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This Article is From Apr 21, 2019

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर: लड़कों जैसे कटे बाल, भगवा वस्त्र, गले में रूद्राक्ष पहनी 'हिंदुत्व' की प्रचारक

मध्य प्रदेश के भिंड में 1971 में जन्मीं प्रज्ञा ठाकुर के पिता डॉ. चंद्रपाल सिंह एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक डॉक्टर थे और प्राकृतिक जड़ी बूटियों से मरीजों का इलाज करते थे.

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर: लड़कों जैसे कटे बाल, भगवा वस्त्र, गले में रूद्राक्ष पहनी 'हिंदुत्व' की प्रचारक
Sadhvi Pragya Singh Thakur: साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर
नई दिल्ली:

लड़कों की तरह कटे बाल, भगवा वस्त्र, गले में रूद्राक्ष और स्फटिक की मालाएं, माथे पर चंदन और कुमकुम का बड़ा सा तिलक और चेहरे पर सन्यास की दमक लिए साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का जीवन कई तरह के उतार चढ़ाव से भरपूर रहा और अब लोकसभा चुनाव में भोपाल से भाजपा उम्मीदवार बनने के बाद वह उमा भारती और योगी आदित्य नाथ की, बैराग्य के साथ राजनीति की विचारधारा की अगली कड़ी बनने जा रही हैं. 

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मध्य प्रदेश के भिंड में 1971 में जन्मीं प्रज्ञा ठाकुर के पिता डॉ. चंद्रपाल सिंह एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक डॉक्टर थे और प्राकृतिक जड़ी बूटियों से मरीजों का इलाज करते थे. प्रज्ञा के पिता डॉक्टर होने के साथ ही एक धर्मभीरू हिंदू होने के नाते हर दिन भागवत् गीता का पाठ करते थे. नन्हीं प्रज्ञा कभी पिता को जड़ी बूटियां पीसते देखती तो कभी गीता पढ़ते और इन दोनों ही कामों में उनके आसपास मौजूद रहा करती थी. पिता आरएसएस के जुड़े थे इसलिए प्रज्ञा में भी हिंदुत्व और राष्ट्रभक्ति का जज्बा बढ़ने लगा. धीरे-धीरे प्रज्ञा को हिंदू दर्शन में रूचि होने लगी और उन्होंने आध्यात्म की दुनिया में दस्तक देना शुरू किया. हालांकि इस दौरान वह राष्ट्रवाद से ओतप्रोत एक दिलेर और आत्मनिर्भर लड़की के रूप में बड़ी हो रही थीं, जो मोटरसाइकिल चलाती थी और लड़कियों को अपनी हिफाजत खुद करने के गुर सिखाती थी. वह विश्व हिंदू परिषद की महिला शाखा दुर्गा वाहिनी की सदस्य भी रहीं. 

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भिंड के लाहार कॉलेज से इतिहास में स्नातकोतर तक पढ़ाई करने वाली प्रज्ञा को छात्र जीवन में एक मुखर वक्ता के तौर पर देखा जाता था और आध्यात्म तथा हिंदुत्व पर शास्त्रार्थ में उन्हें हराना मुश्किल था. वह युवाओं में राष्ट्रवाद की भावना भरने का सपना देखती थीं और देशद्रोहियों को समाप्त करने को शास्त्रसम्मत बताती थीं. बहुत कम उम्र में ही वैराग्य और सन्यास का चोला पहन लेने वाली साध्वी प्रज्ञा अपने तीखे तेवर और राष्ट्रवाद पर अपने भड़काऊ भाषणों के कारण कई बार अखबारों की सुर्खियों में और विवादों के घेरे में रहीं.

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2002 में उन्होंने 'जय वन्दे मातरम् जन कल्याण समिति' बनाई. टेलीविजन पर एक कार्यक्रम के दौरान साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने मालेगांव विस्फोट मामले में उनका नाम आने के बाद एटीएस के अधिकारियों के हाथों मिली यातना का जिक्र किया. उन दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि तमाम जुल्म के बीच भी एक दिन उन्होंने गीत गाया, ‘मधुबन खुश्बू देता है, सागर सावन देता है, जीना उसका जीना है, जो औरों का जीवन देता है.' यह उनकी तेजतर्रार और फायरब्रांड विचारधारा के साथ ही उनके दिल के एक कोने में छिपे कोमल भाव की मासूम अभिव्यक्ति थी.

VIDEO : प्रज्ञा ठाकुर ने वापस लिया बयान

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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