बीपी, शुगर, जोड़ों का दर्द या सिरदर्द जैसी सामान्य और आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के नाम पर बीमा कंपनियां अब आपका हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं. सेंट्रल जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक वरिष्ठ नागरिक के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी की मनमानी पर रोक लगाई है. आयोग ने स्पष्ट किया कि जब तक बीमा कंपनी पुराना मेडिकल रिकॉर्ड पेश न करे, तब तक इसे रोग छिपाना या प्रीएक्जिस्टिंग डिजीज नहीं माना जा सकता.
दरअसल, सेंट्रल जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा कंपनियों के इस रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि जीवनशैली से जुड़ी सामान्य बीमारियों को बीमा दावा खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.
ये है पूरा मामला
दिल्ली के रोहिणी निवासी 65 वर्षीय यशपाल बहल ने अपनी पत्नी और अपने लिए 7.5 लाख रुपये का ग्रुप मेडिकल इंश्योरेंस कराया था. वर्ष 2021 में अस्पताल में भर्ती होने पर उनके इलाज में लगभग 4.71 लाख रुपये का खर्च आया. जब उन्होंने बीमा कंपनी चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस के पास क्लेम फाइल किया, तो कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि मरीज को 4 साल से बीपी था और उन्होंने पॉलिसी लेते वक्त यह बात छिपाई थी. इतना ही नहीं, कंपनी ने क्लेम खारिज करने के कुछ समय बाद बुजुर्ग दंपति की पॉलिसी भी रद्द कर दी. इसके खिलाफ पीड़ित ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया था.
उपभोक्ता आयोग से बीमा कंपनी को झटका
मामले की सुनवाई करते हुए आयोग की अध्यक्ष दिव्या ज्योति जयपुरियार और सदस्य डॉ. रश्मि बंसल की पीठ ने बीमा कंपनी के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया. सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी मरीज के 4 साल पुराने बीपी या इलाज का कोई आधिकारिक मेडिकल पर्चा, जांच रिपोर्ट या डॉक्टर का रिकॉर्ड कोर्ट में पेश नहीं कर सकी. लिहाजा, आयोग ने बीमा कंपनी को बुजुर्ग दंपती के 4.71 लाख रुपये का क्लेम 6 प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया. इसके अलावा, गलत तरीके से पॉलिसी रद्द करने पर कंपनी पर 25,000 रुपये मानसिक प्रताड़ना के लिए और 15,000 मुकदमा खर्च के रूप में पीड़ित को देने का आदेश दिया गया.
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हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय इन बातों का रखें ख्याल
- इस फैसले के बाद अगर आप भी नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रहे हैं या पुरानी को रिन्यू करा रहे हैं, तो नीचे बताई गई बातों का विशेष ख्याल रखें.
- पॉलिसी लेते वक्त अपनी वर्तमान बीमारियों और चल रही दवाओं की सही जानकारी प्रपोजल फॉर्म में दें.
- प्री एग्जिस्टिंग डिजीज के लिए आमतौर पर 2 से 4 साल का वेटिंग पीरियड होता है. पॉलिसी लेने से पहले इसे ध्यान से पढ़ें.
- पॉलिसी डॉक्यूमेंट मिलने के बाद 15 से 30 दिनों का फ्री लुक पीरियड होता है. अगर नियम और शर्तें पसंद न आए, तो आप पॉलिसी कैंसिल करवा सकते हैं.
- अपने सभी पुराने और नए मेडिकल पर्चे, डायग्नोस्टिक टेस्ट और बिलों को सुरक्षित रखें, ताकि क्लेम के समय कंपनी कोई झूठा दावा न कर सके.
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