जो देश एक हाथ से शांति की बात करे और दूसरे हाथ से विरोधी पक्ष के साथ खड़ा हो जाए, उसे मध्यस्थ नहीं कहते. उसे विरोधी कहते हैं. पाकिस्तान ने ईरान के साथ कुछ ऐसा ही किया है. अब इस पर पर्दा डालना आसान नहीं है. 11 अप्रैल को इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठे थे. पाकिस्तान मेजबान था और दोनों पक्षों के बीच बातचीत कराने की भूमिका निभा रहा था. दुनिया भर में उसकी इस भूमिका की चर्चा हो रही थी. ठीक उसी दिन सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत में स्थित किंग अब्दुलअजीज वायुसेना अड्डे पर पाकिस्तानी लड़ाकू विमान उतर रहे थे. यानी एक तरफ बातचीत और शांति की बातें हो रही थीं, तो दूसरी तरफ युद्ध की तैयारी चल रही थी.
फिर मई में पूरी तस्वीर सामने आई. खबरों के अनुसार, मामला केवल कुछ विमानों तक सीमित नहीं था. करीब आठ हजार सैनिक, जेएफ-17 लड़ाकू विमानों का एक पूरा दल, ड्रोन के दो दल और एचक्यू-9 वायु रक्षा प्रणाली सऊदी अरब पहुंचाई जा चुकी थी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह तैनाती सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई थी. सवाल उठता है कि अगर इस कदम का उद्देश्य केवल रक्षा करना था, तो इसके बारे में पहले से खुलकर जानकारी क्यों नहीं दी गई?
पाकिस्तान की सैन्य इजाफा बन सकती है ईरान की चिंता की वजह
अब जरा सोचिए कि यह सैन्य तैनाती किस दिशा में प्रभाव डाल सकती है. इसका सीधा संबंध ईरान की सुरक्षा से जुड़ता है. पाकिस्तानी सैनिक, पाकिस्तानी पायलट और पाकिस्तान के नियंत्रण वाली मिसाइल प्रणाली सऊदी अरब की रक्षा क्षमता को मजबूत करते हैं.पाकिस्तान की सीमा ईरान के साथ करीब नौ सौ किलोमीटर तक लगती है. दोनों देशों के संबंधों में लंबे समय से पड़ोसी और मित्र होने की बात कही जाती रही है. ऐसे में सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य भागीदारी तेहरान के लिए चिंता का विषय बन सकती है.
और यह सब ऐसे समय में हुआ, जब ईरान बेहद कठिन दौर से गुजर रहा था. 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हमलों में उसके सुप्रीम लीडर की भी मृत्यु हो गई थी. देश पर हमलों का गंभीर प्रभाव पड़ा था. ऐसे समय में पड़ोसी देश से कम से कम यह उम्मीद की जा सकती थी कि वह तनाव कम करने में मदद करेगा. लेकिन पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत बनाए रखा. इसके साथ ही, अमेरिका के साथ भी उसके संपर्क जारी रहे, जबकि अमेरिका ईरान पर हमले कर रहा था.
पाकिस्तान की कूटनीति पर भी सवाल उठते हैं. अप्रैल के मध्य में फील्ड मार्शल आसिम मुनीर तेहरान पहुंचे. वहां उन्होंने ईरानी नेतृत्व से मुलाकात की, हाथ मिलाया और शांति की बातें कीं. लेकिन इससे कुछ दिन पहले ही पाकिस्तानी सैन्य विमान सऊदी अरब के अड्डे पर उतर चुके थे. विदेश मंत्री इशाक डार ने भी युद्ध के शुरुआती दिनों में कहा था कि पाकिस्तान ने ईरान के नेतृत्व को सऊदी अरब के साथ अपने रक्षा समझौते की जानकारी दे दी थी. इसका अर्थ यह था कि पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका के साथ उसकी सैन्य प्रतिबद्धताएं भी जुड़ी हुई थीं. ऐसे में उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक था.
फेल मध्यस्थ साबित हुआ पाकिस्तान
असल में, पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति पहले से ही तय होती दिखाई दे रही थी. सितंबर 2025 में सऊदी अरब के साथ हुए समझौते में यह प्रावधान शामिल था कि एक देश पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. खबरों के अनुसार, इस समझौते के तहत बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती की संभावना भी थी. इसके बाद पाकिस्तान के दौरे, बातचीत और शांति की पहल को उसकी व्यापक रणनीति से अलग करके देखना मुश्किल है. जो देश एक पक्ष के साथ रक्षा संबंधों से बंधा हो, उसके लिए दूसरे पक्ष के बीच निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाना आसान नहीं होता.
इसके परिणाम भी गंभीर रहे. अप्रैल में हुई बातचीत किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच सकी. जून में बड़े स्तर पर घोषित समझौता कुछ ही सप्ताह में कमजोर पड़ गया और जुलाई में फिर हमले शुरू हो गए. हालांकि किसी भी शांति वार्ता की विफलता के लिए केवल एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन मध्यस्थ देश की विश्वसनीयता इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होती है. ईरान के लिए पाकिस्तान की भूमिका पर संदेह करने के पर्याप्त कारण मौजूद थे.
इसके बावजूद कुछ लोग इस्लामाबाद को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में देखते हैं. लेकिन सवाल यह है कि उसकी निष्पक्षता का आकलन कैसे किया जाए? यदि किसी मध्यस्थ की सेना उस पक्ष की सुरक्षा मजबूत कर रही हो, जिसके साथ दूसरा पक्ष संघर्ष में उलझा है, तो उसकी भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है. खेल में निर्णायक यदि किसी एक दल के साथ खड़ा दिखाई दे, तो उसकी निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है.
इसलिए पाकिस्तान और ईरान के संबंधों को केवल मित्रता के बयानों के आधार पर नहीं समझा जा सकता. किसी भी रिश्ते की असली परीक्षा कठिन समय में होती है. पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंध, उसकी सैन्य तैनाती और ईरान के साथ उसकी मध्यस्थता की भूमिका के बीच स्पष्ट तनाव दिखाई देता है. इन घटनाओं ने दोनों देशों के बीच विश्वास को प्रभावित करने की आशंका पैदा की है.
तेहरान के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि कूटनीतिक बयानों के साथ-साथ देशों के वास्तविक कदमों को भी ध्यान में रखा जाए. हाथ मिलाना और शांति की बात करना पर्याप्त नहीं है. यह देखना भी जरूरी है कि संकट के समय कौन किसके साथ खड़ा है. पाकिस्तान अपनी ओर से मध्यस्थता की भूमिका निभाने का दावा कर सकता है, लेकिन उसकी सैन्य प्रतिबद्धताओं के कारण उस भूमिका की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे.
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