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कभी जुहू में था 25 कमरों वाला बंगला, हफ्ते के सात दिनों के लिए रखीं थी 7 आलीशान कारें, 24 साल पहले मुफलिसी में मुंबई की चॉल में तोड़ा दम

ये शख्स एक मजदूर से बॉलीवुड का सुपरस्टार बना. पहलवानी करता था इसलिए नाम के साथ दादा जुड़ गया. अमीरी ऐसी, जुहू में 25 कमरों का बंगला और हफ्ते के सात दिनों के लिए 7 कारें. लेकिन 88 साल की उम्र में मुफलिसी में दुनिया को कहा अलविदा.

कभी जुहू में था 25 कमरों वाला बंगला, हफ्ते के सात दिनों के लिए रखीं थी 7 आलीशान कारें, 24 साल पहले मुफलिसी में मुंबई की चॉल में तोड़ा दम
कभी था मुंबई की सिनेमा की दुनिया का बेताज बादशाह, फिर मुफलिसी में तोड़ा दम
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नई दिल्ली:

सिनेमा के सितारों की जिंदगी भी किसी चौंका देने वाली फिल्म से कम नहीं होती है. कभी आसमान को छूना तो कभी धम्म से जमीन पर आ जाना. हर शुक्रवार के साथ हर सितारे की तकदीर बदल जाती है. हम यहां एक ऐसे ही सितारे की बात करने जा रहे हैं जिसने जिंदगी में आसमान की बुलंदियों को छुआ तो अपने आखिरी दिनों में मुफलिसी का दौर भी देखा. कभी इसका मुंबई के जुहू में सी फेसिंग 25 कमरों वाला बंगला हुआ करता था और इसके पास हफ्ते के सात दिनों के लिए आलीशान 7 कारें भी थीं. लेकिन फिर तकदीर ने ऐसी करवट ली सब बदल गया.

मजदूर से बने हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार

हम बात कर रहे हैं भगवान दादा की. भगवान अभाजी पलाव का जन्म 1 अगस्त 1913 को अमरावती में हुआ था. पिता कपड़ा मिल में मजदूर थे. भगवान भी मजदूरी करते थे, लेकिन फिल्मों का जुनून था. साइलेंट फिल्मों में छोटे-छोटे रोल से शुरुआत की. कुश्ती का शौक होने की वजह से उन्हें 'दादा' कहा जाने लगा. 1930-40 के दशक में उन्होंने कम बजट की एक्शन और स्टंट फिल्में बनाईं, जो मजदूर वर्ग में खासी लोकप्रिय हुईं.

1951 में आई फिल्म अलबेला ने उनकी तकदीर बदल दी. गीता बाली के साथ यह फिल्म सुपरहिट रही. शोला जो भड़के और ओ बेटा जी ओ बाबूजी जैसे गाने आज भी याद किए जाते हैं. भगवान दादा खुद फिल्म के प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और लीड एक्टर थे. अलबेला की सफलता के बाद उनकी तकीदर ही बदल गई. उन्होंने जुहू में 25 कमरों का बंगला खरीदा और सात लग्जरी कारें रख लीं, हर दिन के लिए एक. खुद का जगरिती स्टूडियो भी था.

हाथों से रेत की तरह फिसल गई कामयाबी

सफलता टिक नहीं सकी. इसके बाद बनी फिल्में फ्लॉप होती गईं. भगवान दादा ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'मैं शराबी-कबाबी बन गया. ताश और रेसकोर्स पर जुआ खेलता था. शराब और औरतें मेरी कमजोरी थीं. पत्नी के साथ वफादार नहीं रहा. परिवार की अनदेखी की. शायद भगवान ने मुझे सजा दी. मजदूर से करोड़पति बना और फिर कंगाल हो गया.' फिल्मों के फ्लॉप होने, गलत निवेश और आदतों के कारण सब कुछ हाथ से निकल गया. बंगला बेचना पड़ा, कारें नीलाम हुईं और परिवार दादर की एक कमरे वाली चॉल में शिफ्ट हो गया.

आखिरी सालों में वे छोटे-छोटे रोल करते रहे. उनके अनोखे डांस स्टाइल को बाद में अमिताभ बच्चन और गोविंदा जैसे सितारों ने अपनाया. लेकिन इंडस्ट्री ने उन्हें भुला दिया. ज्यादातर दोस्त दूर हो गए. सिर्फ संगीतकार सी. रामचंद्र, अभिनेता ओम प्रकाश और गीतकार राजेंद्र कृष्ण चॉल में उनसे मिलने आते रहे. लेकिन 24 साल पहले 4 फरवरी 2002 को यही सुपरस्टार दादर की एक छोटी सी चॉल में दिल का दौरा पड़ने से इस दुनिया को अलविदा कह गए. उम्र थी 88 साल. उनकी कहानी सच्चाई दिखाती है कि चमक कितनी भी तेज हो, वक्त के थपेड़े उसे भी धूमिल कर देते हैं.

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