हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा आत्मविश्वास से भरा हुआ हो. वह चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में बिना झिझक हाथ उठाए, नए लोगों से खुलकर बात करे, मुश्किल कामों को करने से न डरे और सबसे जरूर बात, खुद पर भरोसा करना सीखे, लेकिन आत्मविश्वास सिर्फ बार-बार कॉन्फिडेंट बनो कहने से नहीं आता. यह धीरे-धीरे डेली लाइफ के अनुभवों से विकसित होता है. जब बच्चे को महसूस होता है कि उसकी बातों की अहमियत है, वह नई परिस्थितियों का सामना कर सकता है और मेहनत करके कोई भी नई चीज सीख सकता है, तब उसका आत्मविश्वास अपने आप बढ़ने लगता है. चलिए आपको बताते हैं बच्चों को आत्मविश्वासी और मजबूत बनाने के लिए क्या करना चाहिए.
बच्चे को हर दिन थोड़ा फ्री छोड़ें
आजकल की व्यस्त दिनचर्या में बच्चों से होने वाली ज्यादातर बातचीत पढ़ाई, अनुशासन या जिम्मेदारियों के बारे में होती है. जैसे- होमवर्क पूरा किया, जूते सही जगह रखे, लंच खाया या नहीं. ऐसे में कई बार बच्चों को लगने लगता है कि उनसे सिर्फ उनकी गलतियां सुधारने या काम करवाने के लिए ही बात की जाती है. इस आदत को बदलने के लिए रोज कुछ मिनट ऐसा समय निकालें, जब बच्चे को न कोई सलाह दी जाए, न डांटा जाए और न ही उसकी परख की जाए. बस उसकी बातें ध्यान से सुनें. यह समय शाम के नाश्ते के दौरान, स्कूल से लौटते वक्त या सोने से पहले हो सकता है.
बच्चा किसी गेम, दोस्त की मजेदार बात या अपनी बनाई हुई कहानी के बारे में बताना चाहे, तो उसे खुलकर बोलने दें. भले ही वह बात आपको बहुत जरूरी न लगे, लेकिन उसके लिए वह खास हो सकती है. इसका मकसद उससे जानकारी निकालना नहीं, बल्कि उसे यह महसूस कराना है कि उसकी बातें भी महत्वपूर्ण हैं. जब बच्चे बार-बार यह अनुभव करते हैं कि कोई उन्हें ध्यान से सुन रहा है, तो उनके मन में यह विश्वास पैदा होता है कि मेरी बात की अहमियत है.
बच्चों को दूसरे लोगों से बात करने के मौके दें
आत्मविश्वास अचानक नहीं आता कि बच्चा एक दिन पूरी क्लास के सामने खड़ा होकर बेझिझक बोलने लगे. इसकी शुरुआत छोटी-छोटी बातों से होती है. जैसे दुकान पर किसी को धन्यवाद कहना, पड़ोसी से बात करना या रेस्टोरेंट में अपना ऑर्डर खुद देना. बड़ों को ये बातें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन शर्मीले या झिझकने वाले बच्चों के लिए ये बहुत अच्छे सीखने के मौके होते हैं. इससे वे घर के बाहर लोगों से बातचीत करना सीखते हैं और उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. ध्यान रखें कि हर बातचीत को परीक्षा की तरह न बनाएं. अगर कोई बच्चा किसी के नमस्ते करने पर अपने माता-पिता के पीछे छिप जाता है, तो उसे जबरदस्ती आगे धकेलने या डांटने की जरूरत नहीं है. इसके बजाय माता-पिता खुद अच्छा उदाहरण बन सकते हैं. लोगों का मुस्कुराकर अभिवादन करें, धन्यवाद कहें, आंखों में देखकर बात करें और विनम्र व्यवहार करें. बच्चा यह सब देखकर सीखता है.
बच्चे को उसकी पसंद की किसी चीज में बेहतर बनने का मौका दें
जब कोई बच्चा अपनी मेहनत से किसी कौशल में सुधार करता है, तो उससे उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है. यह जरूरी नहीं कि वह पढ़ाई में ही सबसे अच्छा हो. वह तैराकी, साइकिल चलाना, डांस, ड्रॉइंग, संगीत, फुटबॉल या किसी भी दूसरी गतिविधि में रुचि रख सकता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चा शुरुआत में किसी काम को सीखने की कोशिश करे, उसमें मेहनत करे और फिर धीरे-धीरे बेहतर बने. उसे उस क्षेत्र में सबसे आगे निकलना जरूरी नहीं है. जब बच्चा पहली बार बिना सहारे साइकिल चलाता है, कोई मुश्किल ड्रॉइंग पूरी करता है, लंबी दूरी तक तैरता है या कई दिनों की प्रैक्टिस के बाद कोई डांस स्टेप सही तरीके से कर लेता है, तो उसे सिर्फ तारीफ नहीं मिलती, बल्कि एक खास अनुभव भी मिलता है. वह खुद महसूस करता है कि मैं पहले यह नहीं कर पाता था, लेकिन मैंने मेहनत की और अब कर सकता हूं. यह एहसास उसके आत्मविश्वास को मजबूत बनाता है.
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