Motivational Kabir Dohe Hindi : आज के इस डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में स्टूडेंट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती भटकाव और एकाग्रता की कमी है. ऐसे में संत कबीर दास जी के दोहे छात्रों के लिए किसी मार्गदर्शक से कम नहीं हैं. भटके हुए चंचल मन को काबू करने से लेकर सही व्यक्ति को परखने की कला सिखाते कबीर दास जी के ये 5 दोहे हर छात्र और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स को एक बार जरूर पढ़नी चाहिए.
1- मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक.जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक..
अर्थ : कबीर दास जी कहते हैं कि हमें कभी भी अपने चंचल मन के इशारों पर आंखें मूंदकर नहीं भरोसा करना चाहिए, क्योंकि इस मन की इच्छाएं और विचार हर पल बदलते रहते हैं. जो व्यक्ति अपने बहकते हुए मन पर काबू पा लेता है, वही असल मायने में एक सच्चा और महान इंसान (साधु) बन पाता है.
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एक शब्द बन्धन कटे, एक शब्द गल फंसि..
अर्थ : हमारे द्वारा बोले गए शब्द ही सुख का खजाना हैं और वही दुखों का कारण भी बनते हैं. प्रेम भरे शब्द हमारे जीवन के सभी बंधनों और कड़वाहट को काट देते हैं, जबकि बिना सोचे-समझे बोले गए कटु वचन गले का फंदा बन जाते हैं.
3- कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल.
दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूले..
अर्थ : कबीर जी संसार की नश्वरता को समझाते हुए कहते हैं कि यह दुनिया सेमल के फूल जैसी है, जो बाहर से बहुत सुंदर दिखती है पर भीतर से खोखली होती है. जीवन के इस थोड़े से समय के क्षणिक सुखों और झूठे दिखावों में पड़कर हमें अपने लक्ष्य से को नहीं भूलना और न ही भटकना चाहिए.
4- भेष देख मत भूलिये, बुझि लीजिये ज्ञान.
बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान..
अर्थ : कबीर दास कहते हैं किसी के बाहरी पहनावे या रूप-रंग को देखकर भ्रमित न होना चाहिए, बल्कि उसके भीतर छिपे ज्ञान और चरित्र को जानने का प्रयास करें. जिस प्रकार सोने की शुद्धता की परख कसौटी पर घिसने के बाद ही होती है, उसी तरह मनुष्य की असल पहचान उसके गुणों से होती है.
5- कुबुद्धि और वैचारिक शुद्धता परकामी अमी न भावई, विष ही कौं लै सोधि.
कुबुद्धि न जाई जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोधि..
अर्थ : संत कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि जिस मनुष्य का मन वासनाओं, स्वार्थ और बुराइयों में डूबा रहता है, उसे अमृत जैसी पवित्र और फायदे वाली बातें भी कभी अच्छी नहीं लगतीं. उसका मन हमेशा हर जगह केवल बुराइयों और नकारात्मकता को ही खोजता रहता है. ऐसे कुबुद्धि वाले इंसान के भीतर की नकारात्मकता तब तक दूर नहीं हो सकती, जब तक वह खुद सुधरने के बारे में न सोचे, फिर चाहे साक्षात भगवान शिव भी खुद उसे समझाने क्यों न आ जाएं.
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