आज यानी 17 अक्टूबर, शनिवार को शारदीय नवरात्रि का सातवां दिन है. नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. मां कालरात्रि को शक्ति का सबसे उग्र और प्रभावशाली रूप कहा जाता है. मां की चार भुजाएं हैं जिसमें एक हाथ में उन्होंने तलवार, दूसरे में लौह अस्त्र धारण किया हुआ है. मां का तीसरा हाथ अभय मुद्रा में और चौथा हाथ वरमुद्रा में है. मां कालरात्रि का वाहन गर्दभ है. मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की सच्ची श्रद्धा से पूजा करने से जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और साहस-आत्मविश्वास बढ़ता है. ऐसे में अगर आप भी नवरात्रि के उपवास कर रहे हैं और माता की पूजा करते हैं, तो आज पूजा के दौरान आप यहां से मां कालरात्रि चालीसा, मां कालरात्रि की आरती और मंत्र पढ़ सकते हैं.
मां कालरात्रि चालीसा | Maa Kalratri Ki Chalisa
॥ दोहा ॥
जय काली, कलिमलहरण, महिमा अगम अपार।
महिष मर्दिनी कालिका, देहु अभय अपार।।
॥ चौपाई॥
अरि मद मान मिटावन हारी, मुण्डमाल गल सोहत प्यारी।।
अष्टभुजी सुखदायक माता, दुष्टदलन जग में विख्याता।
भाल विशाल मुकुट छवि छाजै, कर में शीश शत्रु का साजै।।
दूजे हाथ लिए मधु प्याला, हाथ तीसरे सोहत भाला।।
चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे, छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे।।
सप्तम करदमकत असि प्यारी, शोभा अद्भुत मात तुम्हारी।।
अष्टम कर भक्तन वर दाता, जग मनहरण रूप ये माता।।
भक्तन में अनुरक्त भवानी, निशदिन रटें ऋषि-मुनि ज्ञानी।।
महाशक्ति अति प्रबल पुनीता, तू ही काली तू ही सीता।।
पतित तारिणी हे जग पालक, कल्याणी पापी कुल घालक॥
शेष सुरेश न पावत पारा, गौरी रूप धर्यो इक बारा॥
तुम समान दाता नहिं दूजा, विधिवत करें भक्तजन पूजा।।
रूप भयंकर जब तुम धारा, दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा।।
नाम अनेकन मात तुम्हारे, भक्तजनों के संकट टारे॥
कलि के कष्ट कलेशन हरनी, भव भय मोचन मंगल करनी।
महिमा अगम वेद यश गावैं, नारद शारद पार न पावैं।।
भू पर भार बढयो जब भारी, तब तब तुम प्रकटीं महतारी।।
आदि अनादि अभय वरदाता, विश्वविदित भव संकट त्राता।
कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा, उसको सदा अभय वर दीन्हा।।
ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा, काल रूप लखि तुमरो भेषा।
कलुआ भैंरों संग तुम्हारे, अरि हित रूप भयानक धारे॥
सेवक लांगुर रहत अगारी, चौसठ जोगन आज्ञाकारी।।
त्रेता में रघुवर हित आई, दशकंधर की सैन नसाई।।
खेला रण का खेल निराला, भरा मांस-मज्जा से प्याला।
रौद्र रूप लखि दानव भागे, कियौ गवन भवन निज त्यागे॥
तब ऐसौ तामस चढ़ आयो, स्वजन विजन को भेद भुलायो॥
ये बालक लखि शंकर आए, राह रोक चरनन में धाए।
तब मुख जीभ निकर जो आई, यही रूप प्रचलित है माई।।
बाढ़्यो महिषासुर मद भारी, पीड़ित किए सकल नर-नारी।।
करूण पुकार सुनी भक्तन की, पीर मिटावन हित जन-जन की।
तब प्रगटी निज सैन समेता, नाम पड़ा मां महिष विजेता॥
शुंभ निशुंभ हने छन माहीं, तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं।
मान मथनहारी खल दल के, सदा सहायक भक्त विकल के।
दीन विहीन करैं नित सेवा, पावैं मनवांछित फल मेवा॥
संकट में जो सुमिरन करहीं, उनके कष्ट मातु तुम हरहीं।
प्रेम सहित जो कीरति गावैं, भव बंधन सों मुक्ती पावैं।।
काली चालीसा जो पढ़हीं, स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं।
दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा, केहि कारण मां कियौ विलम्बा॥
करहु मातु भक्तन रखवाली, जयति जयति काली कंकाली॥
सेवक दीन अनाथ अनारी, भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी।।
॥ दोहा ॥
प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ।
तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ॥
कालरात्रि जय-जय-महाकाली ।
काल के मुह से बचाने वाली ॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा ।
महाचंडी तेरा अवतार ॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा ।
महाकाली है तेरा पसारा ॥
खडग खप्पर रखने वाली ।
दुष्टों का लहू चखने वाली ॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा ।
सब जगह देखूं तेरा नजारा ॥
सभी देवता सब नर-नारी ।
गावें स्तुति सभी तुम्हारी ॥
रक्तदंता और अन्नपूर्णा ।
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ॥
ना कोई चिंता रहे बीमारी ।
ना कोई गम ना संकट भारी ॥
उस पर कभी कष्ट ना आवें ।
महाकाली मां जिसे बचाबे ॥
तू भी भक्त प्रेम से कह ।
कालरात्रि मां तेरी जय ॥
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥
बीज मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः॥
स्तोत्र मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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