पुष्प विहार स्थित बिरला विद्या निकेतन स्कूल में आयोजित एक कार्यक्रम में ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों के साथ अंतरिक्ष में बिताए अपने अनुभव साझा किए. कार्यक्रम में करीब 21 स्कूलों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया. इस दौरान पुरस्कार वितरण समारोह में मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया. ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने छात्रों से संवाद करते हुए न केवल अपने अंतरिक्ष मिशन से जुड़ा एक यादगार अनुभव सुनाया, बल्कि उन्हें चुनौतियों का सामना करने, आत्मविश्वास बनाए रखने और असफलताओं से सीखने की भी सलाह दी.
ISS पर तिरंगा देखकर भावुक हुआ मन
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर अपने तीसरे दिन का एक खास किस्सा साझा किया. उन्होंने बताया कि उस दिन उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत करनी थी. संवाद से पहले रेडियो चेक की प्रक्रिया चल रही थी. इसी दौरान उन्होंने ISS पर पहली बार भारतीय तिरंगे को देखा और हिंदी में बातचीत सुनी. शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष में तिरंगे को देखना और हिंदी में संवाद सुनना उनके लिए बेहद खास पल था. इस अनुभव ने उन्हें गर्व के साथ-साथ देश के प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी का एहसास भी कराया.

‘डर आपके दिमाग में होता है, हकीकत में नहीं'
कार्यक्रम के दौरान बिरला विद्या निकेतन के एक छात्र ने शुक्ला से पूछा कि ISS जाने की तैयारी करते समय क्या कभी उन्हें लगा कि वह पूरी तरह तैयार नहीं हैं या खुद को कमजोर महसूस किया. इस पर शुक्ला ने कहा कि जीवन में मुश्किलें आती रहेंगी. स्कूल से लेकर प्रोफेशनल जीवन तक, हर पड़ाव पर ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है.
फाइटर पायलट बनना मुश्किल या अंतरिक्ष में जाना?
ग्रुप कैप्टन शुभांशु से मॉडर्न स्कूल के छात्र वेदांत मेहता ने पूछा कि फाइटर पायलट बनना ज्यादा मुश्किल था या अंतरिक्ष में जाना. तो शुक्ला ने जवाब दिया कि दोनों ही अपने-अपने तरीके से चुनौतीपूर्ण हैं, क्योंकि दोनों के वातावरण और जरूरतें अलग हैं. उन्होंने कहा कि लगातार कोशिश करने से मुश्किल काम भी धीरे-धीरे आसान होने लगते हैं.

‘अगर आप नहीं, तो कौन?'
एक अन्य छात्रा ने सवाल किया कि अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे भारतीय होने के नाते क्या उन्हें अपने ऊपर बड़ी जिम्मेदारी महसूस होती है. इस पर शुक्ला ने कहा कि वह इस बात के बारे में जरूरत से ज्यादा नहीं सोचते. उनके लिए सबसे अहम यह है कि वह अपना काम किस तरह कर रहे हैं. ऐसी परिस्थितियों में वह खुद से पूछते हैं, ‘अगर आप नहीं, तो कौन?'
सीखने की क्षमता और भारत का अंतरिक्ष लक्ष्य
अपने संबोधन में शुक्ला ने कहा कि विद्यार्थियों के लिए सबसे जरूरी कौशल सीखने, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने और समस्याओं का समाधान खुद खोजने की क्षमता है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि शैक्षणिक सफलता के साथ चरित्र निर्माण और मजबूत मूल्यों का विकास उतना ही जरूरी है.
भारत की अंतरिक्ष यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा के अंतरिक्ष मिशन के 41 साल बाद, 2025 में वह अंतरिक्ष जाने वाले दूसरे भारतीय बने. उन्होंने गगनयान मिशन, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण और 2040 तक किसी भारतीय को चंद्रमा पर भेजने के लक्ष्य का जिक्र किया. शुक्ला ने अभिभावकों और स्कूलों से विद्यार्थियों को नए करियर विकल्पों के बारे में जागरूक करने और उनकी रुचियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने की अपील की. साथ ही, उन्होंने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य में हर नागरिक की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया.
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