया जाए लेकिन अब तक उसे सफलता नहीं मिली है. आयोग ने कहा है कि जन प्रतिनिधि अधिनियम की धारा-29 ए में उसे राजनीतिक दलों को पंजीकरण करने का तो अधिकार दिया गया है लेकिन इस दल के पंजीकरण को रद्द करने का अधिकार नहीं दिया गया है.

आयोग ने कहा कि 1998 में पहली बार मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने तत्कालीन कानून मंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि आयोग को राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार मिलना चाहिए. आयोग का कहना था कि कई राजनीतिक दल ऐसे हैं जिन्होंने पंजीकरण तो करवा लिया है लेकिन कभी चुनाव में हिस्सा नहीं लिया. इस तरह की पार्टियां सिर्फ कागजों पर है.

आयोग का कहना है कि इस तरह की पार्टी बनाने का मकसद आयकर अधिनियम का फायदा उठाने का भी हो सकता है. आयोग ने कहा कि फरवरी 2016 से दिसंबर, 2016 के बीच इस तरह के 255 राजनीतिक दलों को पंजीकृत किए गए गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की सूची से बाहर कर दिया गया.
हलफनामे में आयोग ने यह भी कहा कि वह इनर पार्टी डेमोक्रेसी की मांग का समर्थन करता रहा है. हालांकि आयोग ने यह साफ किया कि विधायिका को कानून में संशोधन कर आयोग को इनर पार्टी डेमोक्रेसी के संबंध में दिशानिर्देश बनाने का अधिकार दिया जाए.

मालूम हो कि फिलहाल आयोग को राजनीतिक दल को पंजीकृत करने का तो अधिकार है लेकिन उसका पंजीकरण रद्द करने का अधिकार नहीं है. चुनाव आयोग ने यह जवाब भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर दिया है. याचिका में आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने वालों को राजनीतिक दल बनाने या दल का पदाधिकारी बनने पर रोक लगाने की गुहार की गई है.

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