कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन के 50 दिन पूरे

कृषि कानूनों को अपने उद्देश्य के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई थी उसके एक सदस्य ने खुद को उस कमेटी से अलग कर लिया है. भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान के नाम को लेकर काफी चर्चा हुई थी कि ये तो कानून के समर्थक हैं.

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी को महत्व नहीं देना चाहता है. कमेटी के सदस्यों को लेकर काफी आलोचना हो रही है और उनकी आलोचना के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट की भी हो रही है. किसान आंदोलन के 51 दिन हो गए. किसान मोर्चा का एक ब्लॉग है उस पर उन किसानों की एक सूची डाली गई जिनकी इन प्रदर्शनों के दौरान मौत हुई है. संयुक्त किसान मोर्चा ने इन्हें शहीद का दर्जा दिया है. इस ब्लॉग को अनुरूप संधु, सजनीत मंगत और हरिंदर हैप्पी चला रहे हैं. ब्लॉग में 24 नवम्बर से 13 जनवरी तक किसानों की मौत का विवरण है और इनसे जुड़ी प्रकाशित ख़बरों के लिंक भी दिए गए हैं. प्रदर्शन के 50 दिन पूरे होने पर मरने वाले शहीदों की संख्या 121 बताई गई है.

कृषि कानूनों को अपने उद्देश्य के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई थी उसके एक सदस्य ने खुद को उस कमेटी से अलग कर लिया है. भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान के नाम को लेकर काफी चर्चा हुई थी कि ये तो कानून के समर्थक हैं. गुरुवार को उन्होंने पत्र लिख कर कहा है कि जिस तरह से किसान संगठनों और पब्लिक में संदेह की स्थिति पैदा हुई है उसे देखते हुए मैं कोई भी त्याग करने के लिए तैयार हूं. भूपिंदर सिंह मान के इस कदम की तारीफ की जानी चाहिए. संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि वे इस इस्तीफे को अपनी छोटी जीत के रूप में देखते हैं. 

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी को महत्व नहीं देना चाहता है. कमेटी के सदस्यों को लेकर काफी आलोचना हो रही है और उनकी आलोचना के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट की भी हो रही है. किसान आंदोलन के 51 दिन हो गए. किसान मोर्चा का एक ब्लॉग है उस पर उन किसानों की एक सूची डाली गई जिनकी इन प्रदर्शनों के दौरान मौत हुई है. संयुक्त किसान मोर्चा ने इन्हें शहीद का दर्जा दिया है. इस ब्लॉग को अनुरूप संधु, सजनीत मंगत और हरिंदर हैप्पी चला रहे हैं. ब्लॉग में 24 नवम्बर से 13 जनवरी तक किसानों की मौत का विवरण है और इनसे जुड़ी प्रकाशित ख़बरों के लिंक भी दिए गए हैं. प्रदर्शन के 50 दिन पूरे होने पर मरने वाले शहीदों की संख्या 121 बताई गई है.

यह सिर्फ संख्या नहीं है. हर मौत के पीछे एक लंबी दास्तान है. जैसे आप सरदार सुरेंद्र सिंह सिद्धू जी के बारे में नहीं जानते. सरदार सुरेंद्र सिंह के बारे में मध्य प्रदेश की पूरी बीजेपी जानती होगी. ग्वालियर संभाग का हर नेता और मंत्री तो जानता ही होगा. उन सुरेंद्र सिंह का नाम भी 121 शहीदों में शामिल है और जिनके बारे में हम बताना चाहते हैं. आजीवन बीजेपी के लिए काम करने वाले सुरेंद्र सिंह ने कृषि कानूनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. ग्वालियर में इन कानूनों के ख़िलाफ प्रशासन को ज्ञापन दिया और 2 दिसंबर को ग्वालियर से किसानों का जत्था लेकर निकले थे. इस जत्थे में 2500 लोग थे, 50-60 ट्रॉलियां,100 से अधिक गाड़ियां थीं. ग्वालियर से 260 किमी की यात्रा कर पलवल में मोर्चा बनाया था. कृषि कानून के विरोध में.

3 जनवरी को सुरेंद्र सिंह जी का निधन हो गया. 13 जनवरी को उनकी अंतिम अरदास थी. ग्वालियर के चिनोर तहसील के मैना गांव के रहने वाले थे. आपको यकीन दिलाता हूं कि सुरेंद्र सिंह जी की कहानी से किसान आंदोलन और भारत की राजनीति का एक ऐसा चेहरा सामने आता है जिसे सामने लाने में किसी को दिलचस्पी नहीं होगी. यकीनन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को तो बिल्कुल ही नहीं जिनके चुनाव में सुरेंद्र सिंह ने जी तोड़ मेहनत की थी. है न कमाल कि अपने लिए काम करने वाले एक शानदार साथी की मौत पर कृषि मंत्री ने एक ट्वीट तक नहीं किया. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ट्वीट किया है.

हमें बताया गया कि सुरेन्द्र सिंह जी 1984 से BJP के साथ थे. ग्वालियर में अटल बिहारी वाजपेयी के लिए प्रचार किया था. 1998 में BJP के बड़े नेता जयभान सिंह पवैया के लिए प्रचार किया था. सुरेन्द्र जी ज़िला अंत्योदय समिति के भाजपा द्वारा नियुक्त सदस्य थे. इस समिति की अध्यक्षता ज़िलाधिकारी करते हैं. BJP चिनोर कार्यकारी मंडल में महामंत्री रह चुके थे और उपाध्यक्ष भी. बीजेपी की सदस्यता की हर महीने 1000 रुपय की रसीद काटी जाती है. सुरेन्द्र सिंह जी अनुभवी कार्यकर्ता थे, सो उनकी रसीद भी काटी जाती थी. मैना ग्राम पंचायत के सरपंच भी रह चुके हैं. भाजपा द्वारा ही नियुक्त किए गए थे.

सुरेंद्र जी राजनीति और समाज में सैकड़ों हज़ारों लोगों को जानते थे. एक कानून के विरोध ने उनके पूरे जीवन के काम पर पानी फेर दिया और किसान आंदोलन में शामिल ऐसे लोगों को आतंकवादी और खालिस्तानी कहा गया जिससे वे आहत हो गए. सुरेंद्र सिंह के लिए किसानी की पहचान कितनी अहम थी उसका अंदाज़ा उनके अरदास में रखे एक पोस्टर से होता है जिस पर लिखा है... 

किसान हैं तो हम हैं।। 
किसान नहीं तो हम नहीं।।
किसान की रक्षा।। देश की रक्षा।।
किसान से प्यार।। देश से प्यार।। 
किसान विरोधी काला क़ानून वापिस लो।। वापिस लो।। 
हम भारत के लोग।। हम भारत के लोग।।

यह पोस्टर आंदोलन को गोदी मीडिया और बीजेपी के नेताओं के द्वारा गढ़ी जा रही छवि को ध्वस्त कर देता है. उनकी दलीलें किसान की छाती को छलनी कर सकती हैं मगर इरादों को नहीं. इस एक तस्वीर से आप भारत में खेती के लिए सिखों के पलायन और उनके योगदान के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं. कई दशक पहले अमृतसर से सुरेंद्र सिंह के बुजुर्ग ग्वालियर के चिनोर तहसील खेती करने के लिए आए थे क्योंकि यहां ज़मीन सस्ती थी. पंजाब से बाहर निकले मगर खेती के लिए ही. किसानी के लिए.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ की भी उनकी एक तस्वीर है. हम व्यक्तिगत संबंधों की पुष्टि नहीं कर सकते लेकिन सुरेंद्र सिंह के करीबियों का दावा है कि मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत जान-पहचान थी. मुख्यमंत्री उनके अरदास में नहीं आए और अफ़सोस ज़ाहिर नहीं किया इस बात को उनके करीबियों ने नोट किया है. ग्वालियर से बीजेपी के सांसद विवेक नारायण शेजवलकर परिवार से मिलने गए थे. गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के भतीजे और भाजपा के युवा नेता विवेक मिश्रा ने भी परिवार से मिलकर सांत्वना दी है. हमें यह भी बताया कि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के चुनाव के लिए सुरेंद्र सिंह जी ने काफी मेहनत की थी. क्या यह आहत करने वाली बात नहीं है कि बीजेपी के नेताओं को पता था और कृषि मंत्री को पता था कि इस आंदोलन में शामिल सिख कौन लोग हैं. उनके जानने वालों में से है तब भी इस बात को हवा दी गई कि आतंकवादी हैं, माओवादी हैं और खालिस्तानी है. सुरेंद्र सिंह सिद्धू लोकप्रिय होंगे तभी इस कानून के विरोध में 2500 लोगों को लेकर पलवल पहुंचे थे. इतना रिश्ता बना गए कि उनके अरदास में पलवल और फरीदाबाद से लोग गए थे मगर उन्हें जानने वाले नहीं जा सके.

जिस शख्स ने बीजेपी के लिए काम किया लेकिन जब वही शख्स किसानों के लिए खड़ा हुआ तो खालिस्तानी बता दिया गया. कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को सामने आकर कहना चाहिए कि सुरेंद्र सिंह को वे नहीं जानते हैं. उनका सुरेंद्र सिंह से कोई संबंध नहीं था. उन्होंने कभी बीजेपी के लिए काम नहीं किया. उनके लिए कहना मुश्किल होगा.

अब आते हैं उस महान दलील पर जो यह कहती है कि बुज़ुर्गों और महिलाओं को वापस चले जाना चाहिए क्योंकि ठंड और कोरोना है. सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा कि कोर्ट चाहता है कि महिलाएं और बुजुर्ग ठंड और कोरोना के कारण वापस चले जाएं तो दोनों को अच्छा नहीं लगा. महिलाओं को लगा कि यह उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को कम आंकना है. यह दलील कुछ वैसी ही है कि महिलाओं को घर से नहीं निकलना चाहिए या महिलाओं को सिर्फ मार्च में प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि मार्च में बारिश नहीं होती है और ठंड नहीं पड़ती है. अजीब भी कितना ग़रीब लग रहा है.

किसान आंदोलन में शामिल महिलाओं की मौजूदगी कई तरह की तस्वीरों को बदल रही है. ये महिलाएं राजनीतिक दलों की तरह महिला मोर्चा की नेता नहीं हैं जिनका काम सिर्फ महंगाई के समय प्रदर्शन करना होता है. जहां उनकी मौजूदगी नेता के रूप में कम बहन के रूप में ज़्यादा समझी जाती है. लेकिन हमने प्राइम टाइम के ही एक दो एपिसोड में बताया था कि कई किसान संगठनों ने महिलाओं को मात्र बहन नहीं समझा है. उन्हें किसान और उनके भीतर नेता को देखा है. वे संगठन संभाल रही हैं. मंच पर भाषण दे रही हैं और पैसे का हिसाब रख रही हैं. वे किसी के पीछे-पीछे नहीं आई हैं बल्कि साथ-साथ और आगे आगे आई हैं. कोर्ट को या किसी भी सामाजिक अध्येता को इसका अध्ययन करना चाहिए. बेशक इन्हें देखते हुए शाहीन बाग़ की दादीयां और औरतें याद आती हैं जिन्होंने नागरिकता कानून को लेकर उठते हर सवालों का जवाब दिया था. हर दिन गोदी मीडिया उनका जनरल नालेज टेस्ट करता था. नागरिकता कानून के विरोध में बड़ी संख्या में औरतों ने मोर्चा संभाला था सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश भर में. तब लड़कियों ने पुलिस की लाठियां खाईं और लोगों को संविधान का मतलब समझाया था. भारत की संस्थाओं में ऐसी जुझारू महिलाओं की कोई कल्पना नहीं थी न ही शब्द थे सिवाय इन्हें बहन कहने के अलावा. घर में रहने वाली बहन कहने के अलावा. लौट कर आइये किसान आंदोलन में शामिल महिलाओं के इस दृश्य पर. ये केवल महिलाएं नहीं हैं. किसान हैं. आज की खेती का वास्तविक चेहरा. गांवों में कई किलोमीटर दूर पानी लाने से लेकर खेतों की जुताई कटाई का काम करने वाली किसान. इनकी मौजूदगी एक और बड़े बदलाव की तरफ इशारा कर रही है. पंजाब की इन महिला किसानों ने इतना तो हासिल किया ही है कि वे अपने घर गांव से कई सौ किलोमीटर दूर 51 दिनों के लिए आंदोलन पर जा सकती हैं. क्या यह सामान्य बदलाव है? उन्हें यह सवाल नहीं रोक सका कि पीछे घर कौन संभालेगा. उनकी यहां मौजूदगी बता रही है कि घरों में किसानी के कारण महिला पुरुषों के संबंध में कुछ बदलाव आया होगा. कायदे से कोर्ट से लेकर सभी को इस बात का जश्न मनाना चाहिए कि ये बदलाव पहली महिला पायलट या पहली महिला पुलिस के बदलाव से कहीं ज्यादा बड़ा और व्यापक है. उनकी इस लड़ाई को सर्दी के तापमान से नहीं आंका जाना चााहिए. इन्हें पता है कि खेती की बर्बादी ने सबसे पहले उनके घरों से पुरुषों को खेतों और गांवों से दूर कर दिया.

संयुक्त किसान मोर्चा ने अपनी प्रेस रिलीज में इस बात पर एतराज़ किया है. कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान यह कहा गया कि "औरतें इस हड़ताल में क्यों हैं? औरतों और बुजुर्गों को इस हड़ताल में क्यों रखा गया है? उन्हें घर जाने को कहना चाहिए". सयुंक्त किसान मोर्चा इस तरह के कथनों की निंदा करता है. कृषि में महिलाओं का योगदान अतुलनीय है और यह आंदोलन महिलाओं का भी आंदोलन है. इस तरह से महिलाओं की अपनी एजेंसी पर सवाल उठना बहुत ही शर्मनाक है. हम इसकी सख्त निंदा करते है.

शाहीन बाग़ और किसान आंदोलन महिलाओं को आगे लाने के लिए याद रखा जाएगा. इसलिए नहीं कि वे भीड़ बन कर आईं बल्कि इसलिए कि वे नेता बन कर आईं. अब हम FPO पर बात करना चाहते हैं. FPO का मतलब होता है फार्मर प्रोड्यूसर्स आर्गेनाइज़ेशन. कृषि उत्पादक संगठन. आपको पहले फ्लैशबैक में ले जाना चाहता है.

17 दिसंबर 2020 को कृषि मंत्री ने अपने हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा है कि “देश के विभिन्न राज्यों से, कृषि सुधार कानूनों के समर्थन में आये कृषक उत्पादक संगठन (#FPO) के प्रतिनिधियों से आज कृषि भवन में मुलाकात की.” उन्होंने समर्थन देने वाले FPO के किसानों की तस्वीर भी डाली हैं. इसी से जु़ड़ी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हरियाणा के एक लाख ऐसे किसानों ने कृषि कानूनों का समर्थन किया है जो फार्मर प्रोड्यूसर आर्गेनाइज़ेशन से जु़ड़े हैं, खुद को प्रगतिशील किसान कहते हैं. इसीलिए हम FPO की बात कर रहे हैं ताकि जान सकें क्योंकि सरकार FPO के ज़रिए कृषि कानूनों के लिए समर्थन जुटा रही है. नाबार्ड के संरक्षण में ज़िले ज़िले में कृषि उत्पादक संगठन FPO बनाए गए हैं. इसमें कम से कम 10 और अधिक से अधिक 100 किसान होते हैं. यह एक कंपनी की तरह पंजीकृत होती है. जिसे सरकार प्राथमिकता के आधार पर कर्ज़ और अनुदान देती है. 2013 की पुरानी नीति है और अब देश भर में 2023-24 तक 10,000 कृषि उत्पादक संगठन बनाने की बात चल रही है. जिन संस्थाओं को दिए जाने वाले फंड पर सरकार का नियंत्रण हो उन संस्थाओं को समर्थन तो करना ही पड़ेगा. सौरभ को कई किसान आंदोलन में मिले जो ऐसे FPO के सदस्य हैं और वे भी कानून का विरोध करते हैं. एक किसान तो ऐसे ही एक FPO के निदेशक भी हैं कहते हैं वे लिख कर समर्थन नहीं देंगे.

कृषि मंत्री जिन FPO के समर्थन मिलने का दावा कर रहे हैं उनके समर्थन को सावधान निगाहों से देखा जाना चाहिए. सरकारी अनुदान से चलने वाले इन संगठनों के अलावा और क्या रास्ता है. लेकिन जब FPO भी विरोध करने लग जाएं तो क्या कृषि मंत्री ट्वीट करेंगे? हमने अंबाला के एक FPO के निदेशक सुखमिंदर सिंह से बात की. हर FPO का निदेशक होता है. उनके ज़रिए इन FPO की एक और तस्वीर सामने आ गई.

बागवानी करने वाले किसानों ने खरबूज और आलू का एक FPO बनाया था. उनसे सरकार ने कहा था कि संगठित हो कर काम करेंगे तो सब्सिडी मिलेगी और 3 साल का खर्चा मिलेगा. लेकिन एक पैसा नहीं मिला. सरकार ने कहा कि दफ्तर का किराया, कानूनी मदद के लिए एक व्यक्ति की सैलरी दी जाएगी, नहीं दी गई. किराया अपनी जेब से देना पड़ा. जुलाई 2019 से प्रति माह 2000 किराया दे रहे हैं. और इन FPO को आयकर विभाग के नोटिस आ रहे हैं कि आपने आयकर रिटर्न फाइल नहीं किया. जबकि उनके FPO ने कोई काम ही नहीं किया है.

आपने सुखमिंदर सिंह को सुना. कैसे कहा जा रहा है कि आप FPO बनाएं क्योंकि समूह को सब्सिडी मिलेगी, व्यक्ति को नहीं. और समूह बनाने के बाद कि क्या मुसीबतें हैं ये सब आपको बताया नहीं जाता है. सुखमिंदर सिंह ने एक और बात कही कि सरकार इन FPO से कह रही है कि आप धान और गेहूं खरीदने के एजेंट बनेंगे तो सरकार कमीशन देगी. उसी की गाइडलाइन के अनुसार FPO अपनी मंडी बना सकता है और खरीद का एजेंट बन सकता है. लहम नहीं जानते कि नए कानून आने के बाद से FPO की क्या भूमिका रहेगी, और इसके रहते नए कानून की ज़रूरत ही क्यों पड़ी?

किसान आंदोलन को धरना स्थल के कवरेज के साथ इन तमाम अनुभवों और जानकारियों के साथ देखा समझा जाना चाहिए. तभी आप आंदोलन की समझ बना सकेंगे. आखिर आपने सुन लिया कि जिन FPO के समर्थन को सरकार दिखा रही है उनकी क्या हालत है. चंद सफल अनुभवों से आप सभी किसानों को और वो भी पूरे देश के लिए कानून बना सकते हैं. क्यों नहीं बना सकते बताने की ज़रूरत नहीं है. सुखमिंदर सिंह के पास भी फोन आया था कि आप समर्थन दे दीजिए. सुखमिंदर सिंह की बात ठीक है. FPO से जु़ड़े बहुत से किसान भी कृषि कानूनों के विरोध में इस आंदोलन में शामिल हैं. जुलाई 2020 में FPO के लिए नए दिशानिर्देश जारी हुए हैं उन्हें देखना चाहिए. 2013 में जारी दिशानिर्देश में कहा गया है कि FPO अपनी मंडी बना सकता है और थोक ख़रीदार से करार करने में बिचौलिए का काम कर सकता है. इन FPO को न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत खरीद एजेंट के रूप में भी नियुक्त किया जा सकता है. इन्हें बीज, उपकरण, उर्वरक और कीटनाशकों के कारोबार का लाइसेंस भी दिया जा सकता है.

आप तक यही सूचना पहुंचाई जा रही है कि FPO ने सरकार का समर्थन किया. कृषि मंत्री ने ट्वीट किया और हर जगह खबर छप गई. लेकिन इस सूचना के पीछे की वास्तविकता का पता करने में हमें कई दिन लग गए. ज़ाहिर है हमारे पास कम संसाधन हैं लेकिन आप इसी से समझिए कि सरकार अपनी बात बिना किसी चेकिंग के, बिना किसी जांच परख के हर जगह कितनी ताकत और आसानी से पहुंचा देती है. सरकार को खुद बताना चाहिए या आपको चेक करना चाहिए कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में वाहवाही करने वाला किसान कहीं इसी FPO का सदस्य तो नहीं है? क्यों इन बैठकों में सिर्फ तारीफ की बात होती है क्या प्रधानमंत्री सिर्फ तारीफ सुनना चाहते हैं?

रेल मंत्री इन दिनों कई बार ट्वीट करते हुए देखे जा सकते हैं. जैसे 7 जनवरी का ट्वीट है कि किसान हित में रेल द्वारा आंध्र प्रदेश से पश्चिम बंगाल के लिए 2692 टन सोयाबीन का तेल लोड किया गया. लेकिन इस तरह के ट्वीट में रेल मंत्री यह नहीं बताते कि क्या हल्दिया में ज़्यादा दाम मिला है? अगर मिला तो कितना अधिक मिला, अपने ट्वीट में उसकी जानकारी क्यों नहीं देते हैं ताकि दूसरे किसान भी जान सकें कि सारे देश में सोयाबीन का दाम नहीं मिल रहा हल्दिया में मिल रहा है.

ग्वालियर के डबरा मंडी में सोयाबीन का भाव 2800-3000 प्रति क्विंटल मिल रहा है. जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,880 रुपये है. रेल मंत्री के ट्वीट से यह सच्चाई छिप जाती है. प्राइम टाइम से सामने आ जाती है. रेल मंत्री यह भी नहीं बताते हैं कि पहली बार हल्दिया सोयाबीन का तेल गया है? पहले कैसे जाता था? आप को सूचना के नाम पर एक ट्वीट और चार फोटो दिया जाता है. जो पूरी सूचना है ही नहीं.

सोचिए ये सारी सूचनाएं ख़बर के रूप में चैनलों पर फ्लैश होती हैं, अखबारों में छपती हैं और करोड़ों पाठकों तक पहुंचाई जाती हैं. ट्रांसपोर्ट की वाहवाही आज के ज़माने में ली जा रही है यह भी कमाल है. आप जल्दी ही यकीन करने लगेंगे कि इससे पहले एक जगह का सामान दूसरी जगह नहीं पहुंचता था. वो तब से पहुंचना शुरू हुआ है जब से ट्वीट होना शुरू हुआ है. इस बीच हम एक और ट्वीट की बात करेंगे. पंजाब से धान की खरीद के बारे में.

6 दिसंबर को रेल मंत्री कृषि मंत्री ट्वीट करते हैं कि धान की खरीद इस साल ज्यादा हुई है और उसमें पंजाब का हिस्सा क़रीब 60 प्रतिशत है. 14 दिसंबर को पीयूष गोयल ने ट्वीट किया कुल धान की खरीद में पंजाब का हिस्सा 54 प्रतिशत रहा , यानी घट रहा है वो यह नहीं बताते हैं. बस बता देते कि धान की खरीद हो रही है मतलब MSP है और रहेगी. अब ये नया ट्वीट देखिए. 9 जनवरी का है. इसमें पीयूष गोयल बताते हैं कि देश के कुल खरीद मं अकेले पंजाब का 38 प्रतिशत योगदान रहा. 

तो आपने देखा कि एक महीने में पंजाब का योगदान 60 प्रतिशत से 38 प्रतिशत पर आ गया. क्योंकि दूसरे राज्यों की खरीद के आंकड़े आ गए. पंजाब से हर साल औसतन देश की कुल खरीद का 30 प्रतिशत खरीदा जाता है. क्या वाकई बहुत ज़्यादा खरीद हुई है पंजाब से, क्या सरकार गारंटी दे रही है कि अगले साल भी इतनी ही ख़रीद होगी? आप देखेंगे कि बिहार से कितना धान खरीदा गया इसकी कोई जानकारी नहीं दी जाती है. क्या MSP है और रहेगा का नारा सिर्फ पंजाब के लिए है?


सूचनाओं को समझना सूचनाओं से लड़ने के जैसा हो गया है. अख़बार आप पढ़ते हैं इसका मतलब पढ़ना नहीं हुआ. पढ़ना उसे कहते हैं जब आप दावों की जांच करते हैं. पता करते हैं कि जो कहा जा रहा है उसकी सच्चाई क्या है. जिस तरह से मैंने आपको बताया. अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है. इस पोस्टर में आप पढ़ सकते हैं. सरकार कह रही है कि 19-20 में 423 लाख मिट्रिक टन धान की ख़रीद हुई. और इस साल अब तक 543 लाख मिट्रिक टन. यानी पिछले साल की तुलना में इस साल 26 प्रतिशत अधिक हो चुकी है. अब इन्होंने पहली गलती यह की है कि धान लिखा है मगर डेटा दिया है चावल का. जब आप Department of food and public distribution की साइट पर जाएंगे तो पता चलेगा कि 19-20 में कुल 519 लाख मिट्रिक टन चावल की खरीद हुई थी. इस डेटा के हिसाब से अब तक जो खरीद हुई है वो 26 प्रतिशत अधिक कैसे हो गई?

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भारत सरकार के भीतर किसी से ग़लती हो रही है या झूठ बोलने के लिए आंकड़ों को गलत बनाया जा रहा है. क्या इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता कि प्रधानमंत्री की तस्वीर लगा कर विवादित आंकड़े दिए जा रहे है. यह 27वां एपिसोड है फिर भी हम खेती से जुड़े पहलुओं को नाममात्र पेश कर पाए हैं. गोदी मीडिया ने आपने नागरिक होने के स्वाभिमान को रौंद दिया है. इससे पहले कि आपका स्वाभिमान मिट्टी हो जाए और उसे फिर से उठा कर चाक पर रख दीजिए. ताकि उस मिट्टी से नई पहचान, नया नागरिक बनाया जा सके.