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मोदी सरकार के 12 साल: कैसे पटरी पर आई अर्थव्यवस्था, आज दुनिया कैसे मान रही है लोहा

गौरी द्विवेदी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 09, 2026 00:14 am IST
    • Published On जून 09, 2026 00:00 am IST
    • Last Updated On जून 09, 2026 00:14 am IST
मोदी सरकार के 12 साल: कैसे पटरी पर आई अर्थव्यवस्था, आज दुनिया कैसे मान रही है लोहा

नरेंद्र मोदी सरकार इस हफ्ते अपने कार्यकाल के 12 साल पूरे कर रही है. इस समय सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा भारत का विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होना है. यह केवल अर्थव्यवस्था के आकार का मामला नहीं है, बल्कि इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात इसका स्थिर ढांचा और जिस तरह से इसने औद्योगिक क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की है, वह है. यही बात सबसे अधिक मायने रखती है. 

मोदी सरकार में अर्थव्यवस्था का विकास कितना हुआ

अब तक तय की गई दूरी को भूलना आसान है. इस सरकार के सत्ता में आने से करीब एक साल पहले,अमेरिकी कंपनी मॉर्गन स्टेनली ने भारत को दुनिया की सबसे कमजोर पांच देशों में से एक बताया था. यह दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं का वह क्लब था, जिनकी अस्थिर मुद्राएं और दोहरा घाटा उन्हें अगले आर्थिक संकट के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील बनाते थे. लेकिन एक दशक बाद वह धारणा उलट गई है. जिस देश को कभी जोखिम भरा माना जाता था, आज वही देश विकास के लिए दुनिया का पसंदीदा देश है.

चलिए, विकास के गणितीय आंकड़ों से शुरू करते हैं. भारत की नॉमिनल जीडीपी पिछले एक दशक में करीब दोगुनी हो गई है. यह 2015 के करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर अब करीब चार ट्रिलियन डॉलर हो गई है यानी कि 100 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी. अधिकांश अनुमानों के मुताबिक भारत सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था रही है. वित्त वर्ष 2026 में वास्तविक वृद्धि दर अस्थायी अनुमानों के अनुसार 7.7 फीसदी रही. यह वित्त वर्ष 2022 के बाद सबसे तेज बढ़ोतरी के बराबर है. अकेले चौथी तिमाही में यह वृद्धि 7.8 फीसदी दर्ज की गई थी. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे व्यापक आर्थिक स्थिरता भी आती है.

नरेंद्र मोदी सरकार में भारत ने उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था भी बना है.

नरेंद्र मोदी सरकार में भारत ने उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था भी बना है.

इंफ्रास्ट्रक्चर डवलेपमेंट के लिए सरकार ने खोला खजाना

राजकोषीय स्थिति महत्वपूर्ण है. इसे मान्यता भी मिलनी चाहिए क्योंकि आर्थिक समृद्धि से राजनीति में अक्सर सफलता नहीं मिलती है. सरकार ने घाटे को महामारी के दौरान जीडीपी के नौ फीसद से अधिक के उच्चतम स्तर से घटाकर वित्त वर्ष 2026 में 4.4 फीसदी कर दिया है. वित्त वर्ष 2027 में इसे घटाकर 4.3 फीसदी करने का लक्ष्य है. राजस्व घाटा वित्त वर्ष 2009 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया है. यहां जानने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे निवेश में कटौती करके नहीं बल्कि व्यय की गुणवत्ता में सुधार करके हासिल किया गया है. राजस्व घाटा कम हुआ ताकि पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी हो सके.

भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे अधिक सक्रिय इंजन सार्वजनिक पूंजीगत व्यय रहा है. यह जो वित्त 2015 के करीब दो लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 के लिए बजट में 12.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. यह बढ़ोतरी करीब छह गुना की है. इसने प्रभावी पूंजीगत व्यय को महामारी से पहले के औसत जीडीपी के 2.7 फीसदी से बढ़ाकर करीब चार फीसदी कर दिया है. सड़कों, रेलवे, बंदरगाह और जलमार्ग पर अब इस व्यय का आधे से अधिक हिस्सा खर्च होता है. मोदी सरकार के आर्थिक मॉडल का आधार यह रहा है कि राज्य भौतिक और डिजिटल आधार बनाकर निजी पूंजी को चलाने के लिए आवश्यक ढांचा तैयार करता है.भारत का डिजिटल ढांचा अपने आप में एक खामोश क्रांति है. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रणाली जैसे आधार, यूपीआई, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप दिया है. इसने कल्याणकारी योजनाओं में होने वाले घपलों को रोका है और एक रियल टाइम भुगतान प्रणाली बनाई है,जिसे अब दुनिया एक आदर्श के रूप में देख रही है. निस्संदेह रूप से यह इस दौरान भारत द्वारा बनाया गया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक निर्यात लायक चीज है.

इस तस्वीर में अभी भी एक चीज है, जो गायब है, वह है निजी पूंजी. यह इस चक्र के अधिकांश हिस्से में पिछड़ी रही है. वह सरकार को ही सारा भार उठाने देती रही है. मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर का पूरा लाभ उठाने के लिए, इस स्थिति को बदलना होगा, निजी निवेश को सरकार द्वारा छोड़ी गई जिम्मेदारियां संभालनी होंगी.

गुजरात के हजीरा में एल एंड टी के प्लांट का दौरा करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

गुजरात के हजीरा में एल एंड टी के प्लांट का दौरा करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
Photo Credit: PTI

भारत की अर्थव्यवस्था केवल सर्विस सेक्टर पर आधारित नहीं है

इन 12 सालों में सबसे महत्वपूर्ण दांव औद्योगिक क्षेत्र में लगा है, जिससे भारत केवल सर्विस सेक्टर आधारित अर्थव्यवस्था बनकर न रह जाए, बल्कि वह उत्पादन के माध्यम से वैल्यू चेन में ऊपर की ओर बढ़ सकता है.'मेक इन इंडिया', 'उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन' (पीएलआई) योजनाओं और 'आत्मनिर्भरता' के व्यापक सिद्धांत के जरिए इस क्षेत्र में वास्तविक निवेश किया जा रहा है. कुछ क्षेत्रों में शुरुआती परिणाम आश्चर्यजनक रहे हैं.

पीएलआई योजना की सबसे बड़ी सफलता इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में देख सकते हैं, जहां भारत मोबाइल फोन आयात करने से लेकर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता बन गया है. मोबाइल फोन का उत्पादन वित्त वर्ष 2020 में 2.14 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 5.5 लाख करोड़ रुपये का हो गया.यह दोगुने से भी अधिक है. इसी अवधि में निर्यात करीब आठ गुना बढ़कर 0.27 लाख करोड़ रुपये से दो लाख करोड़ रुपये हो गया. वर्ष 2025 में कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 47 अरब डॉलर से अधिक का था, जो कि इससे पिछले साल की तुलना में 37 फीसदी अधिक है. आज स्मार्टफोन भारत से सबसे अधिक निर्यात होने वाली चीज है. इस विकास में अहम भूमिका निभाने वाली पीएलआई योजना को 14 क्षेत्रों में 836 स्वीकृत आवेदन मिले हैं, इससे 2.16 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश हुआ है और 8.3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात हुआ है.फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र की कहानी कुछ अलग है, लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण अंतर है, 191 थोक दवाओं का पहली बार घरेलू स्तर पर उत्पादन हुआ है. इससे आयातित अवयवों पर निर्भरता कम हुई है. यह महामारी के दौरान एक रणनीतिक कमजोरी के रूप में सामने आई थी. सरकार के पक्ष में यही सबसे ठोस तर्क है, जिन क्षेत्रों में उसने प्रोत्साहन केंद्रित किए और राजकोषीय लागत को वहन किया, वहां उसने ऐसी निर्यात योग्य औद्योगिक क्षमता विकसित की जो एक दशक पहले तक  मौजूद नहीं थी.

अभी सरकार के सामने चुनौतियां क्या हैं

हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 25 फीसदी तक ले जाने का मुख्य लक्ष्य अभी भी काफी दूर है, क्योंकि इस क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब एक दशक पहले के स्तर पर ही बनी हुई है. कुछ क्षेत्रों में क्षमता का निर्माण हो चुका है, इसे पूरी तरह से विस्तारित करना अभी भी एक चुनौती बनी हुई है.

फिर एक ऐसा सवाल आता है जिसे कोई भी व्यापक आकलन छोड़ नहीं सकता है, वह है रोजगार सृजन. सरकार पीएलआई के तहत 14.4 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करने का दावा करती है, जिसमें अकेले मोबाइल क्षेत्र करीब 12 लाख लोगों को आजीविका मिली है. यह उल्लेखनीय है, लेकिन हर साल लाखों की संख्या में आने वाले नए कार्यबल के मुकाबले, यह अभी भी देश को जरूरी रोजगार मुहैया करने वाला इंजन नहीं है. आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स पूंजी-प्रधान है, उत्पादन में भारी वृद्धि हो सकती है जबकि रोजगार में वृद्धि उस रफ्तार से नहीं होती है. यह एक नीतिगत विरोधाभास है जिसे दूर करने की जरूरत है. हालांकि, आंकड़ों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए. एक दशक जिसमें जीडीपी दोगुनी हुई, मुद्रास्फीति नियंत्रण में आई, निवेश में कमी किए बिना घाटा कम हुआ, पूंजीगत व्यय छह गुना बढ़ा, विश्व स्तरीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हुआ और एक मजबूत विनिर्माण आधार की नींव रखी गई, वह चक्रीय संयोग नहीं बल्कि संरचनात्मक मजबूती का दशक है. ढांचा फिर से तैयार हो चुका है और भार को सहन भी कर रहा है. ऐसे में इमारत कितनी ऊंची उठेगी, यह अंततः कारखाने के फर्श पर ही तय होगा.

(डिस्क्लेमर: गौरी द्विवेदी एनडीटीवी में राजनीतिक अर्थव्यवस्था की कार्यकारी संपादक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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