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This Article is From Jan 15, 2015

शरद शर्मा की खरी-खरी : केजरीवाल vs किरण बेदी : कौन किस पर कितना भारी

Sharad Sharma, Rajeev Mishra
  • Blogs,
  • Updated:
    जनवरी 16, 2015 01:10 am IST
    • Published On जनवरी 15, 2015 23:30 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 16, 2015 01:10 am IST

दिल्ली के दंगल में आखिरकार देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी कूद ही पड़ी। किरण बेदी ने बीजेपी ज्वाइन कर ली है और वह दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी लड़ेंगी ये भी तय हो गया है, लेकिन कहां से ये तय नहीं है और इसको लेकर भी अटकलें लग रही हैं कि क्या किरण बेदी दिल्ली में बीजेपी का सीएम चेहरा हो सकती हैं? और क्या केजरीवाल का जवाब दिल्ली में बीजेपी के लिए किरण बेदी ही हैं?

दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल और बीजेपी नेता बनीं किरण बेदी ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन ''लोकपाल आंदोलन'' साथ ही किया और दोनों ही टीम अण्णा के अहम सदस्य के तौर पर खूब मशहूर हुए, लेकिन 2011 में शुरू हुआ लोकपाल आंदोलन डेढ़ साल बाद जब एक सामाजिक आंदोलन से एक राजनीतिक पार्टी की तरफ बढ़ चला तो किरण बेदी ने राजनीति में आने से इनकार करते हुए केजरीवाल के साथ चलने से मना कर दिया। आज देखिए किरण बेदी राजनीति में आई भी तो सामना अरविंद केजरीवाल से हो रहा है।

हालांकि, किरण बेदी का बीजेपी में शामिल होना कोई हैरत भरी घटना बिलकुल नहीं है। किरण बेदी लोकपाल आंदोलन के समय से बीजेपी के काफ़ी क़रीब दिखती थी और जब उन्होंने केजरीवाल के साथ राजनीति में जाने से मना किया, तब भी यही माना गया कि वो बीजेपी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती इसलिए केजरीवाल के साथ राजनीति में नहीं गई। नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने खूब सराहा, लेकिन सराहते हुए ये भी कहती रही कि वो अराजनैतिक ही रहेंगी। मई 2014 में जब बीजेपी ने देश जीता उसके बाद से किरण बेदी के सीएम उम्मीदवारी चर्चा में आ गई थी, लेकिन समय के साथ लगने लगा कि शायद बीजेपी बाहर से लाकर किसी को सीएम कैंडिडेट नहीं बनाएगी।

किरण बेदी के बीजेपी में शामिल होने की खबर आते ही उनके पुराने ट्वीट भी चर्चा में आ गए जैसे 16 मार्च 2013 का उनका ये ट्वीट ''एक दिन नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों पर सफ़ाई देनी ही पड़ेगी बावजूद इसके कि अदालतें उनको अब तक क्लीन चिट दे रही हैं''

या फिर 5 सितंबर 2013 का उनका ये ट्वीट ''अगर राजनीतिक पार्टियां आरटीआई के दायरे में न आए दो देश को उनको मिलने वाली टैक्स में छूट वापस ले लेनी चाहिए साथ ही बंगला और ज़मीन भी वापिस लिए जाने चाहिए''

नरेंद्र मोदी आज पीएम हो चुके हैं और बीजेपी आरटीआई के दायरे में आने से आज भी इनकार ही कर रही है। क्या इस तरह के विचार किरण बेदी का पीछा छोड़ेंगे?

इससे पहले मैं आगे बढ़ूं, मैं आपको बता दूं कि आज जब मैं आम आदमी पार्टी के दफ्तर में गया तो वहां उसके आला नेताओं से मुलाकात के दौरान पता चला कि किरण बेदी उनकी चिंता का सबब बनी हुई थीं और उनके माथे पर चिंता की लकीर खिंची हुई थी, लेकिन पूछने पर नेता यही कह रहे थे कि 'कोई फर्क नहीं पड़ने वाला'।

इसके बाद, मैं दिल्ली बीजेपी के दफ्तर गया ये सोचकर कि यहां तो जश्न होगा, लेकिन दिल्ली बीजेपी के नेताओं के भी चेहरे उतरे हुए थे। बयान तो नेता कुछ भी दे रहे थे, लेकिन उनके हाव-भाव से पता चल रहा था कि किरण बेदी उनकी भी चिंता का सबब हैं।

असल में ये चिंता उस मुकाबले का नाम है, जिसको केजरीवाल बनाम किरण बेदी कहा जा रहा है। आप के लोग तो इसलिए चिंतित हैं कि वो मानते रहे हैं कि केजरीवाल को अगर कोई सीएम चेहरे के तौर पर टक्कर दे सकता है तो वो हैं किरण बेदी। और किरण बेदी के बीजेपी में आने पर उनका डर सच साबित होता दिख रहा है। आम आदमी पार्टी का ये डर कितना वाजिब है ये आगे लिखूंगा।

दिल्ली बीजेपी के नेता इसलिए परेशान हैं क्योंकि उनको आगे बढ़ने का मौका शायद अब जाता रहा। दिल्ली के अंदर बीजेपी के अंदर अलग-अलग गुट हैं जो किरण बेदी के आने से ही इसलिए परेशान हैं क्योंकि वो बहुत बड़ा नाम हैं और उनके होते हुए दिल्ली की जिम्मेदारी उनको नहीं मिल सकती। साथ ही ये भी बात है कि बीजेपी के नेता ये सोचते हैं कि 17 साल से दिल्ली की सत्ता से वो बाहर हैं और संघर्ष कर रहे हैं और अब जब ऐसा लग रहा है कि वो बस दिल्ली जीतने ही वाले हैं और सत्ता बस हाथ में आई समझो तो कोई बाहर का आकर उनके सर पर बैठ जाए।

खैर दिल्ली बीजेपी के नेता कुछ भी सोचकर परेशान होते रहे हों, होगा वहीं जो पीएम मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह चाहेंगे। आइये अब ज़रा देख लें कि अरविंद केजरीवाल बनाम किरण बेदी में कौन किस पर कितना भारी दिखता (जिसकी वजह से आप चिंतित है) अरविंद केजरीवाल की तरह किरण बेदी की छवि भी एक ईमानदार अफ़सर की रही है।

अरविंद केजरीवाल ने 49 दिन जिस तरह सख्ती से शासन करके रिश्वतखोरी कम करने की कोशिश की ठीक उसी तरह किरण बेदी एक सख्त पुलिस अफसर के तौर पर पहचान रखती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी उठवाकर मशहूर हुई थीं।

केजरीवाल एक पूर्व आईआरएस अधिकारी हैं तो किरण बेदी पूर्व आईपीएस यानी दोनों की क्लास एक ही है और खास बात ये कि दोनों ने ही अपनी नौकरी पूरी होने से पहले सरकारी नौकरी को अलविदा कह दिया। केजरीवाल और किरण बेदी का मुख्य कार्यक्षेत्र दिल्ली है, रहा है।

लेकिन आम आदमी पार्टी की चिंता यहां से शुरू होती है कि किरण बेदी मिडिल क्लास में बड़ा नाम मानी जाती जो दिल्ली की राजनीति में एक बड़ा वोटबैंक है। मशहूर केजरीवाल भी बहुत थे 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में, लेकिन सरकार छोड़ने के बाद से मिडिल क्लास में केजरीवाल और उनकी पार्टी का ग्राफ गिरा।

सारे ओपिनियन पोल में मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर केजरीवाल निर्विवाद रूप से पहली पसंद बने रहे इसलिए आम आदमी पार्टी केजरीवाल का चेहरा आगे रखकर चुनाव लड़ रही थी और बीजेपी पर सीधा हमला करके पूछती थी कि बताओ सीएम उम्मीदवार कौन है आपका? और बीजेपी के पास केजरीवाल की टक्कर का नेता दिल्ली में था नहीं। खासतौर से जो इतना पॉपुलर हो।

बीजेपी पीएम मोदी का चेहरा सामने रखकर प्रचार कर तो रही थी, लेकिन फिर बात ये आती थी कि मोदी तो पीएम हैं, सीएम थोड़ी बनेंगे। हालांकि सीएम उम्मीदवार के तौर पर किरण बेदी के नाम का ऐलान मुश्किल लगता, लेकिन मीडिया और पब्लिक में चर्चा करके धारणा ज़रूर बन सकती है कि बीजेपी जीती तो सीएम किरण बेदी ही बनेंगीं।

लेकिन अब ज़रा देखिए कि केजरीवाल ने किरण बेदी के लिए ट्वीट कर कहा कि ''मैं हमेशा किरण बेदी का प्रशंसक रहा हूं। मैंने उन्हें हमेशा राजनीति में आने के लिए मनाने की कोशिश की। मुझे खुशी है कि आज वो राजनीति में आ ही गईं''

यानि केजरीवाल अभी भी किसी तरह के आरोप, हमले, ताने वगैरह के चक्कर में नहीं पड़ रहे जैसे कि वो अब पीएम मोदी पर हमले नहीं करते बस बीजेपी को निशाना बनाते हैं। और न ही किरण बेदी अरविंद केजरीवाल के ऊपर टिप्पणी कर रही हैं।

इन दोनों को एक बार राजनीति के अनुभव के तराजू में तोलें तो दिखता है कि केजरीवाल ने जहां अपनी पूरी अलग पार्टी बनाई, संगठन खड़ा किया, शून्य से सफ़र शुरू किया और पहले से स्थापित दो राष्ट्रीय पार्टियों से जमकर युद्ध किया। पिछले चुनाव में 15 साल से सत्ता पर काबिज दिल्ली से कांग्रेस को निपटाकर इन चुनावों में भी बीजेपी की नाक में दमकर करके रखा है। केजरीवाल ने जो किया खुद अपने दम पर किया और पूरी पार्टी उनके दाम पर टिकी है।

तो वहीं किरण बेदी को अपना सफ़र शुरू करने के लिए प्लेटफार्म तो पहले से तैयार मिला, जिस पार्टी में शामिल हुई वो पहले ही अपने जीवनकाल के स्वर्णिम दौर में चल रही है और देश जीतने के बाद एक के बाद एक राज्य अपने नाम करते जा रही है। पार्टी तो पहले ही फॉर्म में है और ज़्यादा राजनीति का अनुभव किरण बेदी को न भी हो तो क्या, सारा काम उनको खुद नहीं करना है, जो उनको पार्टी में लाया है वो संभाल भी लेगा।

केजरीवाल के सामने अभीतक इन चुनावों में केवल एक ही चुनौती थी कि उनको जनता को ये समझाना था कि उन्होंने सरकार क्यों छोड़ी और इस्तीफ़ा क्यों दिया? क्योंकि बाकी सब मुद्दे उतने बड़े जनता की नज़र में नहीं दिखते और केजरीवाल अपनी लोकप्रियता में गिरावट देखते हुए भी अपनी ईमानदार छवि के कारण सीएम कैंडिडेट के तौर पर पहली पसंद बने हुए थे, लेकिन अब उनको एक चुनौती से और निपटना होगा क्योंकि बीजेपी ने ईमानदार छवि का जवाब ईमानदार छवि से और लोकप्रिय चेहरे का जवाब लोकप्रिय चेहरे के तौर पर दे दिया है।

एक बात ये भी है कि किरण बेदी वो नाम हैं जिनके बीजेपी के सीएम उम्मीदवार होने की प्रबल संभावनाएं तो हैं ही, साथ ही एक वक्त में तो आम आदमी पार्टी भी उनको दिल्ली का सीएम उम्मीदवार बनने का ऑफर दे चुकी है।

तो क्या बीजेपी ने किरण बेदी को लाकर अपना मास्टर स्ट्रोक खेला है?

अगर हां तो सवाल ये है कि केजरीवाल के पास इसका क्या जवाब है?

यह जवाब ही बताएगा कि दिल्ली के दंगल में केजरीवाल की दावेदारी कितनी मज़बूत है।

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