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This Article is From Jan 06, 2015

फिर मंडरा रहा वैश्विक मंदी का ख़तरा?

Ravish Kumar, Saad Bin Omer
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  • Updated:
    जनवरी 06, 2015 21:43 pm IST
    • Published On जनवरी 06, 2015 21:10 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 06, 2015 21:43 pm IST

नमस्कार... मैं रवीश कुमार। दुनिया के बाज़ार में कच्चे तेल के दाम में गिरावट से खुशख़बरी के बाद अब शीतलहरी आने लगी है। बाज़ार को अब यह डर सताने लगा है कि तेल के दाम गिरते गिरते कहीं गर्त में न चला जाए। इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा है।

निवेशक अब इस बात को लेकर परेशान होने लगे हैं कि कच्चे तेल को दामों की गिरावट एक हद के बाद सही है या नहीं। कहीं इसका यह मतलब तो नहीं कि दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर से कमज़ोरी की चपेट में आ गई है। तो इसका असर आज भारत के सेंसेक्स और निफ्टी पर भी देखा गया।

एक वक्त तो सेंसेक्स 900 अंकों से नीचे आ गया था लेकिन राहत की बात ये रही है कि आखिर में 855 अंक नीचे गिरकर बंद हुआ। पिछले सात सालों में एक दिन में यह तीसरी बड़ी गिरावट है।

निवेशकों ने ग्लोबल संकट के डर से पैसा निकालना शुरू कर दिया। अमरीका में तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ गई। अप्रैल 2009 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है। जब दाम गिर रहे थे तब सब बमबम करने लगे थे, अब अचानक पेट्रोल और डीज़ल के दामों में आ रही गिरावट को अर्थव्यवस्था में संकट के एक सूचक के रूप में देखा जाने लगा है।

सरकार ने तो कुछ ऐसा नहीं किया लेकिन बाज़ार की अपनी ही सरकार होती है। सरकार तो आक्रामक उदारीकरण और निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है और विरोध की राजनीति को विकास विरोधी बता रही है।

मगर भारत में आज ऐसी हड़ताल हुई है जिसे 1977 के बाद किसी भी औद्योगिक सेक्टर में ये सबसे बड़ी कार्रवाई बताई जा रही है। पांच दिनों की इस हड़ताल के कारण आज कोल इंडिया की तमाम खदानों में कोई काम नहीं हुआ।

भारत में रोज़ डेढ़ लाख मीट्रिक टन कोयले का उत्पादन होता है। देश में बिजली 60 फीसदी उत्पादन कोयले से ही होता है। इसका असर बिजली की सप्लाई पर पड़ सकता है लेकिन सरकार इसे लेकर इस वक्त चिंतित नहीं है।

लाखों खान मज़दूर और कोल इंडिया के कर्मचारियों का कहना है कि वे कोल इंडिया के विनिवेश के खिलाफ हैं। सरकार कोल इंडिया को बर्बाद कर देना चाहती है। निजीकरण के ज़रिए कोयला खदानों को उद्योगपतियों को बेचा जा रहा है।

ये लोग चाहते हैं कि सरकार 27 दिसंबर के अपने अध्यादेश को वापस ले ले। चाहते हैं पर ऐसा होगा नहीं, क्योंकि सरकार अपने इन कदमों को साहसिक फैसलों के तर्ज पर पेश कर रही है। अरुण जेटली ने सोमवार को बरखा दत्त से कहा कि पिछले सात महीनों में अपने सुधार के कई कदम उठाए हैं जो काफी मुश्किल थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोयला खदानों की निलामी होनी चाहिए तो हम तुरंत कानून ले आए ताकि नीलामी में देरी न हो और बिजली उत्पादन पर असर भी न पड़े। 2006 से 14 के बीच यह सेक्टर काफी पीछे गया है। इसलिए हमने अर्थव्यवस्था के हित में यह फैसला किया है। और कोयला इंडिया और खान मज़दूर चाहते हैं कि सरकार अपने इस फैसले को बदल ले। तभी मैंने कहा कि ऐसा होना मुश्किल है तब भी जब इस हड़ताल में आरएसएस समर्थक भारतीय मज़दूर संघ भी शामिल है। तब भी जब इसमें कांग्रेस समर्थक इंटक शामिल है और तब भी जब इसमें लेफ्ट समर्थक सीटू शामिल हैं। इनके अलावा दो अन्य संगठन भी हड़ताल में हिस्सा ले रहे हैं।

इसके बावजूद इस हड़ताल के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। मिडिल क्लास मिडिल क्लास का जाप करने वाली राजनीति में मज़दूर और किसान संगठनों के लिए कितनी जगह बची है यह वे बेहतर जानते होंगे, लेकिन श्रम कानूनों में सुधार, बीमा और रक्षा में विदेशी निवेश बढ़ाने के बाद भी सरकार को इस तरह के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।

क्या मज़दूर संगठन वाकई कोई ठोस राजनीतिक विरोध खड़ा कर पाएंगे या ये हड़ताल भी खानापूर्ति ही है, क्योंकि खदानों का फिर से राष्ट्रीयकरण होगा, निजिकरण का फैसला वापस होगा ऐसा लगता नहीं है।

केंद्र सरकार का कहना है कि मज़दूर संघों को दो-दो बार बैठक के लिए बुलाया लेकिन नहीं आए। वैसे मंगलवार शाम की बैठक के लिए संगठनों में हामी भर दी। यूनियन के लोग कहते हैं कि सरकार ने इतना बड़ा फैसला करने से पहले उनकी राय नहीं ली। कोल इंडिया प्रबंधन ने हड़ताल वापस लेने की अपील की है और इसे राष्ट्रीय हित के खिलाफ बताया है।

बताया जा रहा है कि हड़ताल शत प्रतिशत सफल है। वेस्टर्न कोलफिल्ड लिमिटेड की सभी 36 खदानों में काम ठप्प है। ये कोल इंडिया की आठ सहायक कंपनियों में से एक है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कोयला खदानों में भी काम बंद है। बिजली मज़दूरों के संगठन ईईएफआई ने भी हड़ताल का समर्थन किया है। कर्मचारियो की संख्या के मामले में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में कोल इंडिया का नंबर भारतीय रेल के बाद आता है। करीब साढ़े पांच लाख कर्मचारी हैं।

यहां आपको बता दें कि पुराने कानून के मुताबिक, खनन की अनुमति सिर्फ सरकारी कंपनियों को ही हुआ करती थी। सरकार बिजली, स्टील और सीमेंट से जुड़ी कंपनियों को लीज पर खदान दे दिए जाते थे।

नए बिल के अनुसार गैर सरकारी कंपनियों को अपने लिए कोयला निकालने और बेचने की अनुमति मिल जाएगी। सरकार ने खदानों की तीन श्रेणियां बनाईं हैं। पहली कैटगरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कैंसिल की गईं 204 खदानें हैं। दूसरी 42 खदानें वैसी हैं, जिनमें इस वक्त खनन का काम हो रहा है या होने वाला है। तीसरी कैटगरी में वे 32 खदानें हैं, जिन्हें खास समय के लिए ही दिया गया है।

सरकार ने 204 खदानों के लिए नीलामी का फैसला किया है। नीलामी के अलावा सरकार चाहे तो खुद से किसी को दे भी सकती है। दूसरी और तीसरी कैटगरी के खदानों की नीलामी होगी और दावा किया जा रहा है कि ई ऑक्शन के ज़रिए नीलामी होगी। पांच करोड़ की फीस देनी होगी। लेकिन मजदूर संघों को लगता है कि यह सही नहीं है। सरकार कोल इंडिया को कांट छांट कर छोटा कर रही है। क्या उनका दावा सही है। क्या उनके हड़ताल करने से फैसला पलट जाएगा।

जो भी है इस हड़ताल से निजीकरण और सुधार की बहस में मज़दूरों की आवाज़ को जगह मिल रही है और ये बहुत दिनों बाद हो रहा है। बैंक कर्मचारियों की भी हड़ताल होने वाली थी लेकिन टल गई है।

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