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This Article is From Jan 12, 2015

शुरू हो गया दिल्ली का दंगल

Ravish Kumar, Saad Bin Omer
  • Blogs,
  • Updated:
    जनवरी 12, 2015 22:50 pm IST
    • Published On जनवरी 12, 2015 21:10 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 12, 2015 22:50 pm IST

नमस्कार... मैं रवीश कुमार। दिल्ली में चुनावी राजनीति पिछले एक साल से रोज़ हो रही है बस वोट 7 फरवरी को पड़ेगा और रिज़ल्ट 10 को आ जाएगा। क्वेश्चन एकदम आसान है कि कौन जीतेगा। ट्विटर-फेसबुक पर ट्रेंड कराकर हर घंटे आप बनाम भाजपा का गेस पेपर आउट हो रहा है। बाकी जो टफ क्वेश्चन हैं, उन्हें लास्ट में या सबसे लास्ट में अटेंप्ट करने के लिए छोड़ दिया जा रहा है। यह हाल दिल्ली का है तो बाकी देश में क्या होता है आप अंदाज़ा कर सकते हैं।

रामलीला मैदान ने दिल्ली की राजनीति को न सिर्फ बदला, बल्कि राजनीति में कुछ नए सवाल खड़े कर दिए। याद कीजिए तब कितनी उत्तेजना थी भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए। लोकपाल अभी नहीं तो अब लाओ का नारा लगता था। हर दल के लोग आकर समर्थन जताते थे। मिडिल क्लास अपने गालों पर तिरंगा रंग कर आता था।

मगर लोकपाल पर अब भयंकर सन्नाटा है। शनिवार को बीजेपी की रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार से मुक्ति का अभियान मैं जहां बैठता हूं वहीं से शुरू किया है। और धीरे धीरे इसे गली मोहल्ले तक लाने वाला हूं। जबकि इस रामलीला ने यह कहा था कि नीचे से लेकर ऊपर तक का भ्रष्टाचार लोकपाल साधेगा। ये लोकपाल प्रधानमंत्री पर भी नज़र रखेगा।

लोकपाल को लेकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की तरफ से कोई सक्रिय संघर्ष नहीं है। दो साल तक दिल्ली कभी पुलिस सुधार तो कभी व्यवस्था में बदलाव के सवालों के सहारे लोकपाल लोकपाल जपा करती थी।

हम क्यों नहीं पूछते कि जिस लोकपाल ने इतना भूचाल पैदा किया, उसे लेकर अब वैसा जनदबाव क्यों नहीं है। काले धन को लेकर रामलीला मैदान में पैदा हुई तमाम बेसब्रियां कानून की जटिलताओं की सैरगाह में खो गई हैं।

लोकपाल को लेकर न तो कोई नायक है, न खलनायक। लोकपाल के समर्थन में आये ये लोग खुद को ब्लैक एंड व्हाईट फ्रेम में एक्स फ्रीडम फाइटर के रूप में सोचा करते होंगे।

यही वह टफ क्वेश्चन है जिसे सबने लास्ट के लिए छोड़ रखा है। हर पक्ष दो-चार कमियां और खूबियां गिनाकर बहस जीत ले रहा है। गलतियों और गलतफहमियों का जनधन खाता तो सबके हिस्से में खुला हुआ है, लेकिन वोट देने वाला इस बार किन सवालों को लेकर इस बार दिल्ली के मतदान केंद्रों पर जाएगा।

सत्ता ने दिल्ली के राजनीतिक दलों को क्रिएटिव यानी रचनात्मक बना दिया है। दिल्ली की जनता इसका नमूना रोज़ नए-नए नारों से सजे बड़े-बड़े होर्डिंग देखती ही होगी। जाम में फंसी लाखों कारों में बैठे लोग एफएम रेडियो पर तरह तरह के जिंगलों को सुनते हुए 21वीं सदी के भारत की राजधानी के महान मतदाता बनने का फोकट में प्रशिक्षण पा रहे हैं।

एक रेडियो विज्ञापन में अरविंद केजरीवाल एको साउंड यानी अनुगूंज के सहारे आह्वान करते हुए किसी बुजुर्ग महिला को आश्वस्त कर रहे हैं कि माता जी ग़लती हो गई मगर हम कहीं गए नहीं थे। मैं आ रहा हूं आपकी सेवा के लिए। वहीं बीजेपी के विज्ञापन में दो दोस्त सुन न, सुना न टाइप की बातें करते हुए आम आदमी पार्टी को नौटंकीबाज़ बता रहे हैं कि यार इस बार तो बिल्कुल नहीं।

दिल्ली में पूर्वांचल और उत्तराखंड के नाम पर संगठन बनाकर वजूद तलाश रहे नेताओं को अब हर दल में ठौर मिल गया है। टिकट तो टिकट अब विज्ञापन भी लोगों की कैटगरी के हिसाब से बन रहा है। बीजेपी के एक रेडियो विज्ञापन में बिहारी टाइप भोजपुरी हिन्दी का प्रयोग हुआ है। जात-पात की तरह पूर्वांचल दिल्ली की राजनीति का वोटबैंक है, जो इसका क्षेत्रीयकरण करने में लगा है। वहीं कांग्रेस, बीजेपी और आम आदमी पार्टी की खिंचाई करते हुए इस लड़ाई में तीसरा कोण बनने का प्रयास कर रही है।

दिल्ली में इस बार यहां के लोग नोटिस कर रहे होंगे कि कैसे विज्ञापनों-होर्डिंग्स में कांग्रेस ने वापसी की है। साल भर पहले मैदान से गायब होर्डिंग के ज़रिये कांग्रेस की वापसी कुछ चौकाती तो है। कांग्रेस के नारे हैं विकास की डोर कहीं छूट न जाए। हम भाईचारे की राजनीति करते हैं, सांप्रदायिकता की नहीं। कई जगहों पर यह नारा लिखा है कि इस बार सोच समझ कर वोट देना। किसी के बहकावे में मत आना। जैसे 15 साल तक कांग्रेस को चुनने वाली जनता को किसी ने बहका लिया था। उसने बिना सोचे समझे कांग्रेस को तीसरे नंबर पर पहुंचा दिया।

अब नेता की जगह स्लोगन लिखने वाले स्क्रिप्ट राइटर चुनाव लड़ेंगे तो यही सब देखने सुनने को मिलेगा। होर्डिंग पर बीजेपी भले आगे चल रही हो लेकिन आप और कांग्रेस भी बहुत पीछे नहीं है।

लोकपाल के समय देश की नज़र दिल्ली पर थी लेकिन अब दिल्ली की नज़र कहां है, ख़ुद दिल्ली को भी नहीं पता। संदर्भ के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा और नज़फगढ़ में अरविंद केजरीवाल की सभा के कुछ बयान ले लेते हैं।

दिल्ली में पचास लाख से भी ज्यादा लोग झुग्गी झोपड़ियों में रहते हैं। कुछ कालोनियों की हालत तो झुग्गियों से भी बदतर है। कभी इन कालोनियों में जाकर देखियेगा और इनकी बदतर और अमानवीय हालत को लेकर सवाल कीजिएगा। और उस दावे पर भरोसा भी कि अब सात साल के भीतर यानी 2022 तक सभी दिल्ली वालों के लिए पक्के मकान बन जाएंगे। हिन्दुस्तान देश में पुनर्वास का ऐसा शानदार रिकॉर्ड अभी तक किसी भी राज्य और किसी भी दल की सरकार में नहीं बना है। अवैध कालोनियों को रेगुलर करने की राजनीति दिल्ली की राजनीति का एक और दुखद पहलू है, जिसे लेकर हर चुनाव में सुखद सपना दिखाया जाता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि मोदी पीठ में छुरा घोंपने वाला नहीं है। उन्होंने काम की सीमा को भी नए सिरे से परिभाषित कर दिया और कहा कि जिसको गाड़ी चलाना आता है उसको खाना पकाना दे सकते हैं क्या। गाड़ी चलाने वाले को गाड़ी का काम दिया तो अच्छा करेगा ना। इसलिए जिनको फुटपाथ पर बैठ कर रास्ते रोकने में मास्टरी है, धरने करने की मास्टरी है, आए दिन आंदोलन करने की मास्टरी है, उनको वो काम दीजिए। वैसे बहुत से गाड़ी चलाने वाले ज़रूर अच्छा खाना भी बनाते होंगे।

केजरीवाल केंद्र में बीजेपी के सात महीने के मुकाबले अपने 49 दिनों के काम को गिनाने लगे हैं। उत्साह के लिहाज़ से तो ठीक है मगर क्या वाकई ये पैमाना सहीं है। नज़फगढ़ में अरविंद ने कहा कि बीजेपी अपने हर वादे से पलट गई। लोगों ने तो कहना चालू कर दिया कि ये यू-टर्न सरकार है। जो कहती है उसका उल्टा करती है। पूरी दिल्ली में पिछले चुनावों में इन्होंने होर्डिंग लगाए थे जी कि 30% दाम कम करेंगे बिजली के। क्या कम हुए, उल्टा 2 बार बिजली के दाम बढा दिए। 15% और बढा दिए, कम एक पैसा नहीं किया। जो कहा उसका उल्टा किया। अरविंद ने कैंसर और अन्य दवाओं के दाम बढ़ाये जाने का मुद्दा भी उठाया।

लोकपाल के लिए मूड न करता हो तो दिल्ली की जनता को पूर्ण राज्य को लेकर सड़कों पर आ जाना चाहिए। बनाने के लिए नहीं बल्कि सभी दलों से हाथ जोड़कर कहने के लिए कि अब बस। पूर्ण राज्य के नाम पर पकाओ मत। कम से कम एक इश्यू पर ठगे जाने का अफसोस तो नहीं होगा। ऐसा कोई सगा नहीं जिसने इस मुद्दे पर दिल्ली को ठगा नहीं। तो आप क्या सुन कर, क्या सोच कर वोट करने जा रहे हैं। सवाल आप तय करेंगे या स्लोगन लिखने वाले स्क्रीप्ट राइटर?

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