उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों के लिए चुनाव प्रचार आज शाम खत्म हो जाएगा.ये सीटें शिक्षक और स्नातक कोटे की हैं.उत्तर प्रदेश में यह 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद और 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कराया जा रहा है. इसलिए इस चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है. इसलिए सत्तारूढ बीजेपी और विपक्षी समाजवादी पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.
कितनी सीटों पर हो रहा है चुनाव
प्रदेश में जिन सीटों पर चुनाव कराया जा रहा है उनमें स्नातक कोटे की पांच और शिक्षक कोटे की छह सीटे हैं.बैलेट पेपर के जरिए इन सीटों पर मतदान 23 अक्तूबर और मतगणना 27 अक्तूबर को कराई जाएगी. पिछले चुनाव में इनमें से सात सीटें बीजेपी, दो सपा ने और दो शिक्षक दलों ने जीती थीं. इस बार के चुनाव की खास बात यह है कि राजनीतिक दलों में केवल बीजेपी और सपा ही चुनाव मैदान में हैं. बसपा और कांग्रेस ने इस चुनाव से दूरी बना रखी है. जिन सीटों पर चुनाव हो रहा है, उनमें से पांच सीटें पश्चिमी यूपी,दो सीटें लखनऊ, एक सीट बुंदेलखंड और तीन सीटें पूर्वांचल के जिलों में हैं.
विधानसभा चुनाव से पहले कराए जा रहे है इस बड़े चुनाव में राजनीतिक दलों ने अपने वोट बैंक के आधार पर उम्मीदवार उतारे हैं. अगर बीजेपी की बात करें तो उसने पांच ब्राह्मण, तीन राजपूत, एक कुर्मी, एक वैश्य और पंजाबी समुदाय के एक उम्मीदवार को टिकट दिया है. इस तरह उम्मीदवार बनाने में बीजेपी ने सवर्ण वोट बैंक को प्राथमिकता दी है. वहीं समाजवादी पार्टी ने टिकट बंटवारे में पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले का ध्यान रखा है.सपा के उम्मीदवारों में चार यादव, दो कुर्मी, एक गुर्जर, एक मुस्लिम, एक कायस्थ, एक वैश्य और एक राजपूत को टिकट दिया है.

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों पर हो रहे चुनाव का मतदान 23 अक्टूबर को कराया जाएगा.
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कैसा रहा था पिछला प्रदर्शन
इस चुनाव का महत्व इस बात से समझा सकता है कि लगभग सभी सीटों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मतदाताओं के साथ संवाद किया है. वहीं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने अपना पेरिस दौरा ही रद्द कर चुनाव प्रचार किया. दूसरे उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने भी प्रचार की कमान संभाली.इनके अलावा बीजेपी ने ब्लॉक स्तर पर प्रभारियों की नियुक्ति की है. वहीं पार्टी के सांसदों, विधायकों और प्रदेश पदाधिकारियों को अलग-अलग जिम्मेदारी देकर उन्हें सक्रिय किया गया है. साधारण शब्दों में कहें तो बीजेपी ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है. इसके जरिए बीजेपी प्रदेश में अपनी राजनीतिक पकड़ को दिखाना चाहती है.बीजेपी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले लोकसभा चुनाव 2024 में मिली हार से उबरना चाहती है. जिन सीटों पर चुनाव कराया जा रहा है, पिछले चुनाव में उनमें से सात सीटों पर बीजेपी, दो पर सपा और दो पर शिक्षक दल ने जीत दर्ज की थी. इसलिए बीजेपी पर अपना पिछला प्रदर्शन दोहराने या उससे बेहतर प्रदर्शन का भी दबाव है.
इस चुनाव का मतदाता काफी शिक्षित होता है. इसलिए इसके मुद्दे भी रोजगार, शिक्षा, सरकारी नीतियां और शिक्षकों से जुड़े होते हैं. पिछले कुछ समय से देशभर में हो रहे जेन-जी और युवाओं के प्रदर्शन की वजह से बीजेपी परेशान भी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले कुछ महीनों में शिक्षकों और शिक्षा जगत के लिए कई घोषणाएं भी इसी वजह से की हैं. इसके अलावा बीजेपी ने शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में शिक्षक संगठनों और कर्मचारी संगठनों से जुड़े रहे कुछ नेताओं को टिकट दिया है, जिससे उनके संगठन का राजनीतिक फायदा उठाया जा सके. इस चुनाव के जरिए बीजेपी अपने विधायकों के जनाधार को भी परख रही है. विधान परिषद चुनाव के परिणामों को विधायकों के टिकट से जोड़ा गया है. कहा जा रहा है कि जिन इलाकों में बीजेपी का प्रदर्शन खराब होगा, वहां के विधायकों को विधानसभा चुनाव का टिकट हासिल करने में परेशानी हो सकती है.

विधान परिषद के इस चुनाव को 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल माना जा रहा है.
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क्या बागी बिगाड़ेंगे बीजेपी का खेल
इस चुनाव में बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती उसके बागी और नाराज नेता बने हुए हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर में देखने को मिला है. वहां के डॉक्टर संजयन त्रिपाठी पिछले काफी समय से एमएलसी का टिकट पाने की आस लगाए बैठे थे. लेकिन बीजेपी ने अपने पुराने नेता पर भरोसा जताया. इससे नाराज होकर डॉक्टर त्रिपाठी ने बीजेपी छोड़कर सपा का दामन थाम लिया. सपा ने भी अपने पहले घोषित उम्मीदवार को हटाकर डॉक्टर त्रिपाठी को टिकट दे दिया. वहीं गोरखपुर-फैजाबाद क्षेत्र से स्नातक कोटे के एमएलसी डॉक्टर देवेंद्र प्रताप सिंह भी विरोध का झंडा उठाए हुए हैं. वह भी सपा छोड़कर बीजेपी में आए हैं. दरअसल गोरखपुर में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें मंच पर नहीं चढ़ने दिया गया. इसे उन्होंने अपना अपमान समझा. उन्होंने एक डायरी लिखकर अपने समर्थकों से इस अपमान का बदला 23 अक्तूबर को लेने की बात कही है.
विधान परिषद की 11 सीटों के चुनाव परिणाम यह बताएंगे कि प्रदेश में बीजेपी और सपा की जमीनी पकड़ कितनी है. एक तरफ जहां बीजेपी के लिए यह अपनी राजनीतिक साख बनाए रखने का मौका है तो दूसरी ओर सपा के लिए अपने पीडीए फार्मूले की ताकत दिखाने का समय है. अब यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे दोनों दल अपने मिशन में कितने कामयाब होते हैं.
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