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DUSU Election: ABVP या NSUI, वोटिंग से पहले डीयू के छात्रों ने बताई अपने मन की बात

DUSU Election 2026: दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव का रंग-रूप इस बार थोड़ा बदला हुआ नजर आया. एनडीटीवी से बात करते हुए छात्रों ने बताया कि कैसे ये चुनाव अलग है और हवा किस तरफ बह रही है.

DUSU Election:  ABVP या NSUI, वोटिंग से पहले डीयू के छात्रों ने बताई अपने मन की बात
DUSU चुनाव से पहले कैसा था कैंपस का माहौल

दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्रसंघ चुनाव (DUSU Election) अपनी धमक और शक्ति प्रदर्शन के लिए जाना जाता है, लेकिन वोटिंग की पूर्व संध्या पर कैंपस का माहौल बिल्कुल नॉर्मल दिनों जैसा नजर आया. पिछले चुनावों की तुलना में कैंपस के माहौल में काफी कुछ तब्दीली आ चुकी है. कैंपस में चुनावी पर्चे हमेशा की तरह नहीं नजर आ रहे थे. चुनाव के एक दिन पहले वो शोर नहीं दिखा, जिसके लिए डीयू छात्रसंघ चुनाव की पूरे देश में चर्चा होती थी. आर्ट फैकल्टी के ठीक बीचोबीच यूनिवर्सिटी प्लाजा के पास बने पार्क में आम दिनों की तरह छात्र सुहानी शाम का आनंद लेते, चकल्लस करते और बेलौस टहलते हुए नजर आए. बगल में स्थित केंद्रीय पुस्तकालय भी अपने अंदाज में दिखा. चुनावी माहौल जैसी हुड़गंद कहीं नहीं नजर आई. मानो पार्क में स्थापित की गई स्वामी विवेकानंद की मूर्ति की खामोशी डीयू के छात्रों ने भी ओढ़ ली हो. 

हालांकि, हमने फैकल्टी में मौजूद कुछ छात्रों से बातचीत की, जिन्होंने चुनावी माहौल और मुद्दों पर अपनी राय साझा की. कई छात्र खुलकर बात करने से बच रहे थे. लेकिन कुछ भी कहा जाए, कैंपस के माहौल से पता चला कि इस बार का छात्रसंघ चुनाव हर बार जैसा नहीं है.

हमेशा से काफी अलग है कैंपस की आब-ओ-हवा!

बीए पॉलिटिकल साइंस की थर्ड ईयर की स्टूडेंट तनु सिंह कहती हैं कि मैंने फर्स्ट ईयर में बहुत क्रेजी इलेक्शन देखे हैं. उस वक्त बड़े काफिले आते थे और बहुत ज्यादा पैसे खर्च किए गए थे. वहीं, बीएम समाजशास्त्र की सेकंड ईयर की छात्रा सरभा महेश्वरी कहती हैं कि पिछले साल के चुनाव में बहुत ज्यादा शोरगुल था, जो इस बार नहीं नजर आया. 

लॉ फैकल्टी में थर्ड ईयर के छात्र शीबू सिंह छात्रसंघ चुनाव में हुए बदलाव पर बात करते हुए कहते हैं, " पिछले बार कैंपस में पर्चे उड़े थे. इस बार पर्चे नहीं उड़े हैं. मैं फर्स्ट ईयर में था, तो कोई ऐसी जगह नहीं बची थी, जहां पर पर्चा न उड़ाया गया हो. जिस लेवल का पहले चुनाव प्रचार होता था, उस तरह इस बार नहीं हुआ है."

एम हिंदी जर्नलिज्म के छात्र सोनू कुमार कहते हैं, "पहले के चुनावों में पोस्टर और बैनर बहुत ज्यादा होते थे. ग्राउंड और पूरी दीवारें भरी रहती थीं. इस बार कोर्ट के निर्देश के बाद सफाई और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया गया है. गाड़ी तो घुमाई गई लेकिन पहले की तुलना में गंदगी कम की गई."

लॉ फैकल्टी में फाइनल ईयर के स्टूडेंट अजहर कमल कादरी कहते हैं, "इस बार कैंपस में लग ही नहीं रहा है कि चुनाव हो रहा है. ये कहीं न कहीं न्यायपालिका के दखल का असर है. पिछली बार कैंपस में चुनाव से एक दिन पहले नाच-गाना हो रहा था. कोड ऑफ कंडक्ट लगने के बाद भी कोई मान नहीं रहा था. इस बार का माहौल बहुत शांत है, ये बहुत ही अच्छी बात है. छात्र पढ़ाई भी कर रहे हैं और चुनाव भी हो रहा है."

ABVP या NSUI किसका पलड़ा भारी?

एमए फाइनल की छात्रा दीपा कहती हैं कि इस चुनाव में एबीवीपी जीत रही है, क्योंकि संगठन ने कई ऐसा काम किया है, जिससे एक बार ABVP को जीतना चाहिए. संगठन अच्छी लाइब्रेरी की मांग कर रहा है, स्पोर्ट्स में ABVP राउंडटेबल कार्यक्रम करवाया और सत्य निकेतन हादसे पर मुखर है."

वहीं, छात्रा तनु सिंह कहती हैं, "ऐसा नहीं लग रहा है कि पैनल पर एक ही पार्टी का दबदबा हो जाएगा. इस बार का रिजल्ट मिला-जुला आने वाला है. सारी सीटें एक ही संगठन के हिस्से नहीं जाएंगी. पैनल की कुछ सीटें NSUI और कुछ ABVP के हिस्से जा सकती हैं."

वे आगे कहती हैं कि सीजेपी प्रोटेस्ट के बाद डीयू में लेफ्ट संगठनों का बोलबाला बढ़ा है. छात्र ABVP और NSUI के अलावा भी अपने विकल्प बना रहे हैं और इन विकल्पों में लेफ्टिस्ट और कम्युनिस्ट संगठन शामिल हैं.

इसके अलावा, छात्र सोनू कुमार कहते हैं, "डीयू की सत्ता बदलने वाली है. इस चुनाव में एनएसयूआई एबीवीपी पर भारी पड़ रहा है. पिछले साल चुनाव के बाद पैनल में एबीवीपी भारी थी. छात्रसंघ अध्यक्ष ABVP से ही रहे, उसके बाद भी बच्चों की हॉस्टल की दिक्कतें दूर करने की कोशिश नहीं की गई."

वे आगे कहते हैं कि अभी NSUI ज्यादा एक्टिव दिख रही है. संगठन ने सत्य निकेतन में जाकर बच्चों की मदद की थी. वहां पर ABVP वाले भी गए थे लेकिन इससे पहले उनका पता नहीं था.

स्टूडेंट अजहर कमल कादरी कहते हैं, "छात्र ABVP से नाराज हैं. सीजेपी के प्रोटेस्ट के दौरान 20 जुलाई को जब छात्रों को लाठी से मारा जा रहा था, तो सारे संगठन छात्रों के सपोर्ट में आए थे लेकिन एबीवीपी ने समर्थन नहीं किया था. मुझे यह लगता है कि चुनाव में इसका प्रभाव पड़ेगा."

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