आज भी आर्थिक एजेंडे पर प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी को एक बात के लिए याद किया जाता है, वह है भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण। ये उस वक्त का एक अहम फैसला था कि आज देश में कई प्रतिष्ठित बैंक सार्वजनिक क्षेत्र से हैं। लेकिन बीते कई सालों से इन बैंकों के एनपीए पर सवाल उठ रहे हैं।
अब मौजूदा आरबीआई गवर्नर ने इन बैंकों को मार्च, 2017 तक का समय दिया है कि वे अपनी बैलेंस शीट को दुरुस्त कर उन डूबे कर्जों का भी बंदोबस्त करें, जिनकी वापसी की अब कोई गुंजाइश नहीं दिखती। सरकारी बैंकों का एनपीए एक अरसे से उनके गले की हड्डी की तरह रहा है, जो कई बार सरकारों के लोकप्रिय फ़ैसलों की वजह से उठाना पड़ा तो कई बार इसके पीछे राजनीतिक दबाव भी रहे हैं।
जब एनपीए की बात आती है तो पिछले एक दशक के कांग्रेस सरकार की भी जवाबदेही बनती है। आखिरकार इन बैंकों में बड़े तौर पर हमारा और आपका पैसा होता है और अलग-अलग स्तर पर इनको अधिकार होता है इस पैसे से कर्ज़ देने का। आज जब ये साबित हो रहा है कि उनमें से एक बहुत बड़ी रकम के वापस आने की गुंजाइश नहीं है, तो सवाल एक बार फिर सिस्टम का है, लेकिन ये बड़ी चिंता की बात है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मंदी का हवाला देनी वाली सरकारों के क्या राष्ट्रीय बैंक खुद कमजोर होते जा रहे हैं।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक उन सार्वजनिक बैंकों का जिनके शेयर बाज़ार में खरीदे-बेचे जाते हैं, दिसंबर तिमाही तक उनका डूबा कर्ज़ एक हजार अरब पहुंच चुका है और ऐसे बैंकों के स्टॉक में 29 फीसदी तक गिरावट आई है।
(अभिज्ञान प्रकाश एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर हैं)
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This Article is From Feb 15, 2016
बैंकों के डूबते कर्ज के लिए जिम्मेदार कौन?
Abhigyan Prakash
- ब्लॉग,
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Updated:फ़रवरी 15, 2016 21:13 pm IST
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Published On फ़रवरी 15, 2016 21:10 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 15, 2016 21:13 pm IST
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