- पाकिस्तान की शहबाज सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में बिगड़ती कानून-व्यवस्था के कारण इमरजेंसी घोषित की है
- पाकिस्तान के इतिहास में घरेलू राजनीतिक बदलाव अक्सर अफगानिस्तान में हो रही उथल-पुथल के साथ जुड़े रहे हैं
- इमरजेंसी के बाद खैबर पख्तूनख्वा में सेना की तैनाती और भारी सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं
पाकिस्तान यानी वह जमीन जहां लोकतंत्र हर दिन अपनी आखिरी सांस लेता है लेकिन इस उम्मीद के साथ कि आने वाला कल शायद बेहतर होगा. लेकिन इस उम्मीद पर एक और चोट की गई है. पाकिस्तान की शहबाज सरकार ने रविवार को खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी की घोषणा कर दी. इस कदम के पीछे अफगानिस्तान की सीमा से लगे इस प्रांत में बिगड़ती कानून-व्यवस्था का हवाला दिया गया. इसके साथ ही जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार का कार्यकाल समाप्त हो गया.
इमरजेंसी वह हथियार है जो पाकिस्तान की तमाम सरकारें हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करती आई हैं. इमरजेंसी पाकिस्तान की संघीय सरकार को सुरक्षा संकट या संवैधानिक शासन के ठप होने की स्थिति में किसी प्रांत की सरकार को हटाकर पावर अपने हाथ में लेने की इजाजत देता है. वैसे खैबर पख्तूनख्वा में यह कदम उठाने को सिर्फ इमरान खान की पार्टी PTI को सत्ता से बेदखल करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसे ऐसे भी देखा जाना चाहिए कि क्या खैबर पख्तून में इमरजेंसी का लगना अफगानिस्तान में आने वाले भूचाल का संकेत तो नहीं. पाकिस्तान के इतिहास में तो कुछ ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला है.
भुट्टो से मुशर्रफ तक यही कहानी
पाकिस्तान के इतिहास में बार-बार यह देखा गया है कि देश में होने वाले घरेलू राजनीतिक बदलाव अक्सर अफगानिस्तान में हो रही उथल-पुथल के साथ-साथ हुए हैं. दोनों की टाइमिंग इतनी पास होती है कि एक्सपर्ट संबंध निकालने लगते हैं.
- 5 जुलाई 1977 को जनरल जिया-उल-हक ने तख्तापलट करके पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार हटाई और मार्शल लॉ लगाया. इसके बाद अफगानिस्तान में 1979 में सोवियत सैन्य हस्तक्षेप हुआ. जिया के शासन में पाकिस्तान ने अफगान मुजाहिदीन को समर्थन दिया.
- पाकिस्तान में 1990 में नवाज शरीफ पहली बार प्रधानमंत्री बने. वहीं, अफगानिस्तान में 1992 में राष्ट्रपति डॉ. मोहम्मद नजीबुल्लाह की सरकार गिर गई. उनकी सरकार सोवियत संघ के समर्थन से चल रही थी, लेकिन सोवियत संघ के टूटने और समर्थन कमजोर पड़ने के बाद मुजाहिदीन लड़ाकों ने काबुल पर कब्जा कर लिया और उनकी अगुवाई में नई सरकार बनी. इसके बाद अफगानिस्तान में अलग-अलग मुजाहिदीन गुटों के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हो गया.
- अक्टूबर 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की सरकार का तख्तापलट किया. 2001 में अमेरिकी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान के बाद अफगानिस्तान की पहली तालिबान सरकार सत्ता से हट गई. दोनों घटनाएं समय के लिहाज से करीब थीं.
क्या अब पाकिस्तान की सैन्य और सुरक्षा नीति में कोई बड़ा बदलाव होने जा रहा है?
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इमरजेंसी लगाने की जो घोषणा की है, उसके अनुसार संविधान के अनुच्छेद 232(1) और 234(1) के तहत एक आदेश जारी किया गया है. इसमें उत्तर-पश्चिमी प्रांत में बढ़ते आतंकवादी हमलों और संवैधानिक व्यवस्था के विफल होने का हवाला दिया गया है. इस आदेश के तहत, मुख्यमंत्री, प्रांतीय मंत्री, सलाहकार, विशेष सहायक और एडवोकेट जनरल को तुरंत अपने पद छोड़ने होंगे.
इमरजेंसी लगाने के बाद शहबाज सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी सेना के जवानों और संसाधनों की तैनाती को भी मंजूरी दी है. जमीनी स्तर पर, कई सड़कों को बंद करने के लिए पेशावर शहर के चारों ओर शिपिंग कंटेनर रखे गए और भारी पुलिस बल तैनात किया गया है. प्रांत के सीएम सोहेल अफरीदी दावा कर रहे हैं कि उन्हें हिरासत में ले लिया गया है.
दूसरी तरफ सच्चाई यह है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के सत्ता में वापस आने के बाद से पाकिस्तान की उसके साथ बन नहीं रही है. आए दिन दोनों एक दूसरे पर हमला करते रहे हैं. डूरंड लाइन बॉर्डर के पार अफगानिस्तान के पास होने के कारण खैबर पख्तूनख्वा का खास रणनीतिक महत्व है. इस प्रांत में संघीय सरकार के अधिकार का विस्तार बॉर्डर सिक्योरिटी, व्यापार और तालिबान के साथ संबंधों पर असर डाल सकता है.
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