Parenting Tips: आज के समय में पैरेंटिंग का मतलब बदल गया है. अब माता-पिता सिर्फ आदेश नहीं देते, बल्कि हर फैसले के पीछे कारण भी बताते हैं. बच्चों से बात करना, उन्हें समझाना और उनकी राय सुनना अच्छी बात है. लेकिन, सवाल यह है क्या हर बात समझाना जरूरी है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जरूरत से ज्यादा एक्सप्लेनेशन बच्चों को उलझा रहा है? बच्चों की परवरिश में ओवर एक्सप्लेनिंग कब गलती बन जाता है ये आपको भी एक माता पिता होने के नाते पता नहीं चल पाता. ऐसे में कैसे ये चीजें बैलेंस करें और बच्चों को कितना बताएं आइए जानते हैं सब कुछ.
जब समझाना आदत बन जाए:
आज कई घरों में माता-पिता हर छोटी बात पर लंबी सफाई देते हैं:
- फोन इसलिए नहीं दे रहे क्योंकि…
- अभी बाहर नहीं जा सकते क्योंकि…
- ये मत करो क्योंकि…
धीरे-धीरे बच्चा यह मानने लगता है कि हर नियम तभी मानना है जब वह उसे पूरी तरह समझ आए. इससे बच्चे के मन में ना को स्वीकार करने की क्षमता कम होने लगती है.
हर ना का जवाब क्यों नहीं होता:
जिंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं जहाँ हमें कारण नहीं मिलता, फिर भी नियम मानना पड़ता है स्कूल, ऑफिस, समाज और कानून में. अगर बच्चा बचपन से यह सीख ले कि हर बात पर तर्क मिलना चाहिए, तो आगे चलकर उसे अथॉरिटी एक्सेप्ट करने में परेशानी हो सकती है.
कई बार माता-पिता खुद गिल्ट में होते हैं, इसलिए हर बार समझाने की कोशिश करते हैं. लेकिन पैरेंटिंग में सीमाएं तय करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना प्यार.

ज्यादा एक्सप्लेनेशन से बढ़ती उलझन:
- हर बात का कारण सुनते-सुनते बच्चा खुद भी ज्यादा सोचने लगता है.
- उसे फैसले लेने में डर लगने लगता है
- हर बात पर डाउट करने की आदत बन जाती है
- सिंपल चीजें भी उलझन लगने लगती हैं
तो क्या बात करना बंद कर दें?
बिल्कुल नहीं. बच्चों से बात करना जरूरी है, लेकिन हर समय नहीं. फर्क समझना होगा. बड़े फैसलों में समझाना जरूरी है. रोजमर्रा के नियमों में स्पष्टता काफी है.
- जैसे अभी सोने का समय है.
- हर बार लंबा भाषण देना जरूरी नहीं.
संतुलन ही सही रास्ता:
अच्छी पैरेंटिंग वही है जहां बच्चा सवाल पूछ सके, लेकिन हर बात पर बहस न करे, अपनी राय रखे, लेकिन सीमाओं का सम्मान भी सीखे. बच्चों को हर बात समझाना नहीं, बल्कि सही समय पर सही बात समझाना ही समझदारी है.
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