Budget 2026 : सरकारी अनुमान के मुताबिक मार्च 2027 तक केंद्र सरकार पर कुल बकाया कर्ज करीब 214.82 लाख करोड़ रुपये होगा. पिछले साल के मुकाबले इसमें खासी बढ़ोतरी होगी. मगर सरकार का कहना है कि यह अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के हिसाब से संतुलित है. दरअसल, सरकार कर्ज को सिर्फ रकम में नहीं, बल्कि GDP के मुकाबले देखकर आंकती है. बजट के अनुसार 2026-27 में कर्ज GDP का 55.6 प्रतिशत रहेगा, जबकि पिछले साल यह 56.1 प्रतिशत था. यानी कर्ज बढ़ा है, लेकिन अर्थव्यवस्था उससे तेज बढ़ी है. इसलिए कुल बोझ थोड़ा कम हुआ है.
इसे ऐसे समझिए, अगर किसी की आमदनी तेजी से बढ़ रही हो और वह थोड़ा ज्यादा लोन ले ले, तो भी उसकी किस्त संभालने लायक रह सकती है. सरकार भी इसी लॉजिक पर काम कर रही है.
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विदेशी कर्ज बहुत कम
भारत के कुल कर्ज में से ज्यादातर हिस्सा देश की ही बैंको, बीमा कंपनियों, पेंशन फंड, आरबीआई गवर्नमेंट बॉन्ड्स से लिए कर्ज का है. केवल 7.11 लाख करोड़ रुपये विदेशी कर्ज है. यानी करीब 3 प्रतिशत. इसका मतलब यह है कि भारत अपनी जरूरतों के लिए ज्यादा पैसा देश के अंदर से ही उधार लेता है. बाहर के कर्ज पर निर्भरता कम होना एक अच्छी बात मानी जाती है.
ब्याज ही सबसे बड़ा दबाव
सरकार को अगले साल करीब 14.04 लाख करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च करने होंगे. यह सरकार की कमाई का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है. यानी हर 100 रुपये में से करीब 40 रुपये पुराने कर्ज के ब्याज में चले जाते हैं. यही वजह है कि सरकार कर्ज को धीरे-धीरे कंट्रोल में लाने की बात कर रही है. सरकार 17.2 लाख करोड़ रुपये बाजार से उधार लेगी. यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है. सरकार का कहना है कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा सड़क, रेलवे, इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरे ग्रोथ प्रोजेक्ट्स पर लगेगा, ताकि आगे चलकर कमाई बढ़े.
फिस्कल डेफिसिट भी घटा
2026-27 के लिए फिस्कल डेफिसिट GDP का 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है. यह संकेत देता है कि सरकार खर्च और आमदनी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है.
कुल मिलाकर कर्ज बढ़ रहा है, लेकिन बेलगाम नहीं है. सरकार का फोकस यह है कि कर्ज लेकर ऐसा निवेश किया जाए, जिससे आगे चलकर अर्थव्यवस्था और मजबूत हो. आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब यही है कि फिलहाल देश की माली हालत कंट्रोल में मानी जा सकती है, लेकिन ब्याज का बोझ कम करना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती रहेगा.
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