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This Article is From Feb 03, 2015

क्या आप दिल्ली को लेकर टेंशन में हैं?

Ravish Kumar, Rajeev Mishra
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  • Updated:
    फ़रवरी 03, 2015 11:37 am IST
    • Published On फ़रवरी 03, 2015 11:22 am IST
    • Last Updated On फ़रवरी 03, 2015 11:37 am IST

चुनाव दिल्ली का, लेकिन दिल धड़क रहा है पूरे देश का। हर कोई पूछ रहा है कि दिल्ली में क्या होगा। कई लोग ठीक वैसे ही तनाव से गुज़रने लगे हैं जैसे विश्वकप के दौरान आखिरी के दस ओवरों के दौरान होता है। नाखून चबाने लगते हैं तो आंखें बंद कर अपने कुल देवताओं का जाप करने लगते हैं। कुछ दर्शक तो जहां बैठे होते हैं, वहीं बैठे रह जाते हैं कि कहीं उठने पर विकेट न गिर जाए। यही हाल दिल्ली चुनाव को लेकर हो रहा है। टेलीविजन और ट्वीटर ने चुनाव को डांस इंडिया डांस और कौन बनेगा करोड़पति सा बना दिया है। जहां मंज़िल के नज़दीक आकर विजेता को लेकर सस्पेंस पैदा किया जाता है। एक तरह की खामोशी पसर जाती है कि जीतेगा या नहीं और फिर चिल्लाता है कि जीत गया। मुबारक हो। याद है न कौन बनेगा करोड़पति का सीन या स्लमडाग मिलेनियर का सीन।

ऐसा ही सीन है दिल्ली में। जैसे क्रिकेट में स्लॉग ओवर होता है वैसे ही दिल्ली के चुनाव में एक्सपोज़े आवर चल रहा है। हर दिन के साथ नया एक्सपोज़े। हर एक्सपोज़े के साथ आम आदमी पार्टी और भाजपा के फैन्स झूम उठते हैं तो उदास हो जाते हैं। कभी बीजेपी का दिन होता है तो कभी आम आदमी पार्टी का। नैतिकता हर पल बदल रही है। कॉपी सवाल पूछे जाने से पहले ही चेक हो जा रही है। मुद्दा क्या है यह गायब हो चुका है। जीतना है। जीतने के लिए कुछ भी करना है। जीत सौ खून माफ कर देती है। हैप्पी न्यू ईयर फिल्म याद है न। चोर डाकुओं का समूह भी टीवी सेट के ज़रिये प्रतियोगिता में घुसता है और दुबई पहुंच जाता है। राष्ट्रवाद की नैतिकता लपेट कर देश का प्रतिनिधित्व करने लगता है।

सब तमाशा चल रहा है। तमाशा ही जागरूकता है। तमाशा ही विकास है। तमाशा ही नैतिकता है। तमाशा ही बताशा है। खाइये और खिलाइये। चौराहे पर भी लोग कार का शीशा ठोकने लगते हैं। नीचे करने पर कोई चीखता मिलता है। भाई साहब बताओ किसे जीता रहे हो। वो आपके जवाब को अपने जवाब से मिलाना चाहता है। चाय की दुकान पर बात कीजिए तो आस पास के लोग रुक जाते हैं और चोरी से सुनने लगते हैं कि पत्रकार क्या बात कर रहा है। हंसी आती है और रोना भी।

हर मतदाता अब वोटर नहीं दर्शक है। उसका व्यवहार दर्शक की तरह है। स्टेडियम में बैठा या टीवी सेट से चिपका दर्शक। जो अपनी टीम को हारते जीतते देखने के क्षणों को जी रहा है। दर्शक बनते ही मतदाता की गोपनीयता और निजता चली जाती है। वो फिर पब्लिक में आ जाता है। खुद को फैन्स बताकर अपनी गोपनीयता और निजता का त्याग कर देता है। फैन्स बनकर ट्वीटर पर अपनी पार्टी की तरफ से चीयरलीडर बन जाता है। फैन्स लोकतंत्र को तमाशा में बदल रहे हैं। मतदाता जितना गोपनीय होगा उतना ही नेताओं की चुनौती मुश्किल होगी।

ट्वीटर या फेसबुक की टाइमलाइन पर जाइये। ऐसे लोग कम मिलेंगे जो बारी बारी से सभी पार्टी की आलोचना करते हैं या तारीफ करते हैं। सबने अपने पाले चुन लिये हैं। राजनीतिक दलों के लिए बैठे बिठाये कार्यकर्ता मिल गए हैं। फैन्स मत बनिये। आप राजनीतिक दलों का काम आसान कर रहे हैं। फैन्स बनकर आप अपनी पसंद की पार्टी की अनैतिकता को नहीं देखते सिर्फ दूसरों को देखते हैं। आप मतदाता बने रहिए। सबको सुनिये और परखिये। लेकिन अब इस दौर को कोई नहीं रोक सकता। बॉक्स ऑफिस की तरह हो गई है राजनीति। फिल्म वही जो दो सौ करोड़ कमाए।

मज़ा लीजिए इस चुनाव का। एक मित्र ने लिखा कि अब तनाव बर्दाश्त नहीं हो रहा है। मैं फेसबुक बंद कर रहा हूं। एक मोहतरमा ने इनबॉक्स में लिखा है कि खाने पर पति के साथ लड़ाई बढ़ गई है। लोग अपनी राजनीतिक पसंद को लेकर मुखर हो चुके हैं। मियां बीबी में झगड़ा हो रहा है क्योंकि दोनों अलग-अलग नेता को पसंद करते हैं। कमाल का क्षण है। अब हमारी जनता चुनाव से बोर नहीं होती। चुनाव क्रिकेट मैच की तरह मनोरंजन देने वाला हो गया है। मिडिल क्लास लोकतंत्र को एन्जवॉय कर रहा है। लोकतंत्र का लुत्फ उठा रहा है। राजनीति सीरीयल की तरह टीवी पर प्रसारित हो रही है। इस लड़ाई में कांग्रेस की हालत ज़िम्बाब्वे की टीम जैसी हो गई है। जिसके जीतने और हारने से किसी के नंबर पर असर पड़ सकता है फाइनल में पहुंचने के लिए।

तो दिल्ली में कौन जीतेगा। नहीं बताऊंगा कौन जीतेगा। चलिये आपको निराश नहीं करूंगा। सर्वे पर शक कीजिए। आपकी पार्टी के खिलाफ है तो शक कीजिए और पक्ष में है तो विश्वास कीजिए। अपना तो एक ही जवाब है। एक पार्टी है जो कि जीत रही है मगर दूसरी पार्टी है जो कि जीत जाएगी। हां हां, मैंने क्या कहा, अरे जनाब, ठीक से पढ़िये। तो दिल्ली को लेकर आपको टेंशन हो रहा है तो आप अकेले नहीं हैं। न्यूज़रूम से लेकर बेडरूम तक तनाव फैल चुका है। आप लोकतंत्र के तनावतंत्र में फंस चुके हैं। मज़ा लीजिए।

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