रोजगार पैदा करने के वादों की जवाबदेही और पारदर्शिता पर क्या कुछ करेगी सरकार

ऐसी सभी परियोजनाओं के लिए एक डैशबोर्ड होना चाहिए जो नियोजित लोगों के नाम, उनके वेतन आदि के बारे में जानकारी दिखाता हो.

रोजगार पैदा करने के वादों की जवाबदेही और पारदर्शिता पर क्या कुछ करेगी सरकार

नरेंद्र मोदी सरकार रोजगार पर खासा ध्यान देने के कोशिश कर रही है.

नई दिल्ली:

14 जून 2022 की सुबह पीएमओ (PMO) के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए एक ट्वीट ने सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं में आशा की एक नई किरण जगा दी थी. @PMOIndia ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि-  पीएम @narendramodi ने सभी विभागों और मंत्रालयों में मानव संसाधन की स्थिति की समीक्षा की और निर्देश दिया कि 10 लाख की भर्ती की जाए. सरकार द्वारा अगले 1.5 वर्षों में लोगों को मिशन मोड में इस योजना के तहत रोजगार दिया जाए.

इस अभियान के तहत सरकार ने रोजगार मेले का शुभारंभ किया और युवाओं को नियुक्ति पत्र सौंपे. रोजगार मेले का पहला संस्करण 22 अक्टूबर 2022 को आयोजित हुआ जहां 75,000 युवाओं को नियुक्ति पत्र दिए गए. प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि यह भर्ती केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों द्वारा स्वयं और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी), कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी), रेलवे भर्ती बोर्ड जैसी भर्ती एजेंसियों के माध्यम से की जाती है. तेजी से भर्ती के लिए चयन प्रक्रिया को सरल और तकनीकी रूप से कुशल बनाया गया है. 

प्रेस विज्ञप्ति में यह स्पष्ट नहीं था कि इन पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया पीएमओ के ट्वीट की तारीख 14 जून, 2022 से पहले शुरू हुई थी या उसके बाद. यहां, इस तथ्य की ओर ध्यान देना जरूरी है कि अगस्त 2020 में कैबिनेट ने केंद्र सरकार में पदों की भर्ती प्रक्रिया के लिए राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी (एनआरए NRA) की स्थापना को मंजूरी दी थी. उस बात को आज दो साल से भी ज्यादा समय हो गया पर अभी तक भर्ती के लिए एनआरए ने एक भी एग्जाम नहीं करवाया है.

सरकार हमेशा से ही रोजगार सृजन को लेकर बड़े बड़े दावे करती रही हैं और विपक्ष हमेशा से ही रोजगार को लेकर राजनीति करता रहा है. वास्तविक आंकड़े और दावों में अंतर बना ही रहा है.

फरवरी 2019 मीडिया में तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण का बयान छपा था. उन्होंने कहा था कि रक्षा गलियारों से यूपी और तमिलनाडु में 3.5 लाख नौकरियां पैदा होंगी. दो साल बाद सांसद रेवती रमण सिंह ने राज्यसभा में एक सवाल पूछा - आगामी वर्षों में डिफेंस कॉरिडोर के निर्माण से कितने लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है? 

21 जुलाई 2021 को रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने लिखित जवाब देकर कहा कि संबंधित राज्य सरकारों द्वारा उद्योगों के साथ किए गए एमओयू के आधार पर सूचित किए गए अनुमानों, आने वाले वर्षों में यूपीडीआईसी के पास 16,700 से अधिक व्यक्तियों के लिए रोजगार सृजन, और टीएनडीआईसी के पास 25,000 व्यक्तियों के लिए रोजागर सृजन की क्षमता है. मीडिया के लिए 3.5 लाख के रोजगार सृजन की संख्या को संसद में घटाकर 41,700 कर दिया गया.

अक्टूबर 2020 में, नितिन गडकरी ने असम के जोगीघोपा में मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क (MMLP) की आधारशिला रखते हुए कहा कि यह पार्क अंतरराष्ट्रीय स्तर का होगा और लगभग 20 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करेगा और असम के विकास का इंजन बनेगा. हालांकि, उसी मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क द्वारा नौकरियों के सृजन के संबंध में लोकसभा में सांसद अब्दुल खालके के सवाल के जवाब में नितिन गडकरी ने कहा, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के अनुसार एमएमएलपी (MMLP) के शुरू होने के बाद लगभग 11521 लोगों के लिए रोजगार सृजित होने का अनुमान लगाया गया है.

मुद्दा सिर्फ इतना ही नहीं है कि मंत्रियों ने मीडिया में परियोजनाओं की रोजगार सृजन करने की क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया; बल्कि, बड़ा मुद्दा यह है कि रोजगार संबंधी बयानों के लिए हमारे सरकारी तंत्र को जवाबदेह बनाने के लिए प्रणालियों की कमी हैं. मंत्री के मीडिया में दिए गए बयान को अलग रख भी दिया जाए और संसद में उनके द्वारा प्रदान किए गए आंकड़ों को सटीक मानें तब भी सवाल अभी वही है, क्या हमारे पास परियोजना या योजना द्वारा नौकरियों के सृजन की निगरानी के लिए कोई असरदार तंत्र है?  

2021-22 के बजट में सरकार ने 13 क्षेत्रों के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं (Production linked incentive) के लिए 1.97 लाख करोड़ रुपये देने की प्रतिबद्धता जताई है और दावा किया गया कि इससे 60 लाख नई नौकरियां पैदा होंगी. सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं है बल्कि राज्य सरकार भी अपने राज्य में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए, निवेश आकर्षित करने के लिए कॉर्पोरेट्स को कई तरह के प्रोत्साहन प्रदान करती हैं. 

हाल ही में वेदांता-फॉक्सकॉम सेमिकंडक्टर प्लांट को लेकर एक विवाद देखा गया है. मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि महाराष्ट्र ने ₹40,000 करोड़ की पूंजीगत सब्सिडी और 1100 एकड़ भूमि की पेशकश की, जिसमें 400 एकड़ मुफ्त में देने की पेशकश की गई थी. उसके बाद भी प्रोजेक्ट गुजरात शिफ्ट हो गया. मूल प्रश्न यहाँ भी वही है, जब सरकारें कॉर्पोरेट्स को हजारों करोड़ के पैकेज प्रदान करती हैं, तो क्या परियोजना से उत्पन्न रोजगार के अवसरों को ट्रैक करने के लिए कोई प्रभावी और पारदर्शी तंत्र है?

12 जुलाई 2019 को कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी कि सरकार ने निवेश को बढ़ाने, लगभग 1.11 करोड़ नौकरियों के सृजन तथा परिधान एवं मेड-अप्स क्षेत्र में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित संघटकों के साथ वर्ष 2016 में 6000 करोड़ रुपए का एक विशेष पैकेज दिया है.  2 साल बाद सांसद अशोक नेते ने सवाल पूछा कि क्या यह सच है कि कपड़ा उद्योग में पैदा होने वाला रोजगार पांच साल में रोजगार पैदा करने के लिए निर्धारित लक्ष्य से काफी कम है? जवाब में वस्त्र राज्य मंत्री दर्शना जरदोश ने 6 अगस्त 2021 को लोकसभा बताया कि सरकार वस्त्र क्षेत्र में रोजगार सृजन के लिए लक्ष्य निर्धारित नहीं करती है. तो प्रश्न यह है कि 1.11 करोड़ रोजगार सृजन की घोषणा के बारे में नागरिक सरकार की जवाबदेही कैसे तय कर सकते हैं?

शासन में पारदर्शिता के लिए सरकार ने मनरेगा मजदूरों के जॉब कार्ड का डाटा वेबसाइट पर डाला है. वेबसाइट श्रमिकों की फोटो, श्रमिकों के कार्य दिवस आदि की जानकारी प्रदर्शित करती हैं. इसी तरह खाद्य सुरक्षा का एक ऑनलाइन पोर्टल भी है. यह राशन कार्ड धारकों की जानकारी प्रदर्शित करता है. जब सरकार करोड़ों मनरेगा कार्ड और राशन कार्ड धारकों के रिकॉर्ड को डिजिटलाइज्ड कर सकती है और ट्रैक कर सकती है, तो सरकार उन सभी परियोजनाओं का डिजिटल डैशबोर्ड क्यों नहीं बना सकती है, जहां सरकार नौकरी सृजन के लिए कॉर्पोरेट को सब्सिडी देती है?

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ऐसी सभी परियोजनाओं के लिए एक डैशबोर्ड होना चाहिए जो नियोजित लोगों के नाम, उनके वेतन आदि के बारे में जानकारी दिखाता हो.