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फ्लाईदुबई हादसे से पैदा हुए सवाल, कैसे करेंगे कट्टरपंथी पायलट की जांच

संजय लजार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 05, 2026 13:38 pm IST
    • Published On अक्टूबर 05, 2026 13:36 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 05, 2026 13:38 pm IST
फ्लाईदुबई हादसे से पैदा हुए सवाल, कैसे करेंगे कट्टरपंथी पायलट की जांच

30 सितंबर को हमारे पड़ोस में फ्लाईदुबई के विमान से जुड़ी आतंकवादी हमले की खबर ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया. फ्लाईदुबई की उड़ान FZ-1073 के पायलट और यात्रियों ने जिस साहस और बहादुरी का परिचय दिया, वह भी असाधारण था. इस विमान के को-पायलट पर आरोप है कि उसने विमान को दुर्घटनाग्रस्त कराने या 9/11 जैसा कांड करने की कोशिश की थी.

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध फ्लाइट-रडार के आंकड़ों ने विमानन जगत को हैरान कर दिया है. सवाल यह है कि बोइंग 737 इतनी तेजी से नीचे कैसे आ गया, जबकि इससे विमान के टूटने या उसे भारी नुकसान होने की आशंका थी? लगभग सीधे नीचे गिरने जैसी स्थिति में विमान पर उसकी क्षमता से कई गुना अधिक दबाव पड़ सकता था. इसके बावजूद विमान क्षतिग्रस्त हालत में उतर गया.

इजरायली प्लंबर यानिव हायून द्वारा विमान के कंट्रोल को पीछे खींचकर उसे स्थिर करने की घटना किसी रोमांचक फिल्म की कहानी जैसी लगती है. लेकिन यह हुआ है. इसलिए अभी सवाल उठाने या अनुमान लगाने के बजाय हमें जांच रिपोर्ट आने का इंतजार करना चाहिए.

क्या सामान्य तौर पर इस तरह किसी विमान को बचाया जा सकता है?

बिल्कुल नहीं. अगर ऐसी स्थिति को 100 बार भी दोहराया जाए तो संभव है कि 99 बार विमान को बचाना संभव न हो. लेकिन इस बार यह कोशिश सफल हुई और विमान में मौजूद सभी लोग जिंदा बच गए. कभी-कभी किसी बड़ी दुर्घटना को टालने के लिए कई चमत्कार एक साथ होने पड़ते हैं. यह ऐसा ही एक दिन था. अगर इस पूरी घटना में शामिल लोगों में से किसी एक ने भी सही समय पर सही कदम नहीं उठाया होता, तो आज हमें कई लोगों की मौत का शोक मनाना पड़ रहा होता.इसलिए हमें उन सभी लोगों की बहादुरी को सलाम करना चाहिए.

9/11 के बाद विमानन सुरक्षा में बहुत बड़े बदलाव हुए थे. कॉकपिट के दरवाजों को मजबूत किया गया, पायलट और क्रू के लिए नए सुरक्षा नियम बनाए गए और Advance Passenger Information System (APIS) को यात्रियों और विमान के क्रू की पहले से सुरक्षा जांच करने की जरूरी व्यवस्था बनाया गया.

अब इस घटना के बाद भी विमानन सुरक्षा में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. मुझे 9/11 के बाद के शुरुआती दिन याद हैं. उस समय ऐसे कई मामले सामने आए थे, जब मुस्लिम नाम वाले पायलटों और क्रू सदस्यों की उड़ान मंजूरी में देरी की गई या उनकी अतिरिक्त सुरक्षा जांच की गई.

पायलटों का संकट क्या है

पूरी दुनिया में प्रशिक्षित पायलटों की कमी है. लेकिन इस समस्या को और गंभीर बना रही है पायलटों के काम करने की खराब परिस्थितियां. उनसे बहुत ज्यादा समय तक काम कराया जाता है, आराम का समय कम मिलता है, उन्हें अलग-अलग हवाई अड्डों के बीच लगातार यात्रा करनी पड़ती है. वे बेहद तनावपूर्ण माहौल में काम करते हैं.

भारत में पिछले दो सालों में भी ऐसी कुछ घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे विमानन सुरक्षा व्यवस्था के कमजोर होने या पायलटों की भावनात्मक स्थिति पर सवाल उठे हैं. पायलट शायद दुनिया की सबसे तनावपूर्ण नागरिक नौकरियों में से एक करते हैं. हर उड़ान में सैकड़ों यात्रियों की जिंदगी की जिम्मेदारी उनके ऊपर होती है. उन्हें मौसम और दूसरी प्राकृतिक परिस्थितियों से भी निपटना पड़ता है. उन्हें कभी-कभी मशीनों में आने वाली समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है. इसके बाद भी पायलटों की मानसिक स्थिति और तनाव को लेकर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है.

इस हादसे में घायल हुए फ्लाईदुबई के पायलट स्मित मच्छार का दुबई के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है. उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत की थी.

इस हादसे में घायल हुए फ्लाईदुबई के पायलट स्मित मच्छार का दुबई के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है. उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत की थी.
Photo Credit: PTI

कैसे पहचानेंगे कट्टरपंथी सोच को

जर्मनविंग्स की घटना ने भी हमें याद दिलाया था कि पायलट की मानसिक स्थिति कितनी महत्वपूर्ण है. अब पायलटों की मानसिक स्थिति की निगरानी की जाती है. लेकिन सवाल यह है कि 9/11 और अब फ्लाईदुबई जैसी घटनाओं में सामने आई कट्टरपंथी सोच और आत्मघाती प्रवृत्ति को कैसे पहचाना जाए?

पायलटों की मनोवैज्ञानिक जांच के लिए साइकोमेट्रिक टेस्ट होते हैं. इनसे यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि कोई व्यक्ति पायलट बनने और विमान उड़ाने के लिए मानसिक रूप से उपयुक्त है या नहीं. लेकिन क्या इन जांचों से यह पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित हो चुका है? मुझे डर है कि अभी ऐसा नहीं है. कट्टरपंथी लोग अक्सर अपनी असली सोच छिपाने के लिए लंबे समय तक खुद को सामान्य दिखा सकते हैं.

फ्लाईदुबई के मामले में आखिर गलती कहां हुई?

हमें यह समझना होगा कि फ्लाईदुबई के मामले में वास्तव में क्या हुआ. इस घटना ने विमानन सुरक्षा व्यवस्था की जिन कमजोरियों को सामने लाया, उनकी पहचान करना जरूरी है.

पहली नजर में ऐसा लगता है कि APIS व्यवस्था सिस्टम में हुई सुरक्षा चूक को पकड़ने में विफल रही. ऐसे खतरे की पहले से कोई खुफिया जानकारी उपलब्ध नहीं थी. अब्राहम अकार्ड के बाद देशों के बीच विमानन सुरक्षा समझौतों में बदलाव या ढील की संभावना है. फ्लाईदुबई अपने पायलटों की पर्याप्त जांच करने में विफल रही.पायलट के कट्टरपंथी विचारों और मानसिक/भावनात्मक स्थिति का सही आकलन नहीं किया गया.

इजरायल अमेरिका की APIS व्यवस्था का इस्तेमाल करता है. National Center for Passenger Information Analysis (NCPIA) केंद्र आने वाले यात्रियों और क्रू की जानकारी की जांच करता है.ऐसे में सवाल उठता है कि इजरायली NCPIA को कैप्टन हम्मामी से जुड़े संभावित खतरे के संकेत कैसे नहीं मिले? अगर ऐसा हुआ है तो यह पूरी सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता है.इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए.

ऐसी किसी साजिश की पहले से कोई विश्वसनीय खुफिया जानकारी या ऑनलाइन नेटवर्क पर बातचीत सामने नहीं आई थी, जबकि इजरायल और अमेरिका ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में हैं. यह भी संभव है कि 'अब्राहम अकॉर्ड' के बाद सुरक्षा व्यवस्था में कुछ ढील आ गई हो. इसलिए इन नियमों की पूरी तरह समीक्षा किए जाने की उम्मीद है.

APIS के नियमों के मुताबिक ऐसे देशों के क्रू पर विशेष प्रतिबंध हैं, जो इजरायल को मान्यता नहीं देते या उसे दुश्मन मानते हैं. इनमें ओमान, सीरिया और ईरान जैसे देश शामिल हैं. सवाल यह है कि क्या 'अब्राहम अकॉर्ड' के बाद इन नियमों में ढील दी गई? और अगर कैप्टन हम्मामी के ओमान और सीरिया से संबंध थे, तो वह सुरक्षा जांच से कैसे निकल गए?

पायलट की मानसिक स्थिति कैसी होती है

इस घटना में पायलट की मानसिक और भावनात्मक स्थिति भी एक बड़ा सवाल बनकर सामने आई है. अगर किसी पायलट में कट्टरपंथी विचारों के संकेत थे, तो सुरक्षा व्यवस्था उसे पहचानने में कैसे विफल रही और उसे इजरायल जाने वाले विमान के कॉकपिट तक कैसे पहुंचने दिया गया? खासकर तब, जब आरोप है कि उसे पहले उसके कट्टर विचारों के कारण ओमान एयर से हटाया गया था. इस सवाल का जवाब फ्लाईदुबई और संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारियों को गंभीरता से तलाशना होगा.

विमानन क्षेत्र ने तकनीकी खराबियों को रोकने के लिए बहुत तेजी से विकास किया है. लेकिन इस घटना ने यह दिखाया है कि खतरा सिर्फ विमान के इंजन या किसी तकनीकी हिस्से में नहीं होता. खतरा कॉकपिट के अंदर और पायलट के दिमाग में भी हो सकता है. इसके अलावा साइबर हमले और भविष्य में AI के इस्तेमाल से जुड़े खतरे भी मौजूद हैं.

इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को केवल पहले से ज्ञात खतरों से निपटने तक सीमित नहीं रखा जा सकता. उसे लगातार नए और उभरते खतरों को पहचानने की क्षमता विकसित करनी होगी. ऐसी स्थिति के लिए सुरक्षा की मजबूत व्यवस्था बनाना बेहद कठिन है. विमान और पायलट के चारों तरफ सुरक्षा की कई परतें बनाई जा सकती हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाना लगभग असंभव है जिसमें किसी बुरे इरादे वाले कट्टरपंथी व्यक्ति को हर स्थिति में रोका जा सके.

ओडिशा के पुरी तट पर बालू में कलाकृतियां बनाने वाले कलाकार सुदर्शन पटनायक ने फ्लाईदुबई के पायलट स्मित मच्छार पर आधारित कलाकृति बनाई.

ओडिशा के पुरी तट पर बालू में कलाकृतियां बनाने वाले कलाकार सुदर्शन पटनायक ने फ्लाईदुबई के पायलट स्मित मच्छार पर आधारित कलाकृति बनाई.
Photo Credit: PTI

खतरों का बदलता स्वरूप क्या है

एयरलाइंस और विमानन नियामक अब पारंपरिक आतंकवाद और तोड़फोड़ के साथ-साथ तकनीकी खराबी, जीपीएस से छेड़छाड़, साइबर हमले, इंसानी गलतियां और थकान जैसे खतरों से भी निपट रहे हैं. अब इसमें अंदरूनी खतरे, कट्टरपंथ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी जुड़ गए हैं.

विमानन सुरक्षा में लंबे समय से इंजन खराब होने, विमान की संरचना में समस्या, उड़ान नियंत्रण की खराबी, सॉफ्टवेयर की समस्या, नेविगेशन में गलती, रखरखाव में कमी, निर्माण संबंधी खामियों और पायलट की थकान या तनाव जैसे जोखिमों पर ध्यान दिया जाता रहा है.

इन खतरों से निपटने के लिए कई व्यवस्थाएं बनाई गई हैं. इनमें अतिरिक्त सुरक्षा प्रणालियां, नियमित जांच, सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम, अनिवार्य रिपोर्टिंग, सिम्युलेटर ट्रेनिंग, फ्लाइट डेटा की निगरानी, पायलटों की मनोवैज्ञानिक जांच, मानसिक स्वास्थ्य का आकलन और थकान की निगरानी शामिल हैं.

दुनिया भर के विमानन नियामक कई स्तरों वाली सुरक्षा व्यवस्था पर काम करते हैं. इसका उद्देश्य खतरे की पहचान करना, जोखिम का आकलन करना और यह देखना है कि सुरक्षा व्यवस्था लगातार ठीक तरह से काम कर रही है या नहीं. लेकिन यह पूरी व्यवस्था एक बुनियादी मान्यता पर आधारित है, वह यह है कि विमान के अंदर मौजूद इंसान विमान को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहा है.

फ्लाईदुबई जैसी घटना में सवाल यह है कि अगर यही मान्यता गलत साबित हो जाए तो क्या होगा?

अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन यानी ICAO पहले ही अंदरूनी व्यक्ति से होने वाले खतरे को विमानन सुरक्षा की एक अलग समस्या मान चुका है. उसकी सलाह में कर्मचारियों की पृष्ठभूमि की जांच, समय-समय पर दोबारा जांच और लगातार निगरानी की बात कही गई है. केवल नौकरी देते समय की गई जांच के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि व्यक्ति हमेशा कम जोखिम वाला ही रहेगा. शायद फ्लाईदुबई की घटना से हमारे लिए यह सबसे बड़ी सीख है.

इस घटना का एक गंभीर पहलू यह है कि अगर किसी पायलट को कट्टरपंथी विचारों के कारण एक एयरलाइन से हटाया गया था, तो वह दूसरे देश में दूसरी एयरलाइन में इतनी आसानी से नौकरी कैसे हासिल कर सका? यह उसके पहले नियोक्ता और संबंधित नियामक की बड़ी विफलता की ओर इशारा करता है. जिस वजह से उसे हटाया गया, उसकी जानकारी दूसरे नियोक्ता तक नहीं पहुंची. दूसरी बड़ी चूक यह हो सकती है कि जब वह दूसरे देश में गया तो उसकी दोबारा पर्याप्त पृष्ठभूमि जांच नहीं हुई.

भविष्य में अलग-अलग देशों के विमानन नियामकों के बीच ज्यादा सहयोग जरूरी होगा. ऐसी जानकारी साझा करने के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि विमानन कर्मचारियों की सुरक्षा और पृष्ठभूमि की गहरी जांच की जा सके. संभव है कि भविष्य में The International Federation of Air Line Pilots' Associations (IFALPA) या Air Line Pilots Association (ALPA) जैसे पायलट संगठनों के साथ मिलकर दुनिया भर के पायलटों का एक रिकॉर्ड भी तैयार किया जाए. इसमें पायलट की योग्यता, लाइसेंस, विमान के प्रकार की रेटिंग और अन्य जरूरी जानकारी दर्ज हो सकती है.

पायलट दुनिया भर में काम करने वाला एक महत्वपूर्ण मानव संसाधन हैं. इसलिए नियामकों, पायलट संगठनों और एयरलाइंस को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाने पर विचार करना चाहिए. यह भारत के  नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के लिए भी अपने उस नियम पर दोबारा विचार करने का मौका है, जिसके तहत भारतीय एयरलाइन छोड़ने वाले पायलटों के लिए 6 से 12 महीने की नोटिस अवधि लागू होती है. पायलटों को दुनिया भर में काम करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन यह प्रक्रिया सुरक्षित भी होनी चाहिए.

पायलटों की लगातार निगरानी की जरूरत है

अभी विमानन क्षेत्र में कई चीजों की जांच किसी खास समय पर की जाती है, जैसे मेडिकल टेस्ट, सुरक्षा मंजूरी, बैकग्राउंड चेक, लाइसेंस, विमान के प्रकार की रेटिंग और दोबारा ट्रेनिंग. लेकिन कमी यह है कि पायलट की लगातार निगरानी और आकलन की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है. लोगों की परिस्थितियां बदल सकती हैं. उनकी आर्थिक स्थिति, पारिवारिक संबंध और निजी परिस्थितियां बदल सकती हैं. इन बदलावों का असर उनके व्यवहार और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है.

फ्लाईदुबई के हादसे के बाद कैप्टन स्मित मच्छार एक राष्ट्रीय हीरो के तौर पर उभरे हैं. इजरायल में उनकी जमकर तारीफ की जा रही है.

फ्लाईदुबई के हादसे के बाद कैप्टन स्मित मच्छार एक राष्ट्रीय हीरो के तौर पर उभरे हैं. इजरायल में उनकी जमकर तारीफ की जा रही है.
Photo Credit: PTI

फ्लाईदुबई के मामले में अगर ओमान एयर और कैप्टन हम्मामी के बीच पहले से गंभीर समस्या थी और उसकी वजह से उन्हें वहां से हटाया गया था, तो सवाल उठता है कि इतनी महत्वपूर्ण जानकारी दूसरी एयरलाइन तक क्यों नहीं पहुंची? एयरलाइंस के बीच विश्वसनीय जानकारी साझा करने की व्यवस्था क्यों नहीं थी?

भविष्य में सुरक्षा व्यवस्था ऐसी हो सकती है जिसमें पायलट की मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्थिति के साथ-साथ उसकी विश्वसनीयता का भी लगातार आकलन किया जाए. हालांकि इसमें लोगों की निजता और नागरिक अधिकारों का सवाल भी उठेगा. इसलिए सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा. सवाल यह भी है कि क्या किसी व्यक्ति की वैध राजनीतिक या धार्मिक सोच को सुरक्षा खतरा बनाए बिना कट्टरपंथी विचारों की पहचान की जा सकती है?

हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जो किसी व्यक्ति के विचारों के बजाय उसके ऐसे व्यवहार की पहचान करे, जिससे विमानन सुरक्षा को वास्तविक खतरा पैदा हो सकता है.

क्या हवाई यात्रा को सुरक्षित बना सकता है AI

AI विमानन को और सुरक्षित बना सकता है. लेकिन डर यह भी है कि AI के कारण विमानन व्यवस्था इतनी अनुमान लगाने योग्य हो सकती है कि इसका गलत इस्तेमाल करने वाले लोग उसे नुकसान पहुंचाने के नए तरीके खोज लें. इसलिए विमानन कंपनियों को AI के इस्तेमाल में बहुत सावधानी बरतनी होगी.

सकारात्मक पक्ष यह है कि AI विमान में असामान्य स्थितियों, पायलट की थकान, रखरखाव की समस्याओं, पायलटों के काम के असंतुलन, ऑपरेशनल फैसलों और साइबर हमलों जैसी चीजों की पहचान कर सकता है. लेकिन दूसरी तरफ AI विमानन के लिए खतरा भी बन सकता है. अगर फैसले लेने में इंसान की भूमिका बहुत कम हो गई तो क्या होगा? क्या भविष्य में हमें फिर कभी 'सुली' जैसी घटना देखने को मिलेगी, जिसने हडसन नदी में विमान उतारकर सभी यात्रियों की जान बचाई थी?

यूरोपीय विमानन सुरक्षा एजेंसी यानी EASA और अमेरिकी FAA AI को लेकर महत्वपूर्ण शोध कर रहे हैं. FAA यह भी मान चुका है कि AI आधारित बड़े LLM सॉफ्टवेयर की तरह व्यवहार नहीं करते और इसलिए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है. इसलिए इस मुद्दे पर अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी.

भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था कैसी हो?

भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था में कई चीजों को एक साथ शामिल करना होगा.

  • तकनीकी सुरक्षा, जैसी अभी है.
  • पायलट और अन्य कर्मचारियों की लगातार जांच.
  • ज्यादा मजबूत सुरक्षा नियम.
  • लगातार जोखिम की निगरानी.
  • AI और डिजिटल सिस्टम की सुरक्षा.
  • इन सभी प्रणालियों पर इंसानी नियंत्रण.

शायद सबसे बड़ा बदलाव विमानन नियामकों में ही जरूरी है. कई जगह नियामक संस्थाएं एयरलाइंस और अन्य हितों के दबाव में काम करती हैं. हमें ऐसी जगहों पर साफ-सुथरी छवि और पेशेवर क्षमता वाले लोगों को जिम्मेदारी देनी चाहिए, जिन पर किसी तरह का हितों का टकराव या सुरक्षा से जुड़ा सवाल न हो.

दुनिया के ज्यादातर विमानन नियामक अभी भी खतरा सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देते हैं. EASA और FAA जैसे कुछ नियामक इस मामले में आगे हैं. तकनीक और खतरे, नियमों और सरकारी प्रक्रियाओं से ज्यादा तेजी से बदल रहे हैं. इसलिए हमें ऐसी सुरक्षा व्यवस्था बनानी होगी जो भविष्य के खतरों को पहले से समझ सके. लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि विमानन क्षेत्र में काम करने वाले हर व्यक्ति की हर समय निगरानी या प्रोफाइलिंग की जाए.

सबसे बड़ी सुरक्षा व्यवस्था भरोसे और जांच के संतुलन से बन सकती है. विमानन सुरक्षा का भविष्य विमान के चारों तरफ ऐसी अभेद्य दीवार बनाने में नहीं है, जिसे कोई तोड़ न सके. ऐसी दीवार बनाई ही नहीं जा सकती. आखिरकार विमान की जिम्मेदारी पायलट के हाथ में होती है. इसलिए हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें मजबूती, भरोसा और मानवीय संवेदनशीलता हो.

अपने मानव संसाधन का सम्मान कीजिए और देखिए कि स्थिति कैसे बदलती है. विमानन क्षेत्र को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जो किसी असामान्य स्थिति को पहले पहचान सके, किसी अप्रत्याशित घटना पर जल्दी सवाल उठा सके और खतरे के दुर्घटना में बदलने से पहले कार्रवाई कर सके. सवाल यह है कि विमान के आसपास मौजूद पूरी व्यवस्था अगली बार आने वाले खतरे को कॉकपिट तक पहुंचने से पहले पहचान पाएगी या नहीं.

फ्लाईदुबई की घटना से हमें क्या सीख मिलती है?

सबसे पहले, विमानन क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की विस्तृत पृष्ठभूमि जांच और उड़ान से पहले APIS सुरक्षा जांच को और कड़ा किया जा सकता है. संभव है कि अरब देशों से इजरायल जाने वाले विमानों के पायलटों के लिए पहले से मंजूरी प्राप्त करने की व्यवस्था और सख्त हो.

पूरी दुनिया के विमानन क्षेत्र में भी ऐसी व्यवस्था लागू करना गलत नहीं होगा, क्योंकि लगता है कि हमने कुछ मामलों में अपनी सुरक्षा सतर्कता कम कर दी है. उम्मीद है कि इजरायल की शिन बेट, मोसाद और NCPIA जैसी एजेंसियां अरब देशों, अमेरिका और भारत की खुफिया और होमलैंड सिक्योरिटी एजेंसियों के साथ ज्यादा सहयोग करेंगी, ताकि विमान के क्रू और यात्रियों की बेहतर जांच हो सके.

इस तस्वीर में सफेद रंग की टीशर्ट में नजर आ रहे व्यक्ति ने फ्लाईदुबई की फ्लाइट एफजेड 1073 को सुरक्षित उतारने में मदद की.

इस तस्वीर में सफेद रंग की टीशर्ट में नजर आ रहे व्यक्ति ने फ्लाईदुबई की फ्लाइट एफजेड 1073 को सुरक्षित उतारने में मदद की.
Photo Credit: AP

खतरा वास्तविक है. 9/11 या 30/9 जैसी घटना दोबारा कभी भी हो सकती हैं. कॉकपिट में लगाए जाने वाले CCTV कैमरों की चर्चा भी एक बार फिर तेज हो सकती है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा नियमों का पालन हो और कॉकपिट में वास्तव में क्या हुआ, उसका रिकॉर्ड उपलब्ध रहे.

मेरा यह भी मानना है कि इजरायल अपनी ओर आने वाली कुछ उड़ानों में एयर मार्शल की मौजूदगी की मांग कर सकता है और तेल अवीव जाने वाली उड़ानों की सुरक्षा और कड़ी की जा सकती है. कॉकपिट में इस्तेमाल होने वाला सुरक्षा उपकरण, जैसे क्रैश एक्स, आमतौर पर सुरक्षित तरीके से रखा जाता है. अब इस बात पर भी चर्चा हो सकती है कि इसकी जरूरत क्या है और इसे और सुरक्षित तरीके से कैसे रखा जाए.

व्यावसायिक कारणों से एयरलाइंस अगर संभव हो तो कॉकपिट में पायलटों की संख्या घटाना चाहेंगी. लेकिन मेरी राय में इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि कॉकपिट में किसी तीसरे व्यक्ति या ऑब्जर्वर की मौजूदगी हो सकती है या नहीं, ताकि ऐसी स्थिति में अतिरिक्त सुरक्षा मिल सके.

दुनिया भर के नियामकों और नेताओं, खासकर भारत को यह समझना होगा कि विमान को सुरक्षित उड़ाने और उतारने में पायलटों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है. हमें पायलटों के साथ ऐसा व्यवहार करना बंद करना होगा जैसे वे हर समस्या के लिए जिम्मेदार हों.

भारत में पायलटों के काम करने की परिस्थितियां बेहद खराब हैं. इसके बावजूद एक भारतीय पायलट, जो भारतीय विमानन व्यवस्था की नौकरशाही से बाहर निकल चुका था, उसने भारत, पायलटों और दुनिया भर के विमानन कर्मचारियों को गर्व महसूस करने का मौका दिया है.

अंत में, विमानन आज भी दुनिया में यात्रा का सबसे सुरक्षित माध्यम है. और पायलट दुनिया के सबसे ज्यादा गलत समझे जाने वाले पेशेवरों में से हैं. भारत और इजरायल दो प्राचीन सभ्यताएं हैं, जो दोस्ती और भाईचारे के रिश्ते से जुड़ी हैं. कैप्टन स्मित मच्छार, ताली और नीना मानेस, यानिव और उन दो अन्य पायलटों को धन्यवाद, जिनके नाम सामने नहीं आए. आपने हमें एक बार फिर चमत्कार में विश्वास करना सिखाया.

अम यिसराएल चाई, जय हिंद. 

(डिस्क्लेमर: संजय लजार विमानन विशेषज्ञ, वकील और लेखक हैं. वे विमानन, आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय संबंध, नेतृत्व और कानून जैसे विषयों पर लिखते हैं. उन्होंने विमानन क्षेत्र में 40 साल बिताए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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