फ्रांस में कई हफ्तों से चले आ रहे स्कूली छात्रों के प्रदर्शनों के बाद अब देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. राजधानी पेरिस की सड़कों पर धुएं का गुबार, पुलिस की गाड़ियों के सायरन और गुस्से से भरी पब्लिक के नारे सुने जा रहे हैं. प्रदर्शनों के दौरान और उसके बाद युवाओं के गुट पूरे शहर में घूम घूम कर पुलिस से भिड़ रहे थे. पेरिस, मासेय, नीस, नॉट, बोर्दो, लिमोज, लील, तुलूज और स्ट्रासबुर्ग में दुकानों में डकैती हो रही है. कई शहरों में आगजनी की जा रही है.

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लेकिन सवाल है कि फ्रांस में प्रदर्शनकारी इतना उग्र प्रदर्शन कर क्यों रहे हैं?
दरअसल, इसकी दो मुख्य वजहें है. अव्वल तो देश में छात्र और शिक्षक स्कूल की बदहाल स्थिति और शिक्षा बजट में कटौती का विरोध कर रहे हैं. फ्रांस में ये छात्र आंदोलन पिछले महीने पेरिस में स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ था, फिर इसका दायरा बढ़कर पूरे देश में फैल गया.
दूसरा और बड़ा कारण है कि फ्रांस में जीवन यापन के खर्चों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. फिर मध्य पूर्व संकट ने महंगाई में आग में घी की तरह काम किया. यूरोप के ज्यादातर देश इस महंगाई से त्रस्त हैं. लोगों की क्रय शक्ति यानी परचेंजिक पावर लगातार गिर रही है. फ्रांस के लोगों का कहना है कि जी तोड़ मेहनत के बावजूद बचत नहीं हो रही है और किराए आसमान छू रहे हैं.
दुनिया जिस फ्रांस को एक खुशहाल, अमीर और तरक्कीपसंद मुल्क के तौर पर देखती आई है, वह आज अपने ही आर्थिक अंतर्विरोधों के बोझ तले छटपटा रहा है. मध्यम वर्ग की सिकुड़ती जेबें, ईंधन और रोजमर्रा की चीजों की असहनीय महंगाई, सोच से भी परे सरकारी कर्ज ने फ्रांस को एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वापसी का हर रास्ता बेहद कठिन और नामुमकिन सा नजर आता है.
अतीत में झांककर देखें तो फ्रांस ने दुनिया में करीब 80 इलाकों को अपना उपनिवेश बनाया. करीब 40 देश अलग-अलग वक्त पर फ्रांस से आजाद हुए, यानी फ्रांस ने लंबे वक्त तक दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज किया. फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी उतनी ही बड़ी थी, लेकिन आखिर क्या ये संभव है कि ईरान युद्ध की वजह से फ्रांस में महंगाई इस कदर बढ़ गई है या फिर वजह कुछ और है? और अगर ऐसा ही है तो भारत पर ईरान युद्ध का कोई असर क्यों नहीं पड़ा?
फ्रांस में वर्तमान में उमड़े जन-आक्रोश की असली जड़ वहां के नागरिकों की क्रय शक्ति (खरीदने की ताकत यानी फ्रांसीसी भाषा में 'Pouvoir d'achat') के ऐतिहासिक खात्मे में छिपी है. पिछले कुछ सालों में, खास तौर से रूस-यूक्रेन जंग और उसके बाद मध्य पूर्व में भड़के नए सियासी तनावों के चलते, यूरोप में बिजली और ईंधन की कीमतों में जो बेतहाशा बढ़ोतरी हुई, उसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.
फ्रांस का सामाजिक ढांचा पेरिस, ल्योन या मार्सिले जैसे कुछ बड़े चमक-दमक वाले शहरों और बाकी के कस्बाई और देहाती फ्रांस के बीच बुरी तरह बंटा हुआ है.
बड़े शहरों में रहने वाला अमीर तबका तो मेट्रो और सरकारी परिवहन के जरिए अपनी जिंदगी बसर कर लेता है, लेकिन दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले करोड़ों कामकाजी नागरिकों के लिए अपनी निजी गाड़ी कोई शौक नहीं, बल्कि रोटी कमाने का एकमात्र जरिया है.
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम चढ़ते हैं और सरकार उस पर पर्यावरण के नाम पर भारी टैक्स लाद देती है, तो इसका सीधा वार इसी गरीब कामकाजी वर्ग पर पड़ता है.
यही वह तबका है जिसने 2018 में 'पीली जैकेट' (येलो वेस्ट) आंदोलन किया था और यही गुस्सा आज फिर से एक अधिक आक्रामक, व्यापक रूप में पेरिस समेत देशभर में उतर आया है. इस बार इसमें कॉलेजों के छात्र, ट्रेड यूनियनें और छोटे किसान भी शामिल हो चुके हैं. इन लोगों का कहना है कि इनका भविष्य इन्हें अंधेरे में दिख रहा है.

प्रदर्शनकारियों ने कई कारों को आग के हवाले कर दिया.
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'कल्याणकारी राज्य' होना ही फ्रांस के लिए बना गले की फांस
फ्रांस जैसे अमीर देश के इस दलदल में फंसने की वजहों को समझने के लिए उसके दशकों पुराने आर्थिक ढांचे को समझना होगा. दूसरे विश्व युद्ध के बाद फ्रांस ने दुनिया के सबसे उदार और बड़े 'कल्याणकारी राज्य' यानी वेलफेयर स्टेट बनाने का फैसला किया था. मुफ्त और बेहतरीन इलाज, बेरोजगारों को मिलने वाला सरकारी भत्ता, लंबी छुट्टियां और जल्दी रिटायरमेंट. यह सब दशकों तक फ्रांसीसी लोगों की जिंदगी का हिस्सा था. लेकिन अर्थशास्त्र का एक सीधा सा नियम है कि दुनिया में कोई भी चीज मुफ्त नहीं होती, उसकी कीमत किसी न किसी को चुकानी ही पड़ती है. फ्रांस में यह कीमत लगातार बढ़ते सरकारी कर्ज के जरिए आने वाली नस्लों के सिर टाली जाती रही है.
फ्रांस की राष्ट्रीय सांख्यिकी और अर्थशास्त्र संस्थान यानी INSEE ने सितंबर 2026 के आखिर में हालिया आंकड़े प्रकाशित किए हैं. दूसरी तिमाही के अंत में फ्रांस पर 3,595.5 बिलियन यूरो का कर्ज था. ये पहली तिमाही की तुलना में 59.6 बिलियन यूरो अधिक है. सरकार ने चेतावनी दी है कि देश का सार्वजनिक कर्ज इस साल जीडीपी के 119.3% तक पहुंचने की उम्मीद है और 2027 में यह 121.7% तक भी पहुंच सकता है.
जब तक कर्ज पर ब्याज की दरें शून्य के आसपास थीं, तब तक कर्ज का यह पहाड़ दिखाई नहीं दिया, लेकिन वैश्विक महंगाई को काबू में करने के लिए जब यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने ब्याज दरें बढ़ानी शुरू कीं, तो फ्रांस के लिए केवल पुराना ब्याज चुकाना ही बजट का दूसरा सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया. आज फ्रांस अपने स्वास्थ्य या रक्षा बजट के बराबर की रकम केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर रहा है.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद फ्रांस ने दुनिया के सबसे उदार और बड़े 'कल्याणकारी राज्य' यानी वेलफेयर स्टेट बनाने का फैसला किया था.
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आग में घी बना मैक्रों सरकार का फैसला
इस गहरे वित्तीय खाई को पाटने के लिए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने जो रास्ता चुना, उसने जलती हुई आग में घी का काम किया. फ्रांस का पेंशन सिस्टम काम करने वाले युवाओं की जेब से कटने वाले टैक्स पर चलता है, जिससे आज के बुजुर्गों की पेंशन दी जाती है. लेकिन जब काम करने वाले युवाओं की संख्या घटने लगी और पेंशन लेने वाले बुजुर्गों की तादाद बढ़ने लगी, तो पेंशन के खजाने में सालाना अरबों यूरो का घाटा होने लगा.
मैक्रों सरकार ने इस घाटे को ठीक करने के लिए रिटायरमेंट की उम्र को 62 साल से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला लिया. आर्थिक नजरिए से यह फैसला भले ही ठीक लग रहा हो, लेकिन सामाजिक तौर पर यह गुस्से की वजह बना. संसद में बहुमत न होने के कारण सरकार ने इस कानून को लोकतांत्रिक तरीके से पास कराने के बजाय संविधान के एक विवादास्पद विशेषाधिकार का सहारा लेकर जबरन थोप दिया.
फ्रांस की मीडिया क्या कहती है?
फ्रांस के भीतर इस आर्थिक और सामाजिक संकट को कितनी गंभीरता से देखा जा रहा है, इसका सबसे सटीक अंदाजा वहां के बड़े अखबारों के संपादकीय पन्नों से लगाया जा सकता है.
अखबार 'ले मोंद' लगातार अपने विश्लेषणों में इस बात को लिख रहा है कि देश 'महंगाई और बदहाली' के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका है जहां से निकलना मुहाल है. अखबार के आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली मामूली राहतें केवल गहरे जख्म पर मरहम लगाने जैसी हैं, जबकि अंदरूनी अंग काम करना बंद कर रहे हैं.
अखबार ने आगाह किया है कि अगर सरकार ने कर्ज घटाने के लिए सरकारी सुविधाओं को बंद किया या जनता पर नए टैक्स लगाए, तो फ्रांस में एक गृहयुद्ध जैसे हालात बन सकते हैं.
फ्रांस की प्रमुख अखबार 'ले फिगारो' संकट की जड़ को सियासी नाकामी और बजट की फिजूलखर्ची में देखता है. ले फिगारो ने तीखी आलोचना करते हुए लिखा है कि फ्रांस दशकों से अपनी औकात से ज्यादा खर्च कर रहा है. अखबार के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार अब फ्रांस को शक की निगाह से देख रहे हैं. कभी यूरोप की रहनुमाई करने वाला फ्रांस आज कर्ज के बाजार में स्पेन और पुर्तगाल जैसे उन देशों से भी अधिक जोखिम भरा माना जा रहा है, जिन्हें कभी माली रूप से बेहद कमजोर समझा जाता था.

फ्रांस की अपनी रिपोर्ट में कहा गया कि देश में 10 से 20 फीसदी सरकारी स्कूलों की इमारत जर्जर हो रही है. फ्रांस का 2027 का शिक्षा बजट 64 अरब यूरो है.
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एनर्जी प्रतिबंधों की भारी कीमत फ्रांस ने चुकाई
दुनिया भर में तेल और गैस की किल्लत बीते कुछ महीनों से जारी है. ईरान और अमेरिका के युद्ध की वजह से ये किल्लत लगातार बढ़ती चली जा रही है. होर्मुज और लाल सागर में तेल और गैस की सप्लाई बाधित होने का खामियाजा फ्रांस पर भी पड़ा. लेकिन कुटनीतिक दांव उल्टा पड़ने की वजह से फ्रांस इस मुसीबत से उबर नहीं पा रहा है.
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के साथ ही फ्रांस ने यूरोप के दूसरे देशों के साथ मिलकर रूस से आने वाले सस्ते कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी. आर्थिक रूप से यह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था.
इस महंगे ईंधन ने फ्रांस की बड़ी फैक्ट्रियों, रासायनिक कारखानों और विनिर्माण उद्योगों की लागत को इतना बढ़ा दिया कि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुकाबले से बाहर होने लगे. इसके साथ ही, फ्रांस का परमाणु बिजली ढांचा भी इस नाजुक वक्त पर दगा दे गया. फ्रांस अपनी सत्तर फीसदी बिजली परमाणु रिएक्टरों से बनाने का दम भरता था, लेकिन देखरेख की कमी और पुराने पड़ चुके रिएक्टरों में खराबी आने के कारण संकट के ऐन वक्त पर उसके आधे से ज्यादा परमाणु संयंत्र बंद पड़े थे. जिस समय फ्रांस को दूसरों को बिजली बेचकर मुनाफा कमाना चाहिए था, उस समय उसे पड़ोसी देशों से बेहद महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही थी. इस नाकामी की वजह से अंतिम बोझ आम जनता की जेब पर पड़ा.

फ्रांस पर कर्ज बेतहाशा बढ़ा है. पिछले कुछ तिमाही के आंकड़े.
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तो अब जवाब देते हैं कि भारत कैसे इस मुश्किल से निकला?
मध्य पूर्व का संकट और तेल के बढ़ते दाम भारत के लिए फ्रांस से कहीं ज्यादा खतरनाक होने चाहिए थे, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी कच्चा तेल बाहर से खरीदता है. लेकिन हकीकत यह है कि भारत ने इस क्राइसिस का मुकाबला बेहद सूझबूझ से किया, जबकि फ्रांस इसके सामने ताश के पत्तों की तरह बिखर गया.
भारत की स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति रही. जब पश्चिमी मुल्क रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा रहे थे, तब भारत ने पश्चिमी देशों के दबाव को पूरी तरह खारिज करते हुए अपने देश के हितों को सर्वोपरि रखा. भारत ने रूस से भारी छूट पर मिलने वाले कच्चे तेल को खरीदना शुरू किया और उसका आयात कई गुना बढ़ा दिया. जहां फ्रांस जिद में आकर महंगी अमेरिकी गैस खरीदकर अपनी अर्थव्यवस्था का दिवाला निकाल रहा था, वहीं भारत ने सस्ते रूसी तेल के दम पर अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाया और अपने रिफाइनिंग उद्योग को भारी मुनाफा कमा कर दिया.
सरकार ने सरकारी तेल कंपनियों के घाटे को खुद संभाला और जरूरत पड़ने पर टैक्स में कटौती करके आम जनता को वैश्विक महंगाई के सीधे झटके से बचा लिया. इसके विपरीत, फ्रांस ने अपने खाली हो चुके खजाने को भरने के लिए ईंधन पर टैक्स बढ़ा दिए. इससे जनता का सब्र पूरी तरह टूट गया.
भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य तौर से घरेलू मांग यानी Domestic Consumption पर टिकी है. हमारी जीडीपी का सत्तर फीसदी हिस्सा देश के भीतर होने वाली खरीद-बिक्री से आता है. जब तक देश के भीतर मांग मजबूत है, तब तक भारत के बाजार और खजाने पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा. इसके उलट, फ्रांस की अर्थव्यवस्था पूरी तरह वैश्विक आपूर्ति और यूरोपीय संघ के बाजारों पर निर्भर है.
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