संगीत की कोई भाषा नहीं होती है. इस बात का सबूत है हिंदी सिनेमा में बनें कई गाने जिनकी धुन को दूसरे देश और दूसरी भाषा के गानों से प्रेरित होकर या उनको इस्तेमाल कर के बनाया गया है. आपके साथ भी ऐसा होता होगा कि, कई गानों के मतलब तो समझ नहीं आते होंगे लेकिन इसका संगीत इतना प्यारा होता है कि ये सुनने में कानों को अच्छे लगते हैं. आज हम आपको बॉलीवुड के एक ऐसे ही सुपरहिट गाने के बारे में बताएंगे जिसकी धुन ने उसको यादगार बना दिया.
साल 1966 में आया एक गाना ऐसा ही थी. इस गाने की खास बात थी इसके पीछे की धुन जो एक नेपाली संगीत की छाप बताई जाती है, जिसे हिंदी सिनेमा के एक म्यूजीशियन ने अपने अंदाज में ढालकर ऐसा गाना तैयार किया कि 60 साल बाद भी ये गाना पुराने गाने पसंद करने वालों की प्लेलिस्ट में अपनी जगह बनाए हुए है. तो चलिए जानते हैं इस गाने के जुड़े अनसुने किस्से के बारे में.
नेपाली धुन से बना बॉलीवुड का गाना
1966 में रिलीज हुई फिल्म 'तीसरी मंजिल' में शम्मी कपूर और आशा पारिख ने लीड रोल निभाया था. इस फिल्म का दाना 'दीवाना मुझसा नहीं' गाना नेपाली गाने की धुन से प्रेरित होकर बनाया गया था. इस गाने के बोल मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे. इसका संगीत आर.डी. बर्मन ने तैयार किया था और इसे मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज से इसे ऐसा रंग दिया कि ये गाना अपनी एक अलग पहचान बना गया. दीवाना मुझसा नहीं गाने की धुन नेपाली लोक गीत "ए कान्छा मलाई सुनको तारा खसाईदेउन" से प्रेरित थी, जिसे अरुणा लामा और अंरुद्र मणि गुरुंग ने गाया है. इसका संगीत अम्बर गुरुंग ने तैयार किया था और बोल थे पासांग बांगबाल के. इस नेपाली धुन से प्रेरित होकर आर.डी बर्मन ने इसे फिल्म तीसरी मंजिल में लिया और इसी के संगीत ने उनकी अलग पहचान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. लता मंगेशकर पर लिखी 'लता सुरगाथा' के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाले मशहूर लेखक और गीतकार यतींद्र मिश्र ने इस गाने से जुड़ा
" फिल्म तीसरी मंजिल 1966 में आई जिसे उन्होंने अपना मुहावरा विकसित किया. एक ऐसी फिल्म जिसके बाद आर डी बर्मन की पहचान बनी इस फिल्म में जज आर्केस्ट्रेशन पर आधारित धुने बनाई गयी. लेकिन जिस गीत की मैं चर्चा कर रहा हूँ वो नेपाली धुन से प्रभावित थी. नेपाल का एक बेहद प्रसिद्ध गीत है. एक कछा म सुन को तारा आप सुन रहे हैं इसे अरुणा लामा और अम्बर गुरुंग की आवाज में इसके कई वर्जन मिलते हैं."
"यह सदाबहार गीत आर. डी. बर्मन की विशिष्ट संगीत पहचान को स्थापित करने में अहम साबित हुआ था. तीसरी मंजिल का संगीत अपने दौर के लिए बेहद आधुनिक और ताजगी भरा माना जाता है, जिसमें जैज आधारित ऑर्केस्ट्रेशन का शानदार इस्तेमाल किया गया था. इस गीत की धुन नेपाल के लोकप्रिय गीत ‘ए कान्छा मलाई सुनको तारा खासै देउना' से प्रेरित थी, जिसे अरुणा लामा और अंबर गुरुंग ने लोकप्रिय बनाया था और जिसके कई संस्करण मौजूद थे. गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने इसी धुन को हिंदी शब्दों में ढालकर इसे फिल्म के हिसाब का बना दिया. इस गाने को बनाने में कीबोर्ड, सैक्सोफोन, बोंगो, पियानो और वायलिन जैसे इंस्टूमेंट से सजे इस गीत का संगीत बेहद ऊर्जावान है, वहीं मोहम्मद रफी की आवाज इसमें जोश और उमंग तक पहुंचाती है."
शम्मी कपूर की मस्ती और रफी की आवाज
फिल्म तीसरी मंजिल का गाना 'दीवाना मुझसा नहीं' को मोहम्मद रफी ने गाया था. इस गाने को शम्मी कपूर पर फिल्माया गया. फिल्म में शम्मी कपूर ने रॉकी का किरदार निभाया था और आशा पारिख ने सुनीता नाम की लड़की का किरदार निभाया था. फिल्म का निर्देशन विजय आनंद ने किया था और कहानी नासिर हुसैन की थी. फिल्म का कहानी एक म्यूजिकल मिस्ट्री थ्रिलर थी. जिसमें सुनीता अपनी बहन रुपा की मौत का सच पता करने के लिए मसूरी जाती है. उसे शक होता है कि नाइटक्लब ड्रमर रॉकी इस मामले से जुड़ा है.
गाने में था जैज वाला अंदाज
'तीसरी मंजिल' का संगीत अपने दौर के मुकाबले काफी अलग और एडवांस था. इस गाने में जैज और पश्चिमी संगीत से प्रभावित ऑर्केस्ट्रेशन सुनाई देता है. इस गाने में कीबोर्ड, सेक्सोफोन, बोंगो, पियानो और वॉयलिन जैसे इंस्ट्रूमेंट्स का भी इस्तेमाल किया गया. जो इसे बाकी रोमांटिक गीतों से अलग बनाती है. फिल्म के एल्बम में कुल आठ ट्रैक थे. आज भी 'दीवाना मुझसा नहीं' आर.डी. बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी और मोहम्मद रफी की उस जुगलबंदी की याद दिलाता है, जिसने 'तीसरी मंजिल' के म्यूजिक को हिंदी सिनेमा के यादगार फिल्म एल्बमों में जगह दिलाई.
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