61 साल पुराना गीत ‘ऐ मेरे प्यारे वतन' आज भी सुनते ही दिल को छू जाता है. आमतौर पर इसे देशभक्ति गीत माना जाता है, लेकिन इसकी कहानी थोड़ी अलग है. यह गीत भारत के लिए नहीं, बल्कि अफगानिस्तान से दूर रह रहे एक ऐसे इंसान के दर्द को बयां करता है, जो अपने वतन को याद कर रहा है. 1961 में आई फिल्म ‘काबुलीवाला' रवींद्रनाथ टैगोर की मशहूर कहानी पर बनी थी और इसमें बलराज साहनी ने काबुल से आए रहमत खान का किरदार निभाया था. मन्ना डे की आवाज ने इस किरदार की अपने देश लौटने की तड़प को अमर कर दिया.
रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी पर बनी थी फिल्म
‘काबुलीवाला' 1961 में रिलीज हुई थी और यह रवींद्रनाथ टैगोर की 1892 में लिखी गई मशहूर कहानी पर आधारित थी. फिल्म का निर्देशन हेमेन गुप्ता ने किया था, जबकि बिमल रॉय इसके निर्माता थे. कहानी रहमत नाम के एक अफगान शख्स की है, जो काबुल से कलकत्ता आता है और सूखे मेवे बेचकर अपना गुजारा करता है. यहां उसकी दोस्ती छोटी बच्ची मिनी से हो जाती है, क्योंकि मिनी में उसे अपनी बेटी की झलक दिखाई देती है.
भारत नहीं, अफगानिस्तान के लिए था गीत
‘ऐ मेरे प्यारे वतन' की सबसे खास बात यही है कि इसे भारत माता के लिए लिखा गया देशभक्ति गीत समझ लिया जाता है, जबकि फिल्म के संदर्भ में यह रहमत खान अपने अफगान वतन को याद करते हुए गाता है. गीत के बोलों में अपने देश से दूर होने और वापस उसी मिट्टी में दम तोड़ने की इच्छा दिखाई देती है. यही वजह है कि गाना सुनने पर इसमें देशप्रेम के साथ-साथ परदेस में रहने वाले इंसान की घर लौटने की तड़प भी महसूस होती है. इस गाने को मन्ना डे ने आवाज दी थी. इसके बोल प्रेम धवन ने लिखे थे और संगीत सलिल चौधरी ने दिया था.
बलराज साहनी की एक्टिंग और फिल्म की सफलता
फिल्म में बलराज साहनी ने रहमत खान का किरदार निभाया था, जबकि उषा किरण ने मिनी की मां और बेबी सोनू ने मिनी की भूमिका निभाई थी. सज्जन ने मिनी के पिता का किरदार निभाया. फिल्म की कहानी का भावनात्मक असर काफी हद तक बलराज साहनी की सहज अदाकारी पर टिका था. ‘काबुलीवाला' 1961 की सफल फिल्मों में शामिल रही और उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्मों की सूची में आठवें स्थान पर थी.
उपलब्ध बॉक्स ऑफिस आंकड़ों के मुताबिक फिल्म का नेट कलेक्शन करीब 70 लाख रुपये और ग्रॉस करीब 1.40 करोड़ रुपये रहा. इसे सेमी-हिट का दर्जा दिया गया था. आज भी ‘ऐ मेरे प्यारे वतन' की खासियत यही है कि यह सिर्फ किसी एक देश का गीत नहीं लगता. इसमें अपने वतन, परिवार और अपनी मिट्टी से दूर होने का दर्द है. इसलिए भारत में इसे देशभक्ति गीतों के बीच याद किया जाता है, जबकि फिल्म की कहानी में यह एक अफगान व्यक्ति के अपने वतन के लिए प्रेम और विरह की आवाज है.
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