विज्ञापन
This Article is From Jan 18, 2015

रवीश कुमार : तो 2039 तक हारेगी ही नहीं बीजेपी

Ravish Kumar, Saad Bin Omer
  • Blogs,
  • Updated:
    जनवरी 18, 2015 23:16 pm IST
    • Published On जनवरी 18, 2015 22:24 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 18, 2015 23:16 pm IST

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली में बूथ कार्यकर्ताओं से कहा है कि हमारा काम है चुनाव जीतने का एक ऐसा सिस्टम बनाने का, जिससे अगले 25 साल तक सिर्फ बीजेपी ही जीते। दिल्ली के चुनावों में इस मेकेनिज्म का प्रयोग होगा। अगर हम यहां सफल रहें, तो यही तरीका बिहार में भी अपनाएंगे।

आखिर वह कौन सा सिस्टम होगा, जिसका प्रयोग बीजेपी अध्यक्ष दिल्ली के चुनावों में करने जा रहे हैं और जिसके सफल होने पर अगले 25 वर्षों तक चुनाव जीतते ही जाएंगे। इन बयानों से यह स्पष्ट है कि बीजेपी के लिए दिल्ली का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है। वह इस चुनाव को हारना नहीं चाहती, बल्कि हर कीमत पर जीतने के लिए उतरी है।

इस आत्मविश्वास का एक नमूना तो इस बात में है कि चुनाव के तीन हफ्ते पहले पार्टी बाहर से अपने लिए एक चेहरा लाती है और विरोधियों को चौंका देती है। यह सिर्फ हवा पर भरोसे के दम पर नहीं किया गया होगा। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अपने उम्मीदवार तक घोषित कर दिए हैं, लेकिन यह लेख लिखे जाने तक बीजेपी के उम्मीदवारों का पता भी नहीं।

हालांकि बीजेपी ने सिर्फ एक चेहरे के दम पर दावा कर दिया कि दिल्ली में वह कोई ऐसा प्रयोग करने जा रही है, जो सफल हुआ तो 25 साल तक कोई उसे हरा ही नहीं पाएगा। 19 जनवरी यानी सोमवार के दिन बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक होनी है, जिसमें टिकट का एलान होने की संभावना है।

पिछले बीस साल की राजनीति में संगठन की भूमिका हर दल में कमज़ोर हुई है। आज की भाजपा से पहले एक ही पार्टी थी, जिसने संगठन को प्राथमिकता दी और वह थी बहुजन समाज पार्टी। इसी ने बूथ मैनेजमेंट को संगठन का सबसे मज़बूत आधार बनाया। बूथ से लेकर ज़िला स्तर के कॉर्डिनेटर बनाए गए, जिनकी पूछ पार्टी में विधायक और सांसद से भी ज्यादा होती थी। लेकिन 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद मायावती का यह मज़बूत किला कमज़ोर पड़ने लगा और अब तो यह बिखर ही गया है, जिसे मायावती फिर से समेटने की कवायद में जुटी हैं।

बसपा के बूथ मैनजमेंट का ज़िक्र इसलिए किया, क्योंकि इसी की तर्ज पर कांग्रेस ने भी अपने यहां कॉर्डिनेटर सिस्टम लागू किया, मगर ज्यादा कामयाब नहीं हुआ। बसपा ने हर बूथ के लिए बस्ता प्रभारी बनाया। बस्ते में हर बूथ के मतदाता की एक एक जानकारी रखी गई। बीजेपी में भी इसी तरह का पन्ना प्रभारी बनाया गया है। जब तक बसपा का यह गढ़ मज़बूत था, तब तक उसे ढहाना मुश्किल होता था, लेकिन बीजेपी इस मामले में बसपा से बेहतर हो गई है।

इसीलिए दिल्ली चुनाव का जिम्मा अपने हाथ में लेने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष ने बूथ वर्करों को संबोधित किया और उन्हें जोश से भर दिया। लेकिन क्या सिर्फ बूथ मैनेजमेंट ही सत्ता पाने का वह अचूक मंत्र है, जिसके सहारे बीजेपी कभी हारेगी ही नहीं।

अमित शाह ने अपनी सरकार के कार्यक्रमों की कामयाबी का भी ज़िक्र किया, लेकिन वह जानते हैं कि ज़मीन पर चुनाव सिर्फ प्रचार और प्रोपेगैंडा से नहीं जीता जाता। उसे जीत में बदलने के लिए बूथ वर्कर चाहिए। इसीलिए वह बूथ वर्कर को बता रहे हैं कि कैसे गली में निकलते ही चाचा प्रणाम, ताई नमस्कार करते चलना है।

तो क्या बीजेपी को ज़मीन पर आम आदमी पार्टी ने टक्कर दे दी है। दो साल पुरानी पार्टी को हराने के लिए बीजेपी इतना सब कुछ दांव पर क्यों लगा रही है? चुनाव जीतना हर दल का अधिकार और मुख्य काम है, लेकिन एक ऐसे राज्य के लिए जिसकी पूर्णता की मांग ही होती रहती है, बीजेपी इतना बड़ा दांव क्यों खेल रही है?

राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और दूसरी जगह से लाई गईं किरण बेदी, यह सब देखकर कोई कह सकता है कि बीजेपी घबरा गई है। लेकिन बीजेपी ने हार मानने के बाद क्या किया। कांग्रेस की तरह घर नहीं बैठी रही, बल्कि किरण बेदी को लाकर एक और दांव खेल दिया। अब बीजेपी में वह भी सीएम बन सकता है, जो आरएसएस का नहीं होगा। जो सीएम बनने के हफ्ते भर पहले बीजेपी का भी नहीं होगा। हालांकि यह एक दोहरा जोखिम है। हारने पर हार की मार दोहरी हो सकती है, लेकिन बीजेपी ने रिस्क लिया।

शायद यही खूबी आज की राजनीति में बीजेपी को जीतने वाली टीम बना रही है। सवाल पूर्ण बहुमत या बहुमत से दूर रह जाने का नहीं, सवाल है जीतने के उस लक्ष्य को हासिल करते रहने के जुनून का है, जिसे हर पार्टी में होना ही चाहिए। शायद अहंकार की हद तक।

किसी को यह बात अहंकारी लग सकती है कि ऐसी कौन सी मैकेनिज्म बना लेंगे कि 25 साल तक कोई हरा ही नहीं पाएगा। इतिहास जानता है कि बूथ मैनेजमेंट वाली बसपा को समाजवादी पार्टी ने उसके खेल में आसानी से हरा दिया और अखिलेश पूर्ण बहुमत लेकर आ गए। सपा ने बसपा से रिजर्व सीटें भी छिन लीं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी की इस चुनौती को कौन विरोधी दल सबसे पहले स्वीकार करता है।

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी कहा है कि बीजेपी दिल्ली में लैंडमार्क तरीके से जीतेगी। 2019 तक भारत के 29 राज्यों में से 20 राज्य जीतेगी। पता नहीं 9 राज्य किसके लिए प्रकाश जी ने छोड़ दिए हैं और वे कौन से 9 राज्य हैं। क्या पता अमित शाह तुरंत एलान कर दें कि हम 29 के 29 राज्य जीतेंगे। यह आत्म विश्वास है या विश्वास का अति विश्वास इस पर कई तरह से काफी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन सत्ता में आकर भी पार्टी को दौड़ाए रखने का चलन नया-नया सा लगता है।

अमित शाह ने पार्टी को जीतने की मशीनरी में बदल दिया है। इस मशीन में कोई भी जीताने वाला आ सकता है। आज बीजेपी के जीते हुए सांसदों में सौ से ज्यादा पूर्व कांग्रेसी बताए जाते हैं। शाज़िया इल्मी, बिन्नी को भी पार्टी एक घटना की तरह शामिल कराती है।

राजनीति में यह तो पहले भी हुआ है लेकिन बीजेपी में यह सब आया राम गया राम की रणनीति के तहत नहीं हो रहा है। वह भीड़ नहीं जुटा रही है, बल्कि जो लोग किसी को हरा सकते हैं या जिसके आने से कोई कमज़ोर हो सकता है, बीजेपी में उसका स्वागत है।

बीजेपी लगातार अपने लक्ष्यों को बड़ा करती जा रही है, विरोधी अभी तक लक्ष्य ही नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं। अब सवाल उठता है कि क्या वाकई देश में सिर्फ भाजपा ही भाजपा होगी। अगर अमित शाह ने चुनाव जीतने की ऐसी मशीनरी बना दी तो उन्हें पेटेंट तो मिलना ही चाहिए।

दिल्ली का चुनाव कोई ऐसा वैसा नहीं है। बीजेपी के लिए 25 साल तक लोकतंत्र की कक्षा में चक्कर लगाने वाले राकेट के प्रक्षेपण का लॉन्चिंग पैड है। दिल्ली के चुनाव पर नज़र रखिये, ऐसी कोई मशीन बनने वाली है।

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
बीजेपी, अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, चुनावी रणनीति, दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015, विधानसभा चुनाव 2015, BJP, Amit Shah, Election Strategy, Delhi Assembly Polls 2015, Assembly Polls 2015