फिल्म 'वॉट द फिश' की कहानी शुरू होती है डिम्पल कपाड़िया के किरदार सुधा से, जो 30 दिन पहले अपने रिश्तेदार के हवाले करके जाती हैं अपना सुंदर-सा घर... और चेतावनी देती हैं कि उनके घर और उनके फिशपॉट का अच्छी तरह खयाल रखा जाए... मगर उनका घर किसी न किसी वजह से एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे के हाथों में चला जाता है और हर कोई उस घर को अपने तरीके से इस्तेमाल करता है... हर बार उनकी सुंदर-सी मछली मर जाती है और उसकी जगह वैसी ही दिखने वाली नई मछली लाकर पॉट में डाल दी जाती है... मगर, क्या सुधा का घर उन्हें वैसा ही वापस मिलेगा, यह देखना होगा फिल्म 'वॉट द फिश' में...
डिम्पल कपाड़िया एक गुस्सैल महिला के रोल में हैं, जिनके लिए फिल्म में कुछ खास करने को नहीं है... बस, घर में वापस आते वक्त टैक्सी ड्राइवर को डांट-फटकार और घर में आने के बाद उनके लिए सिर्फ एक ही काम है... फोन पर हुज्जत करना और फिर कहानी को फ्लैशबैक में ले जाना, कि 25 दिन पहले इस घर में क्या हुआ था, या 20 दिन पहले इस घर में क्या हुआ था... इसी तरह वह बीच-बीच में चार से पांच फोन पर बातें करती नज़र आती हैं... शायद यही वजह है कि डिम्पल ने फिल्म के प्रोमोशन के समय ही साफ कह दिया था कि इस फिल्म में उन्होंने पैसों के लिए काम किया है...
कहने को यह एक सिचुएशनल कॉमेडी है, मगर फिल्म में हंसी न के बराबर आती है... कहानी कहां से कहां जाती है, यह समझ से बाहर है... आप हर बार यही कहेंगे, यह क्या है और कैसे हो गया... या यह क्या चल रहा है... फिल्म में तारीफ के काबिल सिर्फ एक चीज़ है, वह है परफॉरमेंस... डिम्पल कपाड़िया के साथ-साथ सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है...
'वॉट द फिश' एक कमज़ोर फिल्म है, जिसमें न कहानी है, न कॉमेडी, न सोचने लायक कोई विषय... मैं इस फिल्म को कुछ 'ज़्यादा ही' नम्बर दे रहा हूं, क्योंकि डायरेक्टर गुरमीत सिंह ने बिना कहानी के फिल्म बनाने की कोशिश की है... फिल्म 'वॉट द फिश' के लिए मेरी रेटिंग है 1.5 स्टार...
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