दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव को लेकर राजधानी का राजनीतिक माहौल लगातार गर्माता जा रहा है. 18 सितंबर को मतदान और 19 सितंबर को मतगणना के साथ नतीजों की घोषणा होनी है. चुनाव की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है, ABVP से लेकर NSUI, SFI और आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ASAP तक सभी संगठन अपनी-अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं. इसी बीच SRCC में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम को लेकर भी सियासी बयानबाजी तेज हो गई है. आरोप-प्रत्यारोप के बीच बड़ा सवाल यही है कि इस बार DUSU चुनाव की असली तस्वीर क्या है? आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय के युवा मतदाताओं के मुद्दे क्या हैं, कौन से संगठन उन्हें अपने साथ जोड़ने में कामयाब होंगे और छात्र राजनीति में इस बार किन राजनीतिक चेहरों और वैचारिक ध्रुवों की छाप दिखाई देगी?
Gen Z के मुद्दों के बीच बदलता छात्र राजनीति का मिजाज
इस बार का DUSU चुनाव कई मायनों में खास माना जा रहा है. हाल हीं में हुए RE-NEET जैसे मुद्दों को लेकर हुए आंदोलनों के बाद छात्र संगठन अब Gen Z मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. ITO स्थित ABVP के कार्यालय से लेकर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस और NSUI के दफ्तरों तक बैठकों का दौर जारी है. लेकिन इन तमाम राजनीतिक गतिविधियों के बीच असली सवाल कैंपस के अंदर का है, आखिर छात्र किन मुद्दों पर वोट करेंगे?
क्या रहेंगे छात्रों को मुद्दे
DUSU चुनाव में लॉ फैकल्टी हमेशा से चर्चा का केंद्र रहती है. छात्रों की समस्याओं को समझने के लिए हमने LC1 की छात्रा तुबा इरफान से बात की. उनका कहना है कि महिला छात्रों के लिए सैनिटेशन सबसे बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा कैंपस के कई हिस्सों में पर्याप्त रोशनी नहीं है, जिसके कारण रात में आने-जाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है.
दोनों छात्रों ने एक और अहम समस्या की ओर इशारा किया, हॉस्टल में सीमित सीटें. सीटें कम होने के कारण कई छात्रों को महंगे PG या किराए के कमरों में रहना पड़ता है. वहीं मिरांडा हाउस की छात्रा याशिका की चिंता कुछ अलग है. उनका कहना है कि DUSU चुनाव के दौरान कैंपस में काफी शोर-शराबा रहता है. लेकिन छात्रों से जुड़े मुद्दों की बात करें तो कैंटीन की व्यवस्था उनके लिए महत्वपूर्ण है. याशिका शाकाहारी हैं और उनका कहना है कि कॉलेज कैंटीन में वेज और नॉन-वेज खाना एक ही जगह उपलब्ध होने से उन्हें असुविधा होती है. उनकी मांग है कि दोनों के लिए अलग व्यवस्था की जाए, जिससे छात्रों को अधिक सुविधा मिल सके. आर्ट्स फैकल्टी की कुछ छात्राओं का कहना है कि छात्रसंघ चुनावों में लड़कियों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम रहता है. उनका मानना है कि चुनावी माहौल कई बार इतना तनावपूर्ण और आक्रामक हो जाता है कि कई छात्राएं चुनावी मैदान में उतरने से हिचकिचाती हैं.
ABVP ने खोले पत्ते, 9 नामों से शुरू हुई प्री-कैंपेनिंग
अब बात चुनावी मैदान की करें तो ABVP ने प्री-कैंपेनिंग शुरू कर दी है. संगठन की ओर से फिलहाल नौ संभावित उम्मीदवारों के नाम सामने आए हैं:
आलोक अत्री, आयुषी शर्मा, इशु मौर्य, नितिन तंवर, रिया छावरी, सनी डेडहा, तान्या मावी, यश डबास, लक्ष्य राज सिंह हालांकि नामांकन की तारीख करीब आने के साथ इन नामों में बदलाव की संभावना है. संगठन अब उम्मीदवारों की लोकप्रियता, व्यक्तिगत प्रभाव और संभावित वोट बैंक को देखते हुए अंतिम चेहरे तय करने की कवायद में जुटा है.
बताया जा रहा है कि इससे पहले करीब 1000 ID कार्ड यानी संभावित मतदाताओं की सूची के आधार पर भी उम्मीदवारों की ताकत का आकलन किया गया. जिन नौ नामों का प्रदर्शन बेहतर रहा, उन्हें आगे रखा गया, जबकि बाकी संभावित नामों को फिलहाल पीछे कर दिया गया है.
खोई पकड़ वापस हासिल करने की फिराक में NSUI
दूसरी तरफ NSUI ने भी आठ संभावित उम्मीदवारों के साथ प्री-कैंपेनिंग की घोषणा की है. संगठन के कार्यकर्ता लगातार अलग-अलग कॉलेजों और विभागों में छात्रों के बीच पहुंच बना रहे हैं. ABVP और NSUI के अलावा आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ASAP भी इस बार चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रही है. SFI भी चुनाव में है. हालांकि मौजूदा चुनावी सरगर्मी को देखते हुए फिलहाल मुख्य मुकाबला ABVP और NSUI के बीच ही दिखाई दे रहा है.

मैनिफेस्टो में छात्रों की आवाज, QR Code से मांगे जा रहे सुझाव
चुनाव के साथ-साथ दोनों प्रमुख छात्र संगठन अपने-अपने घोषणापत्र को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. ABVP ने QR Code जारी कर छात्रों से मैनिफेस्टो के लिए सुझाव मांगे हैं. उसका कहना है—“DU का Future, DU के Students ही लिखेंगे.” वहीं NSUI “अकाउंटेबल डीयू, अकाउंटेबल डूसू” अभियान चला रही है. यानी दोनों संगठन इस बार छात्रों के मुद्दों और विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही को चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
एक-एक वोट पर नजर, राज्यों से बुलाए जा रहे कार्यकर्ता
चुनाव जीतने के लिए संगठन अब एक-एक विद्यार्थी के स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. ABVP ने अलग-अलग राज्यों से अपने संगठन मंत्रियों और कार्यकर्ताओं को दिल्ली बुलाना शुरू कर दिया है. रणनीति यह है कि जिस राज्य से कोई कार्यकर्ता आता है, वह उस राज्य के छात्रों से संपर्क करे और उन्हें उसे अपने साथ जोड़े.

ABVP से जुड़े एक कार्यकर्ता ने इसे समझाते हुए कहा कि संगठन “पंचायत चुनाव जैसी वोटिंग” की तैयारी कर रहा है और एक-एक वोट पर नजर रखी जा रही है. NSUI भी अपने डिसेंट्रलाइज्ड फोर्स को दिल्ली बुला रही है.
NSUI के चुनाव प्रभारी अखिलेश यादव ने NDTV से बातचीत में बताया कि उनकी टीम के सदस्य अलग-अलग राज्यों से दिल्ली आएंगे और चुनावी अभियान में हिस्सा लेंगे.
सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भी छात्रों को साधने की तैयारी
छात्रों तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दल और छात्र संगठन सिर्फ राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहते. रंगारंग और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भी छात्रों को जोड़ने की तैयारी है. ABVP अलग-अलग क्षेत्रों और राज्यों की सांस्कृतिक पहचान को ध्यान में रखते हुए मध्यांचल और पूर्वांचल जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी में है. इन कार्यक्रमों के जरिए संगठन अपने उम्मीदवारों को भी छात्रों के बीच प्रमोट करेगा.
NSUI भी इसी तरह के कार्यक्रमों की तैयारी कर रही है. वहीं ASAP अलग तरीके से छात्रों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है. संगठन की ओर से “Clean the Campus” जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं.
दूसरी ओर AISA और SFI अभी पूरी तरह चुनावी अभियान में नहीं उतरे हैं. हालांकि माना जा रहा है कि वामपंथी छात्र संगठनों का फोकस Gen Z से जुड़े मुद्दों और हाल के छात्र आंदोलनों के आसपास रह सकता है.
10 सितंबर के बाद दिखेगा असली रंग
फिलहाल जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह चुनावी तैयारी का शुरुआती दौर है. असली तस्वीर 10 सितंबर को नामांकन के बाद साफ होगी. इसके बाद उम्मीदवारों की संख्या, संगठन की अंतिम पसंद और जमीनी ताकत सामने आएगी.
लग्जरी गाड़ियों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठे. इस पर संगठनों का कहना है कि पांच गाड़ियों की अनुमति है और वे नियमों का पालन करेंगे. हालांकि इन दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना अंतर है, इसकी असली तस्वीर 10 सितंबर के बाद सामने आएगी.
DUSU चुनाव के प्रभारी प्रॉक्टर मनोज कुमार सिंह पहले ही कह चुके हैं कि लिंगदोह कमेटी के सभी मानकों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय निष्पक्ष और नियमों के अनुरूप चुनाव कराएगा.
SRCC में PM मोदी के कार्यक्रम पर सियासी घमासान
DUSU चुनाव के बीच SRCC में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. NSUI के चुनाव प्रभारी अखिलेश यादव ने अपने X हैंडल के साथ-साथ NDTV से बातचीत में सवाल उठाया कि आचार संहिता लागू होने के बाद प्रधानमंत्री का कैंपस में कार्यक्रम क्यों हो रहा है? उन्होंने सवाल किया कि क्या यह चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश है?
ABVP ने इन आरोपों पर पलटवार किया है. दिल्ली प्रदेश के मीडिया संयोजक हरेश ने NDTV से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री का कार्यक्रम सरकारी था. उन्होंने NSUI पर निशाना साधते हुए कहा कि "अगर उन्हें इतनी आपत्ति है तो कांग्रेस अपने नेता राहुल गांधी को मैदान में उतारना चाहिए."

ABVP का दावा है कि अगर राहुल गांधी प्रचार के लिए आ जाएंगे तो पिछली बार वह करीब 16 हजार वोटों से जीती थी लेकिन इस बार 20 हजार वोटों से जीत दर्ज करेगी. ऐसे में SRCC का कार्यक्रम अब सिर्फ एक विश्वविद्यालयी कार्यक्रम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति के नैरेटिव का भी हिस्सा बन गया है.
बिना वेतन का पद, लेकिन राजनीति का बड़ा लॉन्चपैड
DUSU अध्यक्ष का पद कोई वेतन नहीं देता, लेकिन छात्र राजनीति में इसकी अहमियत काफी बड़ी है. एक साल के कार्यकाल के दौरान अध्यक्ष को विश्वविद्यालय के VC, सांसदों और मंत्रियों के साथ संवाद का अवसर मिलता है. इसके अलावा ABVP, NSUI, AISA जैसे छात्र संगठनों और बड़े राजनीतिक नेताओं के साथ नेटवर्क तैयार होता है.
छात्रसंघ के पास फंड और इवेंट बजट भी होते हैं, हालांकि उन पर विश्वविद्यालय के नियमों और ऑडिट की प्रक्रिया लागू होती है. यही वजह है कि DUSU अध्यक्ष का पद कई छात्रों के लिए भविष्य की राजनीति, पब्लिक पॉलिसी, मीडिया और सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ने का लॉन्चपैड माना जाता है.
हालांकि इस पद के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं. अकादमिक दबाव, मीडिया की निगरानी, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ लगातार संवाद इसकी जिम्मेदारियों का हिस्सा हैं. DUSU के पास वार्षिक संचालन फंड और बजट लगभग 20 से 24 लाख रुपये के आसपास बताया जाता है.
DUSU में कौन-कौन से कॉलेज और विभाग आते हैं?
आपको बता दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी कॉलेज और विभाग DUSU चुनाव के दायरे में नहीं आते. DUSU के अंतर्गत 47 कॉलेज और 5 विभाग आते हैं. बाकी कॉलेजों में चुनाव कॉलेज स्तर पर होते हैं और उनका DUSU चुनाव से सीधा संबंध नहीं होता.
DUSU में चार प्रमुख पदों के लिए चुनाव होता है—अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव. इन चार पदों के लिए ABVP, NSUI, SFI, ASAP समेत विभिन्न छात्र संगठन अपनी पूरी ताकत झोंकते हैं. खास बात यह है कि छात्र इन चुनावों में EVM के जरिए मतदान करते हैं.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी DUSU चुनाव की शुरुआत 1954 में हुई थी. हालांकि यह चुनाव 1975-76 में आपातकाल के दौरान, 1990 में मंडल आयोग के विरोध के समय और फिर कोरोना महामारी के दौरान 2020 से 2023 तक नहीं हो सके. इस बार 10 सितंबर को नामांकन, 18 सितंबर को मतदान और 19 सितंबर को मतगणना के बाद नतीजे घोषित किए जाएंगे.
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