Ghaziabad Sisters Suicide: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक बेहद दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है. टीला मोड़ थाना क्षेत्र के भारत सिटी इलाके में तीन नाबालिग सगी बहनों ने एक साथ नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. पुलिस के अनुसार, तीनों बच्चियां एक ऑनलाइन कोरियन गेम की आदी हो चुकी थीं. उनकी उम्र 16, 14 और 12 साल थी. शुरुआती जानकारी के मुताबिक, बताया जा रहा है कि जिस गेम को वे खेल रही थीं, उसमें लगातार टास्क दिए जाते थे. कुल 50 टास्क बताए जा रहे हैं, जिनमें आखिरी टास्क आत्महत्या से जुड़ा था. पुलिस को घटनास्थल से एक 8 पन्ने का सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें लिखा था.
"एक ट्रू लाइफ स्टोरी",
"इसे जरूर पढ़ना"
"सॉरी मम्मी पापा",
और अंत में एक उदास इमोजी बनी हुई है.
यह शब्द और संकेत बताते हैं कि बच्चियां अंदर ही अंदर डर, अपराधबोध, मानसिक तनाव और गेम की लत से जूझ रही थीं.
यह मामला बच्चों की मेंटल हेल्थ, डिजिटल एडिक्शन और पैरेंटिंग से जुड़े कई अहम सवाल खड़े करता है, जिन पर बात करना आज बेहद जरूरी हो गया है.
ऑनलाइन गेम बच्चों को कैसे प्रभावित करते हैं?
आज के ऑनलाइन गेम सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गए हैं. कई गेम्स इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे बच्चों के दिमाग को लंबे समय तक बांधे रखें. हर टास्क पूरा करने पर मिलने वाला रिवॉर्ड, अगला लेवल, डर या चुनौती ये सब मिलकर दिमाग में डोपामिन नाम का केमिकल रिलीज करते हैं, जो खुशी का एहसास देता है. धीरे-धीरे बच्चा उसी खुशी का आदी हो जाता है.
बच्चों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है, इसलिए वे खतरे को सही से नहीं आंक पाते, रियल और वर्चुअल दुनिया का फर्क भूलने लगते हैं, डर और दबाव में जल्दी फैसले ले लेते हैं. यही वजह है कि कुछ बच्चे गेम को खेल नहीं, बल्कि हकीकत मानने लगते हैं.
मेंटल हेल्थ पर गेमिंग एडिक्शन का असर | Impact of Gaming Addiction on Mental Health
1. डर और एंग्जायटी
ऑनलाइन गेम्स में लगातार टास्क, टाइम लिमिट और अगर पूरा नहीं किया तो… जैसी सोच बच्चों में डर और घबराहट पैदा करती है.
2. अकेलापन और भावनात्मक दूरी
मोबाइल और गेम की लत की वजह से बच्चे परिवार से कटने लगते हैं, अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करते और वर्चुअल लाइफ को रियल समझ लेते हैं.
3. गुस्सा और चिड़चिड़ापन
बच्चों को गेम की इतनी बुरी लग जाती है, कि गेम न मिलने पर उनमें गुस्सा, रोना या आक्रामक व्यवहार दिख सकता है.
4. इम्पल्सिव बिहेवियर
जब गेम बच्चों के दिमाग पर होवी होने लगता है तो वे बिना सोचे-समझे खतरनाक कदम उठाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, खासकर किशोरों में.

सुसाइड नोट क्या संकेत देता है?
"सॉरी मम्मी पापा" जैसे शब्द बताते हैं कि बच्चियां खुद को दोषी मान रही थीं. उदास इमोजी यह दिखाते हैं कि वे अपनी भावनाओं को शब्दों में नहीं, बल्कि संकेतों में व्यक्त कर पा रही थीं. यह साफ करता है कि बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा और खुलकर बात करने का माहौल नहीं मिल पाया.
साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर ने क्या कहा?
इस बारे में डॉक्टर कामना छिब्बर, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट का कहना है कि, अगर बच्चे आत्महत्या के बारे में बात कर रहे हैं या आसपास ऐसी चीजें सुन रहे हैं, तो पेरेंट्स इसको लेकर बच्चों से कई बार बात नहीं करते हैं. बहुत बार न्यूज में ऐसी खबरें आती हैं और पेरेंट्स को लगता है कि हमारे बच्चों को इन सब चीजों के बारे में पता ही नहीं है. लेकिन, उनको सबसे ज्यादा पता है वह सबसे ज्यादा मीडिया पर है. ऐसे में पेरेंट्स को यह समझने की जरूरत है, कि बच्चों से संबंधित चीजों पर उनसे बात करना जरूरी है.
डॉक्टर ने बताया कि, अगर आपको बच्चों में कोई ऐसा व्यवहार दिख रहा है, जो सही नहीं है तो उसी समय उसे रोकने और समझाने की जरूरत है. ये नहीं सोचना चाहिए कि बच्चा छोटा है आगे चलकर सीख जाएगा. अगर आपको किसी चीज से दिक्कत है तो उसे पहली बार में ही टोकिए. ये एक पूरा प्रोसेस होता है. आपको चीजों को बार-बार और हर बार बताना होगा, क्योंकि ऐसा नहीं है कि आपने बच्चों को एक बार में चीजें बताई और वह अगले दिन से बोलेगा मैं अब से ये नहीं करूंगा. तो ये ओवरटाइन प्रोसेस है, जिस पर पेरेंट्स को ध्यान देने की जरूरत है.
माता-पिता किन संकेतों को नजरअंदाज न करें?
- अगर बच्चा हर वक्त मोबाइल या गेम में डूबा रहे.
- बात-बात पर डर या बेचैनी दिखाए.
- नींद और खाने की आदत बिगड़ जाए.
- चुप रहने लगे या अचानक बहुत गुस्सैल हो जाए.
- फोन छिनने पर पैनिक करे.
तो ये सभी मेंटल हेल्थ के रेड फ्लैग्स हो सकते हैं.

माता-पिता को क्या करना चाहिए?
1. सीधा रोक नहीं, समझदारी से सीमाएं तय करें
अचानक फोन छीन लेना बच्चों में विद्रोह और डर बढ़ा सकता है. इसलिए बच्चों को सीधे रोकने से बेहतर हैं उनके साथ मसझदारी से पेश आएं और स्क्रीन टाइम की समयसीमा बनाएं.
2. रोज बातचीत को आदत बनाएं
आज स्कूल कैसा रहा? से आगे बढ़कर पूछें, आज तुम्हें क्या अच्छा या बुरा लगा? इससे बच्चे आपसे बात करने में सहज महसूस करेंगे सारी चीजें शेयर करेंगे.
3. स्क्रीन टाइम तय करें
बच्चों को रात में नए-नए कामों में व्यस्त रखें, न कि मोबाइल देखने में. खासकर रात में मोबाइल से दूरी बहुत जरूरी है.
4. बच्चों को भावनात्मक सहारा दें
हमेशा अपने बच्चों की ढाल बनें, उन्हें यह भरोसा दें कि गलती होने पर भी वे अकेले नहीं हैं. उनको भरोसा दिलाएं कि आप उनकी गलती में भी उनके साथ हैं.
5. जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल मदद लें
अगर आप लग रहा है कि आप स्थिति तो कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, तो काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से बात करना कमजोरी नहीं, समझदारी है.
डॉक्टर कामना छिब्बर बताती हैं कि, बच्चों को समझाने का सही तरीका होना चाहिए, ताकि बच्चों को समझ आए कि अगर आप कोई चीज बता रहे हैं तो क्यों कर रहे हैं उसके पीछे क्या कारण है. लेकिन, अगर आप बच्चों के ऊपर चीजें थोपेंगे तो बच्चे उससे चिड़चिड़े और गुस्सैल हो जाते हैं.
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