
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली:
उच्चतम न्यायालय ने निर्माण क्षेत्र के मजदूरों के कल्याण के मामले में सरकार के रवैये की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि बहुत हो गया. यह तो गरीबों का शोषण है. खास बात यह है कि सरकार ने न्यायालय को सूचित किया था कि उसने निर्माण मजदूरों के कल्याण से संबंधित मामले में शीर्ष अदालत के निर्देशों के पालन के लिए समय सीमा निर्धारित करने हेतु समिति गठित की है. न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने नाराजगी के साथ सरकार की ओर से वकील से जानना चाहा कि क्या गरीब जनता के प्रति भारत सरकार का यही रवैया है. पीठ ने सवाल किया कि समय सीमा निर्धारित करने के लिए आपने एक समिति गठित की है ? यह हो क्या रहा है ? हमारे मुताबिक आप बीस से पच्चीस हजार करोड़ रुपए पर बैठे हुए हैं. क्या देश की गरीब जनता के प्रति भारत सरकार का यही रवैया है ? पीठ ने कहा कि बहुत हो गया. यह गरीबों का शोषण है.
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इसके साथ ही पीठ ने सरकार से जानना चाहा कि निर्माण मजूदरों के कल्याण के लिए रखी इस विपुल धनराशि का उसने क्या किया. यह भी संयोग है कि न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर इतनी सख्त टिप्पणियां कीं. शीर्ष अदालत ने श्रम मंत्रालय के सचिव को निर्देश दिया कि वह सात मई को सुनवाई के दौरान न्यायलाय में मौजूद रह कर बतायें कि उसके आदेशों और इस विषय पर संसद द्वारा बनाए गए दो कानूनों पर अमल के बारे में क्या हो रहा है. कुछ राज्यों का प्रतिनिधि कर रहे वकील ने पीठ से जब कहा कि उन्होंने शीर्ष अदालत के निर्देशों का अनुपालन किया है तो पीठ ने पलट कर तल्खी से कहा कि आपने वाशिंग मशीनें और लैपटाप खरीदने के अलावा क्या करा है.
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इस वस्तुस्थिति पर बेहद नाराज पीठ ने कहा कि यह हतप्रभ करने वाला है. क्या यह मजाक है ? ये ( निर्माण मजदूर ) वे लोग हैं जिनके पास कोई शिक्षा नहीं है , धन नहीं है और भवन निर्माता उनका शोषण करते हैं और भारत सरकार कह रही है कि वह कुछ नहीं करेगी. गौरतलब है कि इससे पहले , नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में कहा था कि निर्माण मजदूरों के कल्याण के निमित्त धन का बड़ा हिस्सा लैपटाप और वाशिंग मशीनें खरीदने पर खर्च किया गया और मुख्य काम पर तो दस फीसदी से भी कम खर्च हुआ. न्यायालय ने 19 मार्च को केन्द्र से कहा था कि वह निर्माण मजदूरों की शिक्षा , स्वास्थ , सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे मुद्दों के लिए 30 सितंबर तक एक माडल योजना तैयार करे.
VIDEO: जस्टिस के एम जोसेफ पर निर्णय.
न्यायालय ने कहा था कि मजदूरों के लाभ के लिये 37,400 करोड़ रुपये से अधिक धन एकत्र किया गया लेकिन करीब 9,500 करोड़ रुपये ही उनकी भलाई के लिये खर्च किए गए. (इनपुट भाषा से)
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इसके साथ ही पीठ ने सरकार से जानना चाहा कि निर्माण मजूदरों के कल्याण के लिए रखी इस विपुल धनराशि का उसने क्या किया. यह भी संयोग है कि न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर इतनी सख्त टिप्पणियां कीं. शीर्ष अदालत ने श्रम मंत्रालय के सचिव को निर्देश दिया कि वह सात मई को सुनवाई के दौरान न्यायलाय में मौजूद रह कर बतायें कि उसके आदेशों और इस विषय पर संसद द्वारा बनाए गए दो कानूनों पर अमल के बारे में क्या हो रहा है. कुछ राज्यों का प्रतिनिधि कर रहे वकील ने पीठ से जब कहा कि उन्होंने शीर्ष अदालत के निर्देशों का अनुपालन किया है तो पीठ ने पलट कर तल्खी से कहा कि आपने वाशिंग मशीनें और लैपटाप खरीदने के अलावा क्या करा है.
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इस वस्तुस्थिति पर बेहद नाराज पीठ ने कहा कि यह हतप्रभ करने वाला है. क्या यह मजाक है ? ये ( निर्माण मजदूर ) वे लोग हैं जिनके पास कोई शिक्षा नहीं है , धन नहीं है और भवन निर्माता उनका शोषण करते हैं और भारत सरकार कह रही है कि वह कुछ नहीं करेगी. गौरतलब है कि इससे पहले , नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में कहा था कि निर्माण मजदूरों के कल्याण के निमित्त धन का बड़ा हिस्सा लैपटाप और वाशिंग मशीनें खरीदने पर खर्च किया गया और मुख्य काम पर तो दस फीसदी से भी कम खर्च हुआ. न्यायालय ने 19 मार्च को केन्द्र से कहा था कि वह निर्माण मजदूरों की शिक्षा , स्वास्थ , सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे मुद्दों के लिए 30 सितंबर तक एक माडल योजना तैयार करे.
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न्यायालय ने कहा था कि मजदूरों के लाभ के लिये 37,400 करोड़ रुपये से अधिक धन एकत्र किया गया लेकिन करीब 9,500 करोड़ रुपये ही उनकी भलाई के लिये खर्च किए गए. (इनपुट भाषा से)
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