हिंदी सिनेमा में कुछ गाने ऐसे हैं, जिन्हें सुनते ही एक दौर, एक चेहरा और कई भावनाएं आंखों के सामने आ जाती हैं. 1982 में आई फिल्म ‘बाजार' का ‘दिखाई दिए यूं कि बेखुद किया' भी ऐसा ही सदाबहार गीत है. मीर तकी मीर की 18वीं सदी की मशहूर गजल के अशआर को खय्याम ने अपनी धुन में ढाला और लता मंगेशकर की आवाज ने इसे अमर कर दिया. फिल्म में स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, फारुख शेख और सुप्रिया पाठक जैसे कलाकार थे. रिलीज के 44 साल बाद भी यह गीत अपनी सादगी, शायरी और संगीत की वजह से श्रोताओं के बीच खास जगह बनाए हुए है.
मीर तकी मीर की शायरी को खय्याम ने दी नई धुन
‘दिखाई दिए यूं कि बेखुद किया' की सबसे बड़ी खासियत इसकी शायरी है. इसके बोल उर्दू के महान शायर मीर तकी मीर की रचना से लिए गए हैं. मीर की यह गजल इश्क, जुदाई और अपने ही वजूद से दूर हो जाने जैसे भावों को बेहद खूबसूरती से सामने रखती है. इसी गजल के अलग-अलग अशआर में प्रेम और विरह की गहराई दिखाई देती है.
फिल्म ‘बाजार' के लिए संगीतकार खय्याम ने मीर की शायरी को अपनी धुन में ढाला. खास बात यह है कि उन्होंने शायरी की गंभीरता को बरकरार रखते हुए संगीत को बहुत ज्यादा भारी नहीं बनाया. लता मंगेशकर की आवाज ने इस रचना को और नर्म और भावुक बना दिया. फिल्म के साउंडट्रैक में इस गीत के गीतकार के तौर पर मीर तकी मीर और गायिका के तौर पर लता मंगेशकर का नाम दर्ज है.
स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह की मौजूदगी ने बढ़ाया असर
यह गीत 1982 की फिल्म ‘बाजार' का हिस्सा था, जिसका निर्देशन सागर सरहदी ने किया था. फिल्म में फारुख शेख, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह और सुप्रिया पाठक प्रमुख भूमिकाओं में थे. कहानी हैदराबाद की पृष्ठभूमि में रखी गई थी और इसमें दहेज तथा खाड़ी देशों में रहने वाले अमीर भारतीयों से जुड़ी सामाजिक समस्या के जरिए लड़कियों की शादी और उनके शोषण जैसे गंभीर मुद्दे को उठाया गया था.
गीत में भी फिल्म के किरदारों की भावनात्मक दुनिया की झलक मिलती है. इसकी प्रस्तुति में स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख जैसे कलाकार नजर आते हैं. वहीं उपलब्ध क्रेडिट के मुताबिक फिल्म में इसे सुप्रिया पाठक के किरदार से भी जोड़ा गया है.
44 साल बाद भी क्यों नहीं पुराना हुआ यह गीत?
‘बाजार' 21 मई 1982 को भारत में रिलीज हुई थी. फिल्म का संगीत खय्याम ने दिया था और इसके साउंडट्रैक में मीर तकी मीर के अलावा मिर्जा शौक, मखदूम मोहिउद्दीन और बशर नवाज जैसे शायरों की रचनाओं को भी जगह मिली थी. ‘फिर छिड़ी रात' और ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी' जैसे गीत भी इसी फिल्म का हिस्सा थे.
‘दिखाई दिए यूँ कि बेखुद किया' की खासियत यह है कि इसमें उस दौर की शायरी, खय्याम का संगीत और लता मंगेशकर की आवाज एक साथ मिलती है. यही वजह है कि चार दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी यह गीत पुराने दौर की सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि उर्दू शायरी और हिंदी फिल्म संगीत के खूबसूरत मेल का उदाहरण बना हुआ है.
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