- जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले के बदर गांव की मुबीना अख्तर नाग ने बिना कोचिंग के 56वीं रैंक हासिल की है
- मुबीना ने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त कर ट्यूशन पढ़ाते हुए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की
- उनके गांव में आठवीं-नौवीं कक्षा के दौरान पहली बार बिजली पहुंची थी
जम्मू-कश्मीर के पहाड़ों की गोद में बसा गांव बदर. यहां न बिजली थी और न ही इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाएं. मौसम की मार पड़ती सो अलग. परिवार में पढ़ाई-लिखाई का ज्यादा माहौल नहीं था. कॉलेज तक की पढ़ाई भी चुनिंदा बेटियों को ही नसीब होती थी. ऐसे विपरीत हालात में यहां की कोई बेटी डीएसपी बन जाए तो सफलता की नई कहानी लिखी जानी तय है. ऐसी ही सक्सेस स्टोरी मुबीना अख्तर नाग की है. जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले के पिछड़े गांवों में शामिल बदर की रहने वाली मुबीना अख्तर नाग ने बिना कोचिंग के 56वीं रैंक हासिल कर जम्मू-कश्मीर पुलिस में अधिकारी बनने का सपना पूरा किया है. उनकी सफलता ने न केवल परिवार, बल्कि पूरे इलाके को गौरवान्वित किया है. वह अब क्षेत्र की अन्य बेटियों के लिए प्रेरणा और मिसाल बन गई हैं.

मुबीना अख्तर नाग ने बिना कोचिंग के 56वीं रैंक हासिल कर जम्मू-कश्मीर पुलिस में अधिकारी बनने का सपना पूरा किया है. Photo Credit: mubina akhter nag instagram
अंग्रेजी साहित्य से की पढ़ाई, ट्यूशन पढ़ाकर की तैयारी
जम्मू-कश्मीर लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद मीडिया से बातचीत में मुबीना अख्तर नाग ने बताया कि उन्होंने अंग्रेजी साहित्य से स्नातक की डिग्री प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की. मुबीना ने बताया कि तैयारी के दौरान उन्होंने किसी कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया. पढ़ाई के साथ-साथ वह होम ट्यूशन भी पढ़ाया करती थीं. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया और लगातार मेहनत जारी रखी.

मुबीना के अनुसार, जब वे आठवीं-नौवीं कक्षा में थीं, तब उनके गांव में पहली बार बिजली पहुंची थी.Photo Credit: mubina akhter nag instagram
आठवीं-नौवीं में गांव पहुंची थी बिजली
मुबीना के अनुसार, जब वे आठवीं-नौवीं कक्षा में थीं, तब उनके गांव में पहली बार बिजली पहुंची थी. उससे पहले यहां के बच्चों को रात में लालटेन या चिमनी की रोशनी में ही पढ़ाई करनी पड़ती थी. उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा मुबारक मंडी से पूरी की. इसके बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए एसआरएस लाइब्रेरी ज्वाइन की, जहां उन्होंने नियमित अध्ययन कर अपने लक्ष्य की दिशा में कदम बढ़ाया.
इंटरनेट नहीं था, फिर भी नहीं छोड़ा सपना
मुबीना कहती हैं कि आज के दौर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में इंटरनेट का व्यापक उपयोग होता है, लेकिन उनके गांव में यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी. गांव में बिजली तो पहुंच गई थी, लेकिन इंटरनेट की स्पीड बेहद कमजोर थी, जिससे ऑनलाइन पढ़ाई करना आसान नहीं था. परिवार में सबसे छोटी मुबीना को उनकी इस यात्रा में परिवार का भरपूर सहयोग मिला. कठिन परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और तकनीकी सुविधाओं की कमी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. आज उनकी सफलता उन तमाम बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो ग्रामीण और पिछड़े इलाकों से निकलकर बड़े सपने देख रही हैं.
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