राजधानी जयपुर के आमेर के लबाना गांव से निकलकर विजय शंकर मीणा ने दिल्ली की छात्र राजनीति में बड़ी दस्तक दी है. दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ अध्यक्ष पद के लिए NSUI ने विजय शंकर मीणा को अपना प्रत्याशी बनाया है एक साधारण किसान-मजदूर परिवार से निकलकर देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति के बड़े चुनावी मैदान तक पहुंचे विजय शंकर को टिकट मिलने के बाद उनके पैतृक गांव लबाना में खुशी का माहौल है. गांव से दिल्ली तक विजय शंकर के सफर को लोग संघर्ष,मेहनत और हौसले की कहानी के तौर पर देख रहे हैं.
मां-बाप दोनों पैरों से दिव्यांग
विजय शंकर मीणा का परिवार आर्थिक और शारीरिक चुनौतियों से जूझता रहा है. उनके पिता रामजी लाल मीणा क्रेशर पर मजदूरी करते हैं, जबकि मां माया देवी खेती का काम संभालती हैं. दोनों माता-पिता पैरों से दिव्यांग हैं. सीमित संसाधनों और मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद परिवार ने विजय शंकर की पढ़ाई को प्राथमिकता दी. माता-पिता की मेहनत और बेटे के संघर्ष ने उसे गांव से दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया.
क्रेशर की मजदूरी से बेटे के सपनों तक का सफर
परिवार की रोजी-रोटी के लिए पिता रामजी लाल मीणा क्रेशर पर मजदूरी करते हैं. वही मां माया देवी खेती का काम संभालती हैं. परिवार की परिस्थितियां आसान नहीं थीं, लेकिन विजय शंकर ने पढ़ाई और अपने भविष्य के लक्ष्य को लेकर लगातार मेहनत जारी रखी. अब वही विजय शंकर दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति के सबसे बड़े पदों में से एक के लिए मैदान में हैं.
विनोद जाखड़ के भरोसे से मिला बड़ा मौका
विजय शंकर मीणा को NSUI की ओर से अध्यक्ष पद का टिकट मिलने के बाद विनोद जाखड़ के भरोसे की भी चर्चा है. टिकट की घोषणा के साथ ही समर्थकों में उत्साह नजर आया, वहीं आमेर के लबाना गांव में भी समर्थकों और ग्रामीणों ने इसे क्षेत्र के लिए गौरव का अवसर बताया.
एलएलबी की तैयारी कर रहे विजय शंकर
विजय शंकर मीणा वर्तमान में दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई की तैयारी कर रहे हैं. छात्र राजनीति में सक्रियता के साथ अब उन्हें NSUI ने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी के लिए मैदान में उतारा है. अध्यक्ष पद का टिकट मिलने के बाद उनकी चुनावी मुहिम को लेकर समर्थकों में उत्साह बढ़ गया है.
दो बहनों की भी जिम्मेदारी
विजय शंकर की बड़ी बहन प्रिया मीणा स्नातक की पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं, जबकि छोटी बहन कशिश मीणा फिलहाल सेकंड ईयर में पढ़ाई कर रही हैं. परिवार के अनुसार घर की आर्थिक परिस्थितियां हमेशा आसान नहीं रहीं. दादी ने मजदूरी कर परिवार को संभालने में योगदान दिया और परिवार ने सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी. परिवारजनों ने बताया कि विजय शंकर के माता-पिता दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने बच्चों की शिक्षा में कोई कमी नहीं आने दी.
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