लता मंगेशकर बॉलीवुड की जानी मानी सिंगर हैं, जिनकी 97वीं जयंती पर फैंस उन्हें याद कर रहे हैं. पीएम मोदी और देश के मुख्यमंत्रियों द्वारा स्वर कोकिला को श्रद्धांजलि दी गई. जबकि सोशल मीडिया पर फैंस और बॉलीवुड सेलेब्स रिएक्शन देते हुए नजर आ रहे हैं. इन सबके बीच आपको लता मंगेशकर का 60 साल पुराना गाना जरुर सुनने को मिलेगा, जो किसी के ना रहने का गम बयां करता है. खास बात यह है कि जिस फिल्म में यह गाना आया इसमें सुचित्रा सेन ने जहां मां और बेटी का डबल रोल निभाया तो वहीं धर्मेंद्र और अशोक कुमार भी नजर आए. वहीं यह गाना सदाबहर सॉन्ग्स की लिस्ट में शुमार हो गया.
लता मंगेशकर का सदाबहार गाना
हम बात कर रहे हैं लता मंगेशकर के 1966 में आई ममता फिल्म के गाने रहें ना रहें हम की, जो असित सेन द्वारा निर्देशित फिल्म 'ममता', उनकी ही पिछली बंगाली फिल्म 'उत्तर फाल्गुनी' (1963) का हिंदी रीमेक है. बेहतरीन कलाकारों से सजी यह फिल्म शानदार संगीत के साथ भावुक कहानी कहने का एक बेहतरीन उदाहरण है. महान संगीतकार रोशन द्वारा रचित और मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा लिखे गए इस फिल्म के संगीत का सबसे यादगार गाना है 'रहें ना रहें हम', जिसे लता मंगेशकर की जादुई आवाज ने अमर बना दिया. राग खमाज पर आधारित और झिंझोटी राग की हल्की झलक वाली यह धुन कहरवा ताल पर खूबसूरती से आगे बढ़ती है, जिसमें कांगो बीट्स, कई लेयर्स में बजते वायलिन और कबासा/मराकास का हल्का इस्तेमाल इसे और भी समृद्ध बनाता है.
रहें ना रहें हम के बोल-
रहें ना रहें हम, महका करेंगे
बनके कली, बनके सबा बाग़-ए-वफ़ा में
रहें ना रहें हम
मौसम कोई हो, इस चमन में
रंग बनके रहेंगे हम फिजा में
चाहत की खुशबू यूं ही ज़ुल्फों से
उड़ेगी खिजां हो या बहारें
यूं ही झूमते
यूं ही झूमते और खिलते रहेंगे
बनके कली, बनके सबा बाग-ए-वफा में
रहें ना रहें हम, महका करेंगे
बनके कली, बनके सबा बाग-ए-वफा में
सुचित्रा सेन का डबल रोल
लता मंगेशकर पर लिखी 'लता सुरगाथा' के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाले मशहूर लेखक और गीतकार यतींद्र मिश्र ने इस गाने के बारे में कहा, इस संगीत शैली का संबंध एस. डी. बर्मन की फिल्म 'नौजवान' (1951) के गाने 'ठंडी हवाएं' से जोड़ा जा सकता है और इसी गाने के भाव से प्रेरित होकर आर. डी. बर्मन ने बाद में फिल्म 'सागर' (1985) के लिए 'सागर किनारे दिल ये पुकारे' जैसा गाना बनाया. फिल्म में सुचित्रा सेन ने माँ और बेटी दोनों की भूमिकाओं में बहुत ही बारीकी से अभिनय किया है और हर किरदार को एक अलग भावनात्मक गरिमा दी है. उनका अभिनय और भी प्रभावशाली इसलिए लगता है क्योंकि वे दो बिल्कुल अलग उम्र के मुख्य अभिनेताओं - अशोक कुमार (जो उनसे काफी बड़े थे) और धर्मेंद्र (जो उनसे काफी छोटे थे) के साथ स्क्रीन शेयर करती हैं. दोनों अभिनेताओं ने स्वाभाविक अभिनय से उनके काम को बखूबी पूरा किया है.
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